छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 785, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंविंश खण्ड
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निष्ठा ही जानने योग्य है
यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्दधाति नानिस्तिष्ठञ्छ्रद्द- धाति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा त्वेव विजिज्ञा- सितव्येति । निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] जिस समय पुरुषकी निष्ठा होती है तभी वह श्रद्धा करता है; बिना निष्ठाके कोई श्रद्धा नहीं करता, अपितु निष्ठा करनेवाला ही श्रद्धा करता है। अतः निष्ठाको ही विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं निष्ठाको विशेषरूपसे जानना चाहता हूँ' ॥ १ ॥
| निष्ठा गुरुशुश्रूषादिस्तत्परत्वं <br> ब्रह्मविज्ञानाय ॥ १ ॥ | निष्ठा गुरुशुश्रूषा आदिको कहते हैं। उसमें ब्रह्मविज्ञानके लिये तत्पर रहना ॥ १ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २० ॥