छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 543, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३९
उन पूजनीयोंने स्थिर किया कि यह अरुणका पुत्र उद्दालक इस समय इस वैश्वानर आत्माको जानता है; अतः हम उसके पास चलें। ऐसा निश्चय कर वे उसके पास आये ॥ २ ॥
| ते ह मीमांसन्तोऽपि निश्चयमलभमानाः संपादयाञ्चक्रुः संपादितवन्त आत्मन उपदेष्टारम् । उद्दालको वै प्रसिद्धो नाम्तो भगवन्तः पूजावन्तोऽयमारुणिररुणस्यापत्यं संप्रति सम्यगिममात्मानं वैश्वानरमस्मदभिप्रेतमध्येति स्मरति । तं हन्तेदानीमभ्यागच्छामेत्येवं निश्चित्य तं हाभ्याजग्मुर्गतवन्तस्तमारुणिम् ॥ २ ॥ | विचार करनेपर भी कोई निश्चय न होनेपर उन पूजावानोंने सम्पादन किया—अपना उपदेशक स्थिर किया। [ वे बोले— ] ‘इस समय उद्दालक नामसे प्रसिद्ध यह अरुणका पुत्र आरुणि इस हमारे अभिप्रेत वैश्वानर आत्माको ‘अध्येति’—स्मरण रखता यानी जानता है। अच्छा तो, अब उसके पास चलें।’ इस प्रकार निश्चयकर वे उस आरुणिके पास आये ॥ २ ॥ |
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उद्दालकका औपमन्यवाधिके सहित अश्वपतिके पास आना
स ह संपादयाञ्चकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सर्वमिव प्रतिपत्स्ये हन्ताहमन्यमभ्यनुशासानीति ॥ ३ ॥
उसने निश्चय किया ये परम श्रोत्रिय महागृहस्थ मुझसे प्रश्न करेंगे, किंतु मैं इन्हें पूरी तरहसे नहीं बतला सकूँगा अतः मैं उन्हें दूसरा उपदेष्टा बतला दूँ ॥ ३ ॥
| स ह तान्दृष्ट्वैव तेषामागमनप्रयोजनं बुद्ध्वा संपादयाञ्चकार; कथम् ? प्रक्ष्यन्ति मां वैश्वानरमिमे महाशाला महा- | उन्हें देखते ही उसने उनके आनेका प्रयोजन समझकर [चित्तमें] स्थिर किया। किस प्रकार स्थिर किया ? ये महागृहस्थ और परम श्रोत्रिय मुझसे वैश्वानरके विषयमें पूछेंगे। |