भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 564, कुल 978 में से

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पृष्ठ 564
५६०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| यस्त्वेतमेवं यथोक्तावयवैर्द्युमूर्द्धादिभिः पृथिवीपादान्तैर्विशिष्टमेकं प्रादेशमात्रम्, प्रादेशैर्द्युमूर्द्धादिभिः पृथिवीपादान्तैरध्यात्मं मीयते ज्ञायत इति प्रादेशमात्रम् । मुखादिषु वा करणेष्वत्तृत्वेन मीयत इति प्रादेशमात्रः। द्युलोकादिपृथिव्यन्तप्रदेशपरिमाणो वा प्रादेशमात्रः । प्रकर्षेण शास्त्रेणादिश्यन्त इति प्रादेशा द्युलोकादय एव तावत्परिमाणः प्रादेशमात्रः । | किंतु जो कोई द्युलोकरूप मस्तकसे लेकर पृथिवीरूप पादपर्यन्त इन पूर्वोक्त अवयवोंसे युक्त एक प्रादेशमात्र—जो प्रत्यगात्मामें ही द्युमूर्द्धासे लेकर पृथिवीपादपर्यन्त प्रादेशोंद्वारा मित होता है अर्थात् जाना जाता है, उस प्रादेशमात्र आत्माकी [उपासना करता है]। अथवा मुख आदि करणोंमें भोक्तारूपसे मित होता है इसलिये प्रादेशमात्र है। या द्युलोकसे लेकर पृथिवीपर्यन्त प्रदेश ही उसका परिमाण है इसलिये प्रादेशमात्र है। अथवा शास्त्रद्वारा प्रकर्षसे आदिष्ट होते हैं इसलिये द्युलोक आदि प्रादेश हैं उतने ही परिमाणवाला होनेसे प्रादेशमात्र है। | | शाखान्तरे तु मूर्धादिश्चिबुकप्रतिष्ठ इति प्रादेशमात्रं कल्पयन्ति, इह तु न तथाभिप्रेतः, 'तस्य ह वा एतस्यात्मनः' इत्याद्युपसंहारात् । | अन्य शाखामें तो मूर्धासे लेकर चिबुकपर्यन्त प्रतिष्ठित है इसलिये उसे प्रादेशमात्र कल्पित करते हैं, किंतु यहाँ वह इस प्रकार अभिप्रेत नहीं है, क्योंकि 'उस इस आत्माका [द्युलोक ही मूर्धा है]' इत्यादि [सार्वत्म्य-] रूपसे उपसंहार किया गया है। | | प्रत्यगात्मतयाभिविमीयतेऽहमिति ज्ञायत इत्यभिविमानस्तमेत- | वह प्रत्यगात्मरूपसे अभिविमान किया जाता है अर्थात् 'मैं' इस प्रकार जाना जाता है; इसलिये अभिविमान है, उस इस वैश्वानर |