भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 264
२६०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| स यः कश्चिदेतदेवं यथोदितमृङ् मधुकरतापरससंक्षरणमृग्वेदविहितकर्मपुष्पात्तस्य चादित्यसंश्रयणं रोहितरूपत्वं चामृतस्य प्राचीदिग्गतरश्मिनाडीसंस्थतां वसुदेवभोग्यतां तद्विदश्च वसुभिः सहैकतां गत्वाग्निना मुखेनोपजीवनं दर्शनमात्रेण तृप्तिं स्वभोगावसर उद्यमनं तत्कालापाये च संवेशनं वेद सोऽपि वसुवत्सर्वं तथैवानुभवति ॥ ३ ॥ | जो कोई पुरुष इस यथोक्त अमृतको इस प्रकार [ जानता है ] अर्थात् ऋग्वेदविहित कर्मरूप पुष्पसे ऋक्-श्रुतिरूप मधुकरोंके अभितापद्वारा रसका संक्षरण होना, उसका आदित्यके आश्रित होना, रोहितरूप होना, अमृतका पूर्वदिग्वर्तिनी रश्मिनाडियोंमें स्थित होना, वसुनामक देवोंका भोग्य होना, उसे जाननेवालोंका वसुगणके साथ एकताको प्राप्त होकर अग्निप्रधानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करना, उसके दर्शनमात्रसे उनका ( उसे जाननेवालोंका ) तृप्त होना, अपने भोगके समय उनका उससे उत्साहित होना और भोगावसरकी समाप्तिपर उदासीन हो जाना जानता है वह भी वसुओंके समान इन सब बातोंका उसी प्रकार अनुभव करता है ॥ ३ ॥ |


| कियन्तं कालं विदांस्तदमृतमुपजीवति ? इत्युच्यते— | विद्वान् कितने समयतक उस अमृतके आश्रित होकर जीवन धारण करता है, यह बतलाया जाता है— |

स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमता वसूनामेव तावदाधिपत्यꣳस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥

जबतक आदित्य पूर्व दिशासे उदित होता है और पश्चिम दिशामें अस्त होता है तबतक वह [ विद्वान् ] वसुओंके आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥