भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 535

खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५३१

सूकरयोनिं वा चाण्डाल-कर्मोंके ही अनुसार कुत्तेकी योनि,
योनिं वा स्वकर्मानुरूपे-सूकरयोनि अथवा चाण्डालयोनि
णैव ॥ ७ ॥प्राप्त करते हैं ॥ ७ ॥

चतुर्थ प्रश्नका उत्तर

(अशास्त्रीय प्रवृत्तिवालोंकी गति)

ये तु रमणीयचरणा द्विजा-किंतु जो शुभाचरणशील
तयस्ते स्वकर्मस्थाश्चेदिष्टदिका-द्विजाति हैं वे यदि अपने कर्मोंमें
रिणस्ते धूमादिगत्या गच्छ-स्थित रहकर इष्टादि कर्म करनेवाले
न्त्यागच्छन्ति च पुनः पुनर्घ-होते हैं तो घटीयन्त्रके समान
टीयन्त्रवत् । विद्यां चेत्प्राप्नु-धूमादि मार्गसे पुनः-पुनः आते-जाते
युस्तदार्चिरादिना गच्छन्ति। यदारहते हैं और यदि उन्हें [उपासना-
तु न विद्यासेविनो नापीष्टा-त्मक] विद्याकी प्राप्ति हो जाती है
दिकर्म सेवन्ते तदा—तो अर्चि आदि मार्गसे जाते हैं।
और जिस समय वे न तो उपासना
करनेवाले होते हैं और न इष्टादि
कर्मोंका ही सेवन करते हैं, उस
समय—

अथैतयोः पथोर्न कतरेण च न तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयꣳस्थानं तेनासौ लोको न सम्पूर्यते तस्माज्जुगुप्सेत तदेष श्लोकः ॥ ८ ॥

इनमेंसे किसी मार्गद्वारा नहीं जाते। वे ये क्षुद्र और बारम्बार आने-जानेवाले प्राणी होते हैं। 'उत्पन्न होओ और मरो' यही उनका तृतीय स्थान होता है। इसी कारण यह परलोक नहीं भरता। अतः [इस संसारगतिसे] घृणा करनी चाहिये। इस विषयमें यह मन्त्र है-॥८॥