भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 795, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 795

खण्ड २४] शाङ्करभाष्यार्थ ७९१


अप्रतिष्ठितोऽनाश्रितो भूमा क्वचिदपीत्यर्थः ॥ १ ॥है। तात्पर्य यह है कि 'भूमा अप्रतिष्ठित है अर्थात् कहीं भी आश्रित नहीं है' ॥ १ ॥
यदि स्वमहिम्नि प्रतिष्ठितो भूमा कथं तर्ह्यप्रतिष्ठ उच्यते, शृणु'यदि भूमा अपनी महिमामें प्रतिष्ठित है तो उसे अप्रतिष्ठित क्यों कहा जाता है?' सुनो—

गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेवं ब्रवीमि ब्रवीमीति होवाचान्यो ह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥

‘इस लोकमें ‘गौ, अश्व आदिको महिमा कहते हैं तथा हाथी, सुवर्ण, दास, भार्या, क्षेत्र और घर—इनका नाम भी महिमा है। किन्तु मेरा ऐसा कथन नहीं है, क्योंकि अन्य पदार्थ अन्यमें प्रतिष्ठित होता है। मैं तो यह कहता हूँ’—ऐसा सनत्कुमारजीने कहा ॥ २ ॥

गोअश्वादीह महिमेत्याचक्षते ।<br><br>गावश्चाश्वाश्च गोअश्वं द्वन्द्वैकवद्भावः। सर्वत्र गवाश्वादि महिमेति प्रसिद्धम्। तदाश्रितस्तत्प्रतिष्ठश्चैत्रो भवति यथा नाहमेवं'इस लोकमें गो-अश्वादिको महिमा कहते हैं। गो और अश्वको 'गोअश्व' कहते हैं। इन दोनों शब्दोंका द्वन्द्व समासमें एकवद्भाव* हुआ है। सर्वत्र गौ और अश्व आदि ही महिमा हैं इस प्रकार प्रसिद्ध है। जिस प्रकार चैत्र [नामका कोई पुरुष] उनके

* यहाँ यह प्रश्न होता है कि 'गावश्च अश्वाश्च' ऐसा विग्रह करके पुंल्लिङ्ग एवं बहुवचनान्त शब्दोंका द्वन्द्वसमास हुआ है, ऐसी दशामें 'गोअश्वम्' यह एकवचनान्त नपुंसकलिङ्ग प्रयोग कैसे हुआ ? इसीका उत्तर देते हुए कहते हैं कि एकवद्भाव हुआ है। 'द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्' इस पाणिनिसूत्रसे यहाँ एकवद्भाव किया गया है, इससे एकवचनान्त हो गया है तथा जहाँ एकवद्भाव होता है वहाँ 'स नपुंसकम्' इस सूत्रके अनुसार नपुंसकता भी हो जाती है।