छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 257, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २५३
| अथ येऽस्योदञ्चो रश्मय इत्यादि समानम् । अथर्वाङ्गिरसोऽथर्वाङ्गिरसा च दृष्टा मन्त्रा अथर्वाङ्गिरसः कर्माणि प्रयुक्ता मधुकृतः । इतिहासपुराणं पुष्पम् । तयोश्चेतिहासपुराणयोरश्वमेधे पारिप्लवासु रात्रिषु कर्माङ्गत्वेन विनियोगः सिद्धः । मध्वेवेदादित्यस्य परं कृष्णं रूपमतिशयेन कृष्णमित्यर्थः ॥ १-३ ॥ | ‘अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयः’ इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है । अथर्वाङ्गिरसः—अथर्वा और अङ्गिरा ऋषियोंके प्रत्यक्ष किये हुए मन्त्र अथर्वाङ्गिरस कहलाते हैं; कर्ममें प्रयुक्त हुए वे ही मन्त्र मधुकर हैं। इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं। उन इतिहास और पुराणोंका अश्वमेध यज्ञमें पारिप्लवा रात्रियोंमें* कर्माङ्गरूपसे विनियोग प्रसिद्ध ही है। इस आदित्यका जो परम कृष्ण अर्थात् अतिशय कृष्ण रूप है वही मधु है ॥ १-३ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥
</div>* अश्वमेधयज्ञ बहुत दिनोंमें समाप्त होता है। उसके अनुष्ठानमें चुपचाप बैठे-बैठे यज्ञकर्ताओंको आलस्य आने लगता है। उसकी निवृत्तिके लिये श्रुतिने रात्रिके समय इतिहास-पुराणादिश्रवणका विधान किया है। विविध उपाख्यानादिके समुदायका नाम ‘पारिप्लव’ है; जिन रात्रियोंमें उनके श्रवणका विधान है वे ‘पारिप्लवा रात्रियाँ’ कहलाती हैं।