छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 276, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादश खण्ड
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भोगक्षयके अनन्तर सबका उपसंहार हो जानेपर आदित्यरूप ब्रह्मकी स्वस्वरूपमें स्थिति
| कृत्वैवमुदयास्तमनेन प्राणिनां स्वकर्मफलभोगनिमित्तमनुग्रहं तत्कर्मफलोपभोगक्षये तानि प्राणिजातान्यात्मनि संहृत्य— | इस प्रकार उदय और अस्तके द्वारा प्राणियोंको अपने-अपने कर्मफलभोगके लिये अनुगृहीत कर, उनके कर्मफलभोगका क्षय होनेपर उन प्राणियोंका अपनेमें उपसंहार कर— |
अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः ॥ १ ॥
फिर उसके पश्चात् वह ऊर्ध्वगत होकर उदित होनेपर फिर न तो उदित होगा और न अस्त ही होगा; बल्कि अकेला ही मध्यमें स्थित रहेगा। उसके विषयमें यह श्लोक है ॥ १ ॥
| अथ ततस्तस्मादनन्तरं प्राण्यनुग्रहकालादूर्ध्वः सन्नात्मन्युदेत्योद्गम्य यान्प्रत्युदेति तेषां प्राणिनामभावात्स्वात्मस्थो नैवोदेता नास्तमेतैकलोऽद्वितीयोऽनवयवो मध्ये स्वात्मन्येव स्थाता। | फिर उसके पश्चात्—प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके कालके अनन्तर ऊर्ध्वगत हो—अपनेमें उदित हो अर्थात् जिन प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये उदित होता है उन प्राणियोंका अभाव हो जानेके कारण अपनेहीमें स्थित हो वह न तो उदित ही होगा और न अस्त ही होगा; बल्कि अकेला—अद्वितीय अर्थात् निरवयव होकर मध्यमें अपनेमें ही स्थित रहेगा। |