भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 563, कुल 978 में से

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पृष्ठ 563

अष्टादश खण्ड

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अश्वपतिका उपदेश—वैश्वानरकी समस्तोपासनाका फल

तान्होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वांसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥ १ ॥

राजाने उनसे कहा—'तुम ये सब लोग इस वैश्वानर आत्माको अलग-सा जानकर अन्न भक्षण करते हो। जो कोई 'यही मैं हूँ' इस प्रकार अभिमानका विषय होनेवाले इस प्रादेशमात्र वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह समस्त लोकोंमें, समस्त प्राणियोंमें और समस्त आत्माओंमें अन्न भक्षण करता है' ॥ १ ॥

| तान्यथोक्तवैश्वानरदर्शनवतो होवाच—एते यूयम्, वै खल्वित्यनर्थकौ, यूयं पृथगिवापृथक्सन्तमिममेकं वैश्वानरमात्मानं विद्वांसोऽन्नमत्थ, परिच्छिन्नात्मबुद्धयेत्येतत्—हस्तिदर्शन इव जात्यन्धाः । | यहाँ 'वै' और 'खलु' ये दो निपात अर्थशून्य हैं। उन उपर्युक्त वैश्वानर दृष्टिवालोंसे राजाने कहा—ये तुमलोग अपनेसे अभिन्न होनेपर भी इस वैश्वानर आत्माको पृथक्-सा जानकर अन्न भक्षण करते हो। तात्पर्य यह है कि जन्मान्ध पुरुषोंके हस्तिदर्शनके समान* तुम परिच्छिन्न आत्मबुद्धिसे उसे जानते हो। |


  • अर्थात् जिस प्रकार कुछ जन्मान्ध, जिन्होंने हाथीको कभी नहीं देखा, उसके आकारका अनुमान करने लगें तो उनमेंसे जो पुरुष हाथीके सूँड, शिर, कान अथवा टाँग आदि जिस अवयवका स्पर्श करता है वह उसे ही हाथीका समग्ररूप समझने लगता है, उसी प्रकार तुम सबकी भी वैश्वानरके अवयवोंमें समग्र वैश्वानरबुद्धि हो रही है।
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