भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 544
५४०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| श्रोत्रियास्तेभ्योऽहं न सर्वमिव <br> पृष्टं प्रतिपत्स्ये वक्तुं नोत्सहे। <br> अतो हन्ताहमिदानीमन्यमेषाम- <br> भ्यनुशासानि वक्ष्याम्युपदेष्टार- <br> मिति ॥ ३ ॥ | किंतु मैं इन्हें इनकी पूछी हुई बात <br> पूरी तरह नहीं बतला सकूँगा। <br> अतः मैं इस समय इन्हें एक दूसरे <br> उपदेष्टाके लिये अनुशासन करता <br> हूँ अर्थात् इन्हें दूसरा उपदेशक <br> बतलाये देता हूँ॥ ३॥ |

| एवं संपाद्य— | ऐसा निश्चय कर— |

तान्होवाचाश्वपतिर्वै भगवन्तोऽयं कैकेयः संप्रती- <br> ममात्मानं वैश्वानरमध्येति तꣳहन्ताभ्यागच्छामेति तꣳ- <br> हाभ्याजग्मुः ॥ ४ ॥

उसने उनसे कहा—'हे पूजनीयगण ! इस समय केकयकुमार अश्वपति इस वैश्वानरसंज्ञक आत्माको अच्छी तरह जानता है। आइये, हम उसीके पास चलें।' ऐसा कहकर वे उसके पास चले गये ॥ ४ ॥

| तान्होवाच—अश्वपतिर्वै नामतो भगवन्तोऽयं केकयस्यापत्यं कैकेयः संप्रति सम्यगिममात्मानं वैश्वानरमध्येतीत्यादि समानम् ॥ ४ ॥ | उसने उनसे कहा—'हे भगवन् ! इस समय केकयका पुत्र अश्वपति नामवाला कैकेय इस वैश्वानर आत्माको अच्छी तरह समझता है' इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है॥ ४॥ |

अश्वपतिद्वारा मुनियोंका स्वागत

तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयाञ्चकार स <br> ह प्रातः संजिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न <br> कदर्यो न मद्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी <br> कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा