छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 538, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 538
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| ५३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| जन्ममरणजनितवेदनानुभवकृत-<br>क्षणाः क्षुद्रजन्तवो ध्वान्ते च<br>घोरे दुस्तरे प्रवेशिताः सागर<br>इवागाधेऽप्लवे निराशाश्चोत्तरणं<br>प्रति; तस्माच्चैवंविधां संसार-<br>गतिं जुगुप्सेत बीभत्सेत घृणी<br>भवेत्, मा भूदेवंविधे संसार-<br>महोदधौ घोरे पात इति ।<br>तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोकः पञ्चा-<br>ग्निविद्यास्तुतये ॥ ८ ॥ | जन्म-मरणसे होनेवाली वेदनाके<br>अनुभवमें ही जिनका समय जाता<br>है वे क्षुद्र जीव नौकाहीन अगाध<br>सागरके समान, जिसे पार करनेमें<br>वे निराश रहते हैं, अति दुस्तर घोर<br>अज्ञानान्धकारमें प्रविष्ट कर दिये<br>जाते हैं; इसलिये इस प्रकारकी<br>संसारगतिमें जुगुप्सा—बीभत्सा<br>अर्थात् घृणा करनी चाहिये कि इस<br>प्रकारके घोर संसार महासागरमें<br>हमारा पतन न हो । उसी अर्थमें<br>पञ्चाग्निविद्याकी स्तुतिके लिये यह<br>मन्त्र है ॥ ८ ॥ |
पाँच पतित
स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन्ब्र-<br>ह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरंस्तैरिति ॥९॥
सुवर्णका चोर, मद्य पीनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्रह्महत्यारा ये चारों पतित होते हैं और पाँचवाँ उनके साथ संसर्ग करनेवाला भी ॥ ९ ॥
| स्तेनो हिरण्यस्य ब्राह्मणसु-<br>वर्णस्य हर्ता। सुरां पिबन्ब्राह्मणः<br>सन् । गुरोश्च तल्पं दारानाव-<br>सन् । ब्रह्महा ब्राह्मणस्य हन्ता<br>चेत्येते पतन्ति चत्वारः पञ्च-<br>मश्च तैः सहाचरन्निति ॥ ९ ॥ | सुवर्णका चोर अर्थात् ब्राह्मणका<br>सोना चुरानेवाला, ब्राह्मण होकर<br>मदिरा पीनेवाला, गुरुके तल्प यानी<br>पत्नीसे सहवास करनेवाला और<br>ब्रह्महा—ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला<br>—ये चार पतित होते हैं और<br>पाँचवाँ उनके साथ आचरण<br>(व्यवहार) करनेवाला ॥ ९ ॥ |