छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 541, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 541
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२७
बुडिल—ये महागृहस्थ और परम श्रोत्रिय एकत्रित होकर परस्पर विचार करने लगे कि हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्म क्या है ? ॥ १ ॥
| प्राचीनशाल इति नामत उपमन्योरपत्यमौपमन्यवः । सत्ययज्ञो नामतः पुलुषस्यापत्यं पौलुपिः । तथेन्द्रद्युम्नो नामतो भल्लवेरपत्यं भाल्लविस्तस्यापत्यं भाल्लवेयः । जन इति नामतः शर्कराक्षस्यापत्यं शार्कराक्ष्यः । बुडिलो नामतोऽश्वतराश्वस्यापत्यमाश्वतराश्विः । पञ्चापि ते हैते महाशाला महागृहस्था विस्तीर्णाभिः शालाभिर्युक्ताः संपन्ना इत्यर्थः । महाश्रोत्रियाः श्रुताध्ययनवृत्तसंपन्ना इत्यर्थः । त एवंभूताः सन्तः समेत्य संभूय क्वचिन्मीमांसां विचारणां चक्रुः कृतवन्त इत्यर्थः ।<br><br>कथम् ? को नोऽस्माकमात्मा ? किं ब्रह्म ? इत्यात्मब्रह्मशब्दयोरितरेतरविशेषणविशेष्यत्वम् । ब्रह्मेत्यप्यात्मपरिच्छिन्नमात्मानं निवर्तयत्यात्मेति चात्मव्यतिरिक्तस्यादित्यादिब्रह्मण उपास्यत्वं निवर्तयति । अभेदेनात्मैव ब्रह्म | जो नामसे प्राचीनशाल था वह उपमन्युका पुत्र औपमन्यव, पुलुषका पुत्र पौलुषि जो नामसे सत्ययज्ञ था, भल्लविके पुत्रको भाल्लवि कहते हैं, उसका पुत्र भाल्लवेय जो नामसे इन्द्रद्युम्न था, जन ऐसे नामवाला शर्कराक्षका पुत्र शार्कराक्ष्य तथा बुडिल नामक अश्वतराश्वकां पुत्र आश्वतराश्वि—ये पाँचों ही महाशाल—बड़े कुटुम्बी अर्थात् विस्तृत शालाओंसे युक्त तथा महाश्रोत्रिय अर्थात् श्रुत यानी शास्त्राध्ययन और सदाचारसे सम्पन्न थे । इस प्रकारके वे सब किसी समय आपसमें मिलकर मीमांसा अर्थात् विचार करने लगे ।<br><br>किस प्रकार विचार करने लगे ?—'हमारा आत्मा कौन है ? ब्रह्म क्या है ?' यहाँ 'आत्मा' और 'ब्रह्म' शब्दोंका परस्पर विशेषण-विशेष्यभाव है । 'ब्रह्म' इस शब्दसे श्रुति देह-परिच्छिन्न आत्माके ग्रहणका निवारण करती है तथा 'आत्मा' इस शब्दसे आत्मासे भिन्न आदित्यादि ब्रह्मके उपास्यत्वकी निवृत्ति करती है । अतः दोनोंका अभेद होनेके |