छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 542, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| ब्रह्मैवात्मेत्येवं सर्वात्मा वैश्वानरो ब्रह्म स आत्मेत्येतत्सिद्धं भवति। "मूर्धा ते व्यपतिष्यत्" (छा० उ० ५। १२। २) "अन्धोऽभविष्यः" (५। १३। २) इत्यादिलिङ्गात् ॥ १ ॥ | कारण आत्मा ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही आत्मा है; अतः सर्वात्मा वैश्वानर ब्रह्म है और वही आत्मा है-यह सिद्ध होता है। यह बात [खण्ड १२ से १७ तक आये हुए] "तेरा मस्तक गिर जाता" "तू अन्धा हो जाता" इत्यादि लिङ्गोंसे जानी जाती है*॥ १॥ |
औपमन्यवादिका उद्दालकके पास आना
ते ह संपादयाञ्चक्रुरुद्दालको वै भगवन्तोऽयमारुणिः संप्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तꣳहन्ताभ्यागच्छामेति तꣳहाभ्याजग्मुः ॥ २ ॥
* आगे यह दिखलाया गया है कि आरुणिके सहित औपमन्यवादि पाँचों मुनि राजा अश्वपतिके पास गये और उससे वैश्वानर आत्माका उपदेश करनेके लिये प्रार्थना की। तब अश्वपतिने उनमेंसे प्रत्येकसे अलग-अलग यह प्रश्न किया कि तुम किसे वैश्वानर (विराट् रूप) समझकर उपासना करते हो ? इसपर औपमन्यवने कहा कि मैं द्युलोकको वैश्वानर समझता हूँ। तब अश्वपति बोला—'यह वैश्वानर आत्माका मस्तक है। इसकी तुम समस्त वैश्वानर-बुद्धिसे उपासना करते हो इसलिये यद्यपि तुम्हारे यज्ञ-यागादि-सम्बन्धी सामग्रीकी बहुलता है तथापि यदि मेरे पास न आते तो इस अन्यथाग्रहणके दोषसे तुम्हारा मस्तक गिर जाता।' इसके पश्चात् उसने सत्ययज्ञसे पूछा तो वह बोला—'मैं आदित्यको वैश्वानर समझकर उपासना करता हूँ।' इसपर अश्वपतिने कहा—'यह उसका केवल नेत्र है; इसकी समस्त बुद्धिसे उपासना करनेके कारण यद्यपि तुम्हारे पास अनेक प्रकारकी सम्पत्ति दिखायी देती है तथापि यदि तुम मेरे पास न आते तो अन्धे हो जाते।' इसी प्रकार अन्य मुनियोंसे भी पूछा गया और यह देखकर कि उनमेंसे प्रत्येक ही वैश्वानर आत्माके किसी-न-किसी अङ्गकी ही उपासना करता है उसने उनकी व्यस्तोपासनाके परिणाममें उनके उन्हीं-उन्हीं अङ्गोंके भंग होनेका भय दिखलाते हुए अन्तमें अठारहवें खण्डमें वैश्वानरके स्वरूपका उपदेश किया है। यहाँ दो श्रुतियोंके प्रतीक देकर यह दिखलाया है कि भेदोपासनामें श्रुति भय प्रदर्शित करती है; इसलिये उसे आत्मा और ब्रह्मका अभेद ही अभिमत है।