छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 553, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश खण्ड
अश्वपति और सत्ययज्ञका संवाद
अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुपि प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १ ॥
फिर उसने पुलुषके पुत्र सत्ययज्ञसे कहा—'हे प्राचीनयोग्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला—'हे पूज्य राजन् ! मैं आदित्यकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजाने कहा— ] 'यह निश्चय ही विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है, जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो; इसीसे तुम्हारे कुलमें बहुत-सा विश्वरूप साधन दिखायी देता है' ॥ १ ॥
| अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुपिं हे प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्से ? इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाच । शुक्लनीलादिरूपत्वाद्विश्वरूपत्वमादित्यस्य, सर्वरूपत्वाद्वा, सर्वाणि रूपाणि हि त्वाष्ट्राणि यतोऽतो वा विश्वरूप आदित्यः; | फिर उसने पुलुषके पुत्र सत्ययज्ञसे कहा—'हे प्राचीनयोग्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' तब उसने 'हे पूज्य राजन् ! मैं आदित्यकी ही उपासना करता हूँ' ऐसा उत्तर दिया । शुक्लनीलादिरूप होनेके कारण आदित्यकी विश्वरूपता है, अथवा सर्वरूप होनेके कारण; या सारे रूप त्वष्टाके ही हैं, इस लिये आदित्य विश्वरूप है। उसकी |