छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
त्रयोदश खण्ड
अश्वपति और सत्ययज्ञका संवाद
अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुपि प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १ ॥
फिर उसने पुलुषके पुत्र सत्ययज्ञसे कहा—'हे प्राचीनयोग्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला—'हे पूज्य राजन् ! मैं आदित्यकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजाने कहा— ] 'यह निश्चय ही विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है, जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो; इसीसे तुम्हारे कुलमें बहुत-सा विश्वरूप साधन दिखायी देता है' ॥ १ ॥
| अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुपिं हे प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्से ? इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाच । शुक्लनीलादिरूपत्वाद्विश्वरूपत्वमादित्यस्य, सर्वरूपत्वाद्वा, सर्वाणि रूपाणि हि त्वाष्ट्राणि यतोऽतो वा विश्वरूप आदित्यः; | फिर उसने पुलुषके पुत्र सत्ययज्ञसे कहा—'हे प्राचीनयोग्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' तब उसने 'हे पूज्य राजन् ! मैं आदित्यकी ही उपासना करता हूँ' ऐसा उत्तर दिया । शुक्लनीलादिरूप होनेके कारण आदित्यकी विश्वरूपता है, अथवा सर्वरूप होनेके कारण; या सारे रूप त्वष्टाके ही हैं, इस लिये आदित्य विश्वरूप है। उसकी |
५५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| तदुपासनात्तव बहु विश्वरूपमिहामुत्रार्थमुपकरणं दृश्यते कुले ॥ १ ॥ | उपासनाके कारण तुम्हारे कुलमें बहुत-सा विश्वरूप ऐहिक और पारलौकिक साधन दिखायी देता है ॥ १ ॥ |
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| किं च त्वामनु-- | तथा तुम्हारे पीछे— |
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प्रवृत्तोऽश्वतरोरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्ट्वेतदात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यो यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥
'खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ और दासियोंके सहित हार प्रवृत्त है। तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह आत्माका नेत्र ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा—'यदि तुम मेरे पास न आते तो अंधे हो जाते' ॥ २ ॥
| प्रवृत्तोऽश्वतरीभ्यां युक्तो रथाऽश्वतरीरथो दासीनिष्को दासीभिर्युक्तो निष्को हारो दासीनिष्कः । अत्स्यन्नमित्यादि समानम् । चक्षुर्वैश्वानरस्य तु सविता । तस्य समस्तबुद्धयोपासनादन्धोऽभविष्यश्चक्षुर्हीनोऽभविष्यो यन्मां नागमिष्य इति पूर्ववत् ॥ २ ॥ | 'अश्वतरोरथ—दो खच्चरियोंसे युक्त रथ और दासीनिष्क—दासियोंसे युक्त निष्क यानी हार प्रवृत्त है। 'अत्स्यन्नम्' इत्यादिका तात्पर्य पूर्ववत् है। किंतु सूर्य वैश्वानरका नेत्र ही है। उसकी समस्त बुद्धिसे उपासना करनेके कारण, यदि तुम मेरे पास न आते तो अन्धे हो जाते'—ऐसा पूर्ववत् जानना चाहिये ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥
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</center>चतुर्दश खण्ड
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अश्वपति और इन्द्रद्युम्नका संवाद
अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्व-
मात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष
वै पृथग्वर्त्मात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वां
पृथग्बलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥
तदनन्तर राजाने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्नसे कहा—'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला—'हे पूज्य राजन् ! मैं वायुकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजाने कहा— ] 'जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही पृथग्वर्त्मा वैश्वानर आत्मा है; इसीसे तुम्हारे प्रति पृथक्-पृथक् उपहार आते हैं और तुम्हारे पीछे पृथक् पृथक् रथकी पङ्क्तियाँ चलती हैं' ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्से इत्यादि समानम् । पृथग्वर्त्मा नाना वर्त्मानि यस्य वायोरावहोद्वहादिभिर्भेदैर्वर्तमानस्य सोऽयं पृथग्वर्त्मा वायुः । तस्मात्पृथग्वर्त्मात्मनो वैश्वानरस्योपासनात्पृ- | तदनन्तर राजाने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्नसे कहा—'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । पृथग्वर्त्मा—आवह, उद्वह आदि भेदोंसे विद्यमान जिस वायुके अनेकों मार्ग हैं वह वायु पृथग्वर्त्मा है । 'अतः पृथग्वर्त्मा वैश्वानर आत्माकी उपासना करनेके कारण तुम्हारे पास पृथक् |
५५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| थङ्नानादिकास्त्वां बलयो वस्त्रा-न्नादिलक्षणा बलय आयन्त्या-गच्छन्ति । पृथग्रथश्रेणयो रथ-पङ्क्तयोऽपि त्वामनुयन्ति ॥ १ ॥ | —नाना दिशाओंसे वस्त्र एवं अन्नादिरूप उपहार आते हैं; तथा पृथक्-पृथक् रथश्रेणियाँ—रथकी पङ्क्तियाँ भी तुम्हारे पीछे चलती हैं'१ |
—: ० :—
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥
'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो कोई इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है । किंतु यह आत्माका प्राण ही है'—ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा प्राण उत्क्रमण कर जाता' ॥२॥
| अत्स्यन्नमित्यादि समानम् ।<br><br>प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच<br><br>प्राणस्ते तवोदक्रमिष्यदुत्क्रान्तोऽभविष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ | 'अत्स्यन्नम्' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है । 'किंतु यह आत्माका प्राण ही है' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा प्राण उत्क्रमण कर जाता अर्थात् उत्क्रान्त हो जाता' ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१४॥
पञ्चदश खण्ड
一: ० :一
अश्वपति और जनका संवाद
अथ होवाच जनँशार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमु- पास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥
तदनन्तर राजाने जनसे कहा—'हे शार्कराक्ष्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'हे पूज्य राजन् ! मैं आकाशकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला- ] 'यह निश्चय ही बहुलसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है जिसकी कि तुम उपासना करते हो । इसीसे तुम प्रजा और धनके कारण बहुल हो' ॥ १ ॥
| अथ होवाच जनमित्यादि समानम् । एष वै बहुल आत्मा वैश्वानरः । बहुलत्वमाकाशस्य सर्वगतत्वाद्वहुलगुणोपासनाच्च । त्वं बहुलोऽसि प्रजया च पुत्रपौत्रादिलक्षणया धनेन च हिरण्यादिना ॥ १ ॥ | 'फिर उसने जनसे कहा' इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है। यह निश्चय ही बहुलसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है । सर्वगत होनेके कारण तथा बहुल-गुणरूपसे उपासित होनेके कारण आकाशका बहुलत्व ( पूर्णत्व ) है । इसीसे तुम पुत्र पौत्रादिरूप प्रजा और सुवर्णादि धनसे बहुल ( परिपूर्ण ) हो ॥ १ ॥ |
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अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर-
५१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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मुपास्ते संदेहस्त्वेष आत्मन इति होवाच संदेहस्ते व्यशीर्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥
'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो । जो इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है । किंतु यह आत्माका संदेह (शरीरका मध्यभाग) ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा संदेह (शरीरका मध्यभाग) नष्ट हो जाता' ॥ २ ॥
| संदेहस्त्वेष संदेहो मध्यं शरीरं वैश्वानरस्य । दिहेरुपचयार्थत्वान्मांसरुधिरास्थ्यादिभिश्च बहुलं शरीरं तत्संदेहः, ते तव शरीरं व्यशीर्यच्छीर्णमभविष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ | किंतु यह वैश्वानरका संदेह ही है । शरीरके मध्यभागको संदेह कहते हैं । क्योंकि 'दिह्' धातु उपचय (वृद्धि) अर्थवाला है और शरीर मांस, रुधिर एवं अस्थि आदिसे बहुल (उपचित) है इसलिये वह संदेह है, तुम्हारा वह संदेह अर्थात् शरीर नष्ट हो जाता, यदि तुम मेरे पास न आते ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥
षोडश खण्ड
--: ० :--
अश्वपति और बुडिलका संवाद
अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वꣳ रयिमान्पुष्टिमानसि ॥ १ ॥
फिर उसने अश्वतराश्वके पुत्र बुडिलसे कहा—'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'हे पूज्य राजन् ! मैं तो जलकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला—] 'जिसकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही रयिसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है; इसीसे तुम रयिमान् (धनवान्) और पुष्टिमान् हो' ॥ १ ॥
| अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विमित्यादि समानम् । एष वै रयिरात्मा वैश्वानरो धनरूपः, अद्भ्योऽन्नं ततो धनमिति । तस्माद्रयिमान् धनवांस्त्वं पुष्टिमांश्च शरीरेण, पुष्टेश्चान्ननिमित्तत्वात् ॥ १ ॥ | 'तदनन्तर राजाने अश्वतराश्वके पुत्र बुडिलसे कहा'—इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है। यह निश्चय ही धनरूप रयिसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है; क्योंकि जलसे अन्न होता है और अन्नसे धन। इसीसे तुम रयिमान् यानी धनवान् हो तथा शरीरसे पुष्टिमान् हो, क्योंकि पुष्टि अन्नके कारण हुआ करती है ॥ १ ॥ |
—: ० :—
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर-
५५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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मुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥
'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो पुरुष इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह आत्माका बस्ति ही है'—ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा बस्तिस्थान फट जाता' ॥ २ ॥
| बस्तिस्त्वेष आत्मनो वैश्वानरस्य बस्तिर्मूत्रसंग्रहस्थानं बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्भिन्नोऽभविष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ | 'यह वैश्वानर आत्माका बस्ति है; बस्ति मूत्रसंग्रहके स्थानको कहते हैं। 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा बस्ति भिन्न—विदीर्ण हो जाता'—ऐसा राजाने कहा ॥२॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥
सप्तदश खण्ड
अश्वपति और उद्दालकका संवाद
अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मान-
मुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै
प्रतिष्ठात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं
प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥ १ ॥
तत्पश्चात् राजाने अरुणके पुत्र उद्दालकसे कहा—'हे गौतम ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'हे पूज्य राजन् ! मैं तो पृथिवीकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला— ] 'जिसकी तुम उपासना करते हो यह निश्चय ही प्रतिष्ठासंज्ञक वैश्वानर आत्मा है । इसीसे तुम प्रजा और पशुओंके कारण प्रतिष्ठित हो' ॥ १ ॥
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं
भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर-
मुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्ला-
स्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥
'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो कोई इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह आत्माके चरण ही हैं' ऐसा उसने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारे चरण शिथिल हो जाते' ॥ २ ॥
५५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| अथ होवाचोद्दालकमित्यादि समानम् । पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाच । एष वै प्रतिष्ठा पादौ वैश्वानरस्य । पादौ ते व्यम्लास्येतां विम्लानावेभविष्यतां श्लथीभूतौ यन्मां नागमिष्य इति ॥ १-२ ॥ | 'फिर उद्दालकसे कहा' इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है। [उद्दालकने कहा-] 'हे पूज्य राजन् ! मैं पृथिवीकी ही उपासना करता हूँ' [ राजा बोला-] 'यह निश्चय ही वैश्वानर आत्माकी प्रतिष्ठा यानी उसके चरण हैं। यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारे चरण विशेषरूपसे म्लान अर्थात् शिथिल हो जाते' ॥१-२॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥
</div>अष्टादश खण्ड
-: ० :-
अश्वपतिका उपदेश—वैश्वानरकी समस्तोपासनाका फल
तान्होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वांसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥ १ ॥
राजाने उनसे कहा—'तुम ये सब लोग इस वैश्वानर आत्माको अलग-सा जानकर अन्न भक्षण करते हो। जो कोई 'यही मैं हूँ' इस प्रकार अभिमानका विषय होनेवाले इस प्रादेशमात्र वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह समस्त लोकोंमें, समस्त प्राणियोंमें और समस्त आत्माओंमें अन्न भक्षण करता है' ॥ १ ॥
| तान्यथोक्तवैश्वानरदर्शनवतो होवाच—एते यूयम्, वै खल्वित्यनर्थकौ, यूयं पृथगिवापृथक्सन्तमिममेकं वैश्वानरमात्मानं विद्वांसोऽन्नमत्थ, परिच्छिन्नात्मबुद्धयेत्येतत्—हस्तिदर्शन इव जात्यन्धाः । | यहाँ 'वै' और 'खलु' ये दो निपात अर्थशून्य हैं। उन उपर्युक्त वैश्वानर दृष्टिवालोंसे राजाने कहा—ये तुमलोग अपनेसे अभिन्न होनेपर भी इस वैश्वानर आत्माको पृथक्-सा जानकर अन्न भक्षण करते हो। तात्पर्य यह है कि जन्मान्ध पुरुषोंके हस्तिदर्शनके समान* तुम परिच्छिन्न आत्मबुद्धिसे उसे जानते हो। |
- अर्थात् जिस प्रकार कुछ जन्मान्ध, जिन्होंने हाथीको कभी नहीं देखा, उसके आकारका अनुमान करने लगें तो उनमेंसे जो पुरुष हाथीके सूँड, शिर, कान अथवा टाँग आदि जिस अवयवका स्पर्श करता है वह उसे ही हाथीका समग्ररूप समझने लगता है, उसी प्रकार तुम सबकी भी वैश्वानरके अवयवोंमें समग्र वैश्वानरबुद्धि हो रही है।
५६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| यस्त्वेतमेवं यथोक्तावयवैर्द्युमूर्द्धादिभिः पृथिवीपादान्तैर्विशिष्टमेकं प्रादेशमात्रम्, प्रादेशैर्द्युमूर्द्धादिभिः पृथिवीपादान्तैरध्यात्मं मीयते ज्ञायत इति प्रादेशमात्रम् । मुखादिषु वा करणेष्वत्तृत्वेन मीयत इति प्रादेशमात्रः। द्युलोकादिपृथिव्यन्तप्रदेशपरिमाणो वा प्रादेशमात्रः । प्रकर्षेण शास्त्रेणादिश्यन्त इति प्रादेशा द्युलोकादय एव तावत्परिमाणः प्रादेशमात्रः । | किंतु जो कोई द्युलोकरूप मस्तकसे लेकर पृथिवीरूप पादपर्यन्त इन पूर्वोक्त अवयवोंसे युक्त एक प्रादेशमात्र—जो प्रत्यगात्मामें ही द्युमूर्द्धासे लेकर पृथिवीपादपर्यन्त प्रादेशोंद्वारा मित होता है अर्थात् जाना जाता है, उस प्रादेशमात्र आत्माकी [उपासना करता है]। अथवा मुख आदि करणोंमें भोक्तारूपसे मित होता है इसलिये प्रादेशमात्र है। या द्युलोकसे लेकर पृथिवीपर्यन्त प्रदेश ही उसका परिमाण है इसलिये प्रादेशमात्र है। अथवा शास्त्रद्वारा प्रकर्षसे आदिष्ट होते हैं इसलिये द्युलोक आदि प्रादेश हैं उतने ही परिमाणवाला होनेसे प्रादेशमात्र है। | | शाखान्तरे तु मूर्धादिश्चिबुकप्रतिष्ठ इति प्रादेशमात्रं कल्पयन्ति, इह तु न तथाभिप्रेतः, 'तस्य ह वा एतस्यात्मनः' इत्याद्युपसंहारात् । | अन्य शाखामें तो मूर्धासे लेकर चिबुकपर्यन्त प्रतिष्ठित है इसलिये उसे प्रादेशमात्र कल्पित करते हैं, किंतु यहाँ वह इस प्रकार अभिप्रेत नहीं है, क्योंकि 'उस इस आत्माका [द्युलोक ही मूर्धा है]' इत्यादि [सार्वत्म्य-] रूपसे उपसंहार किया गया है। | | प्रत्यगात्मतयाभिविमीयतेऽहमिति ज्ञायत इत्यभिविमानस्तमेत- | वह प्रत्यगात्मरूपसे अभिविमान किया जाता है अर्थात् 'मैं' इस प्रकार जाना जाता है; इसलिये अभिविमान है, उस इस वैश्वानर |
खण्ड १८] शाङ्करभाष्यार्थ ५४१
| मात्मानं वैश्वानरम्-विश्वान्नरान्नयति पुण्यपापानुरूपां गतिं सर्वात्मैष ईश्वरो वैश्वानरो विश्वो नर एववा सर्वात्मत्वात्, विश्वैर्वा नरैः प्रत्यगात्मतया प्रविभज्य नीयत इति वैश्वानरस्तमेवमुपास्ते यः, सोऽद्वन्नन्नादी; सर्वेषु लोकेषु द्युलोकादिषु सर्वेषु भूतेषु चराचरेषु सर्वेष्वात्मसु शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिषु तेषु ह्यात्मकल्पनाव्यपदेशः प्राणिनाम्, अन्नमत्ति, वैश्वानरवित्सर्वात्मा सन्नन्नमत्ति, न यथाज्ञः पिण्डमात्राभिमानः सन्नित्यर्थः ॥ १ ॥ | आत्माकी—यह सर्वात्मा ईश्वर सम्पूर्ण नरोंको पुण्य-पापानुरूप गतिको ले जाता है इसलिये, अथवा सर्वात्मा होनेके कारण विश्व (सर्व) नरस्वरूप है इसलिये, 'वैश्वानर' है, या समस्त नरोंद्वारा अपने प्रत्यगात्मरूपसे विभक्त करके ले जाया जाता है इसलिये 'वैश्वानर' है—उसकी जो इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता हुआ अन्नादी (अन्न खानेवाला) होता है, द्युलोकादि समस्त लोकोंमें, सम्पूर्ण चराचर भूतोंमें तथा शरीर; इन्द्रिय, मन और बुद्धिरूप समस्त आत्माओंमें—क्योंकि इन्हींमें प्राणियोंकी आत्मकल्पनाका निर्देश किया जाता है—अन्न भक्षण करता है। तात्पर्य यह है कि वैश्वानरवेत्ता सर्वात्मा होकर अन्न भक्षण करता है अज्ञानियोंके समान पिण्डमात्रमें अभिमान करके अन्न नहीं खाता। १। |
-- : ॐ : --
वैश्वानरका साङ्गोपाङ्ग स्वरूप
| कस्मादेवम् ? यस्मात्--- | ऐसा क्यों है ? क्योंकि— |
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तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ २ ॥
५६२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
५६२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
उस इस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा ( द्युलोक ) है, चक्षु विश्वरूप ( सूर्य ) है, प्राण पृथग्वर्त्मा ( वायु ) है, देहका मध्यभाग बहुल ( आकाश ) है, बस्ति ही रयि ( जल ) है, पृथिवी ही दोनों चरण हैं, वक्षःस्थल वेदी है, लोम दर्भ है, हृदय गार्हपत्याग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन है और मुख आहवनीय है ॥ २ ॥
| तस्य ह वै प्रकृतस्यैवैतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादौ । अथवा विध्यर्थमेतद्वचनमेवमुपास्य इति ।<br><br>अथेदानीं वैश्वानरविदो भोजनेऽग्निहोत्रं संपिपादयिषन्नाह—एतस्य वैश्वानरस्य भोक्तुरुर एव वेदिराकारसामान्यात् । लोमानि बर्हिर्वेद्यामिवोरसि लोमान्यास्तीर्णानि दृश्यन्ते । हृदयं गार्हपत्यो हृदयाद्धि मनः प्रणीतमिवानन्तरीभवत्यतोऽन्वाहार्यपचनोऽग्निर्मनः । आस्यं मुखमाहवनीय इवाहवनीयो हूयतेऽस्मिन्नन्नमिति ॥ २ ॥ | उस इस प्रकृत वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा है, चक्षु विश्वरूप है, प्राण पृथग्वर्त्मारूप वायु है, शरीरका मध्यभाग बहुल है, बस्ति ही रयि है और पृथिवी ही चरण हैं । अथवा यह वाक्य विधिके लिये है; अर्थात् इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये ।<br><br>अब इससे आगे वैश्वानरवेत्ताके भोजनमें अग्निहोत्रका निश्चय करनेकी इच्छासे राजा कहता है—इस वैश्वानर यानी भोक्ताका वक्षःस्थल ही आकारमें समान होनेके कारण वेदी है, लोम कुशाएँ हैं क्योंकि वेदीमें बिछे हुए कुशोंके समान वे वक्षःस्थलपर बिछे हुए दिखायी देते हैं, हृदय गार्हपत्याग्नि है क्योंकि मन हृदयसे ही उत्पन्न-सा होकर उसका अन्तर्वर्ती होता है; इसीलिये मन अन्वाहार्यपचन अग्नि है तथा आस्य—मुख आहवनीयाग्निके समान आहवनीय है क्योंकि इसमें अन्नका हवन होता है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये अष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१८॥
एकोनविंश खण्ड
भोजनकी अग्निहोत्रत्वसिद्धिके लिये 'प्राणाय स्वाहा' इस पहली आहुतिका वर्णन
तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयꣳस यां प्रथमा-
माहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृ-
प्यति ॥ १ ॥
अतः जो अन्न पहले आवे, उसका हवन करना चाहिये, उस समय वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे 'प्राणाय स्वाहा' ऐसा कह-कर दे। इस प्रकार प्राण तृप्त होता है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| तत्तत्रैवं सति यद्भक्तं भोजन-काल आगच्छेद्भोजनार्थम्, तद्धोमीयं तद्धोतव्यम्, अग्निहोत्रसंपन्मात्रस्य विवक्षितत्वा-न्नाग्निहोत्राङ्गेतिकर्तव्यताप्रा-प्तिरिह; स भोक्ता यां प्रथमा-माहुतिं जुहुयात्तां कथं जुहु-यात् ? इत्याह-प्राणाय स्वाहे-त्यनेन मन्त्रेणाहुतिशब्दादवदा-नप्रमाणमन्नं प्रक्षिपेदित्यर्थः ।<br><br>तेन प्राणस्तृप्यति ॥ १ ॥ | अतः ऐसा होनेके कारण भोजनके समय जो भात (अन्न) आवे उससे हवन करना चाहिये। यहाँ अग्निहोत्रकी कल्पनामात्र विवक्षित है इसलिये अग्निहोत्रकी अङ्गभूत इतिकर्तव्यता (सहकारी साधनों) की प्राप्ति नहीं है। वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे किस प्रकार दे? सो श्रुति बतलाती है—'प्राणाय स्वाहा' इस मन्त्रसे, यहाँ 'आहुति' शब्द होनेके कारण अवदानप्रमाण (जितना कि आहुतिमें विहित है उतना) अन्न [मुखमें] डाले—ऐसा इसका तात्पर्य है। उससे प्राण तृप्त होता है ॥ १ ॥ |
५६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किं च द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
प्राणके तृप्त होनेपर नेत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, नेत्रेन्द्रियके तृप्त होनेपर सूर्य तृप्त होता है, सूर्यके तृप्त होनेपर द्युलोक तृप्त होता है तथा द्युलोकके तृप्त होनेपर जिस किसीपर द्युलोक और आदित्य (स्वामिभावसे) अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है और उसकी तृप्ति होनेपर स्वयं भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥
| प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति, चक्षुरादित्यो द्यौश्चेत्यादि तृप्यति यच्चान्यद्द्यौश्चादित्यश्च स्वामित्वेनाधितिष्ठतस्तच्च तृप्यति, तस्य तृप्तिमनु स्वयं भुञ्जानस्तृप्यत्येवं प्रत्यक्षम्। किञ्च प्रजादिभिश्च। तेजः शरीरस्था दीप्तिः, उज्ज्वलत्वं प्रागल्भ्यं वा; ब्रह्मवर्चसं वृत्तस्वाध्यायनिमित्तं तेजः ॥२॥ | प्राणके तृप्त होनेपर नेत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, इस प्रकार नेत्रेन्द्रिय, आदित्य, द्युलोक इत्यादि तृप्त होते हैं तथा और भी जिस किसीपर द्युलोक और आदित्य स्वामिभावसे अधिष्ठित हैं वह सब तृप्त होता है। तथा उसकी तृप्तिके पश्चात् स्वयं भोजन करनेवाला भी तृप्त होता है—यह तो प्रत्यक्ष ही है। यही नहीं, भोक्ता प्रजादिके द्वारा भी तृप्त होता है। शरीरस्थ दीप्ति, उज्ज्वलता अथवा प्रगल्भताका नाम 'तेज' है तथा सदाचार और स्वाध्यायके कारण होनेवाला तेज 'ब्रह्मतेज' है ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये एकोनविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥
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विंश खण्ड
'व्यानाय स्वाहा' इस दूसरी आहुतिका वर्णन
अथ यां द्वितीयां जुहुयाद्व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥ व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किं च दिशश्च चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥२॥
तत्पश्चात् जो दूसरी आहुति दे उसे 'व्यानाय स्वाहा' ऐसा कहकर देना चाहिये। इससे व्यान तृप्त होता है ॥ १ ॥ व्यानके तृप्त होनेपर श्रोत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, श्रोत्रके तृप्त होनेपर चन्द्रमा तृप्त होता है, चन्द्रमाके तृप्त होनेपर दिशाएँ तृप्त होती हैं तथा दिशाओंके तृप्त होनेपर जिस किसीपर चन्द्रमा और दिशाएँ [ स्वामिभावसे ] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है। उसकी तृप्तिके पश्चात् वह भोक्ता प्रजा पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
विंशखण्डः सम्पूर्णः ॥ २० ॥
एकविंशं खण्ड
‘अपानाय स्वाहा’ इस तीसरी आहुतिका वर्णन
अथ या तृतीयां जुहुयात्तां जुहुयादपानाय स्वाहेत्यपानस्तृप्यति ॥ १ ॥ अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किं च पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
फिर जो तीसरी आहुति दे उसे ‘अपानाय स्वाहा’ ऐसा कहकर देना चाहिये; इससे अपान तृप्त होता है ॥ १ ॥ अपानके तृप्त होनेपर वागिन्द्रिय तृप्त होती है, वाक्के तृप्त होनेपर अग्नि तृप्त होता है, अग्निके तृप्त होनेपर पृथिवी तृप्त होती है तथा पृथिवीके तृप्त होनेपर जिस किसीपर पृथिवी और अग्नि [ स्वामिभावसे ] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके पश्चात् भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
एकविंशखण्डः सम्पूर्णः ॥ २१ ॥
द्वाविंश खण्ड
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‘समानाय स्वाहा’ इस चौथी आहुतिका वर्णन
अथ यां चतुर्थीं जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वा-
हेति समानस्तृप्यति ॥ १॥ समाने तृप्यति मनस्तृप्यति
मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तृ-
प्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किं च विद्युच्च पर्जन्य-
श्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया
पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
तदनन्तर जो चौथी आहुति दे उसे ‘समानाय स्वाहा’ ऐसा कहकर देना चाहिये; इससे समान तृप्त होता है ॥ १ ॥ समानके तृप्त होनेपर मन तृप्त होता है, मनके तृप्त होनेपर पर्जन्य तृप्त होता है, पर्जन्यके तृप्त होनेपर विद्युत् तृप्त होती है तथा विद्युत्के तृप्त होनेपर जिस किसीके ऊपर विद्युत् और पर्जन्य अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके अनन्तर भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
द्वाविंशखण्डः सम्पूर्णः ॥ २२ ॥
त्रयोविंश खण्ड
'उदानाय स्वाहा' इस पाँचवीं आहुतिका वर्णन
अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहे- त्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥ उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृ- प्यत्याकाशे तृप्यति यत्किं च वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठ- तस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिर- न्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
फिर जो पाँचवीं आहुति दे उसे 'उदानाय स्वाहा' ऐसा कहकर देना चाहिये, इससे उदान तृप्त होता है ॥ १ ॥ उदानके तृप्त होनेपर त्वचा तृप्त होती है, त्वचाके तृप्त होनेपर वायु तृप्त होता है, वायुके तृप्त होनेपर आकाश तृप्त होता है तथा आकाशके तृप्त होनेपर जिस किसीपर वायु और आकाश [स्वामिभावसे] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, और उसकी तृप्तिके पश्चात् स्वयं भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥
| अथ यां द्वितीयां तृतीयां चतुर्थीं पञ्चमीमिति समानम् ॥ ५ । २० — ५ । २३ ॥ | 'अथ यां द्वितीयां तृतीयां चतुर्थीं पञ्चमीम्' इत्यादि श्रुतियोंका अर्थ समान है॥ ५ । २० — ५ । २३॥ |
इति च्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये त्रयोविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २३ ॥