भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 565, कुल 978 में से

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पृष्ठ 565

खण्ड १८] शाङ्करभाष्यार्थ ५४१


| मात्मानं वैश्वानरम्-विश्वान्नरान्नयति पुण्यपापानुरूपां गतिं सर्वात्मैष ईश्वरो वैश्वानरो विश्वो नर एववा सर्वात्मत्वात्, विश्वैर्वा नरैः प्रत्यगात्मतया प्रविभज्य नीयत इति वैश्वानरस्तमेवमुपास्ते यः, सोऽद्वन्नन्नादी; सर्वेषु लोकेषु द्युलोकादिषु सर्वेषु भूतेषु चराचरेषु सर्वेष्वात्मसु शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिषु तेषु ह्यात्मकल्पनाव्यपदेशः प्राणिनाम्, अन्नमत्ति, वैश्वानरवित्सर्वात्मा सन्नन्नमत्ति, न यथाज्ञः पिण्डमात्राभिमानः सन्नित्यर्थः ॥ १ ॥ | आत्माकी—यह सर्वात्मा ईश्वर सम्पूर्ण नरोंको पुण्य-पापानुरूप गतिको ले जाता है इसलिये, अथवा सर्वात्मा होनेके कारण विश्व (सर्व) नरस्वरूप है इसलिये, 'वैश्वानर' है, या समस्त नरोंद्वारा अपने प्रत्यगात्मरूपसे विभक्त करके ले जाया जाता है इसलिये 'वैश्वानर' है—उसकी जो इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता हुआ अन्नादी (अन्न खानेवाला) होता है, द्युलोकादि समस्त लोकोंमें, सम्पूर्ण चराचर भूतोंमें तथा शरीर; इन्द्रिय, मन और बुद्धिरूप समस्त आत्माओंमें—क्योंकि इन्हींमें प्राणियोंकी आत्मकल्पनाका निर्देश किया जाता है—अन्न भक्षण करता है। तात्पर्य यह है कि वैश्वानरवेत्ता सर्वात्मा होकर अन्न भक्षण करता है अज्ञानियोंके समान पिण्डमात्रमें अभिमान करके अन्न नहीं खाता। १। |

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वैश्वानरका साङ्गोपाङ्ग स्वरूप

कस्मादेवम् ? यस्मात्---ऐसा क्यों है ? क्योंकि—

तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ २ ॥

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