छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 546, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| कारानुरूपम् । न स्वैरी परदारेषु गन्ता । अत एव स्वैरिणी कुतो दुष्टचारिणी न संभवतीत्यर्थः । <br><br> तैश्च न वयं धनेनार्थिन इत्युक्त आहाल्पं मत्वैते धनं न गृह्णन्तीति । यक्ष्यमाणो वै कतिभिरहोभिरहं हे भगवन्तोऽस्मि, तदर्थं क्लृप्तं धनं मया यावदेकैकस्मै यथोक्तमृत्विजे धनं दास्यामि तावत्प्रत्येकं भगवद्भ्योऽपि दास्यामि । वसन्तु भगवन्तः पश्यन्तु च मम यागम् ॥ ५ ॥ | अविद्वान् है और न कोई स्वैरी—परस्त्रियोंके प्रति गमन करनेवाला है; अतः स्वैरिणी भी कैसे हो सकती है ? अर्थात् कोई दुराचारिणी स्त्री होनी भी सम्भव नहीं है।' <br><br> फिर उनके यह कहनेपर कि 'हम धनके अर्थी नहीं हैं' यह समझकर कि ये लोग थोड़ा मानकर धन नहीं लेते, उसने कहा—'हे पूज्यगण ! कुछ दिनोंमें मैं यज्ञानुष्ठान करनेवाला हूँ, उसके लिये मैंने धनका संकल्प कर दिया है। उस समय शास्त्राज्ञानुसार मैं जितना-जितना धन एक-एक ऋत्विक्को दूँगा। उतना ही आपमेंसे प्रत्येकको भी दूँगा। अतः आपलोग यहीं ठहरिये और मेरा यज्ञ देखिये' ॥५॥ |
अश्वपतिके प्रति मुनियोंकी प्रार्थना
| इत्युक्ताः— | इस प्रकार कहे जानेपर— |
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ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत्तᳪहैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरᳪसंप्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥
वे बोले—'जिस प्रयोजनसे कोई पुरुष कहीं जाता है उसे चाहिये कि अपने उसी प्रयोजनको कहे। इस समय आप वैश्वानर आत्माको जानते हैं, उसीका आप हमारे प्रति वर्णन कीजिये' ॥ ६ ॥