छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| यस्त्वेतमेवं यथोक्तावयवैर्द्युमूर्द्धादिभिः पृथिवीपादान्तैर्विशिष्टमेकं प्रादेशमात्रम्, प्रादेशैर्द्युमूर्द्धादिभिः पृथिवीपादान्तैरध्यात्मं मीयते ज्ञायत इति प्रादेशमात्रम् । मुखादिषु वा करणेष्वत्तृत्वेन मीयत इति प्रादेशमात्रः। द्युलोकादिपृथिव्यन्तप्रदेशपरिमाणो वा प्रादेशमात्रः । प्रकर्षेण शास्त्रेणादिश्यन्त इति प्रादेशा द्युलोकादय एव तावत्परिमाणः प्रादेशमात्रः । | किंतु जो कोई द्युलोकरूप मस्तकसे लेकर पृथिवीरूप पादपर्यन्त इन पूर्वोक्त अवयवोंसे युक्त एक प्रादेशमात्र—जो प्रत्यगात्मामें ही द्युमूर्द्धासे लेकर पृथिवीपादपर्यन्त प्रादेशोंद्वारा मित होता है अर्थात् जाना जाता है, उस प्रादेशमात्र आत्माकी [उपासना करता है]। अथवा मुख आदि करणोंमें भोक्तारूपसे मित होता है इसलिये प्रादेशमात्र है। या द्युलोकसे लेकर पृथिवीपर्यन्त प्रदेश ही उसका परिमाण है इसलिये प्रादेशमात्र है। अथवा शास्त्रद्वारा प्रकर्षसे आदिष्ट होते हैं इसलिये द्युलोक आदि प्रादेश हैं उतने ही परिमाणवाला होनेसे प्रादेशमात्र है। | | शाखान्तरे तु मूर्धादिश्चिबुकप्रतिष्ठ इति प्रादेशमात्रं कल्पयन्ति, इह तु न तथाभिप्रेतः, 'तस्य ह वा एतस्यात्मनः' इत्याद्युपसंहारात् । | अन्य शाखामें तो मूर्धासे लेकर चिबुकपर्यन्त प्रतिष्ठित है इसलिये उसे प्रादेशमात्र कल्पित करते हैं, किंतु यहाँ वह इस प्रकार अभिप्रेत नहीं है, क्योंकि 'उस इस आत्माका [द्युलोक ही मूर्धा है]' इत्यादि [सार्वत्म्य-] रूपसे उपसंहार किया गया है। | | प्रत्यगात्मतयाभिविमीयतेऽहमिति ज्ञायत इत्यभिविमानस्तमेत- | वह प्रत्यगात्मरूपसे अभिविमान किया जाता है अर्थात् 'मैं' इस प्रकार जाना जाता है; इसलिये अभिविमान है, उस इस वैश्वानर |
खण्ड १८] शाङ्करभाष्यार्थ ५४१
| मात्मानं वैश्वानरम्-विश्वान्नरान्नयति पुण्यपापानुरूपां गतिं सर्वात्मैष ईश्वरो वैश्वानरो विश्वो नर एववा सर्वात्मत्वात्, विश्वैर्वा नरैः प्रत्यगात्मतया प्रविभज्य नीयत इति वैश्वानरस्तमेवमुपास्ते यः, सोऽद्वन्नन्नादी; सर्वेषु लोकेषु द्युलोकादिषु सर्वेषु भूतेषु चराचरेषु सर्वेष्वात्मसु शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिषु तेषु ह्यात्मकल्पनाव्यपदेशः प्राणिनाम्, अन्नमत्ति, वैश्वानरवित्सर्वात्मा सन्नन्नमत्ति, न यथाज्ञः पिण्डमात्राभिमानः सन्नित्यर्थः ॥ १ ॥ | आत्माकी—यह सर्वात्मा ईश्वर सम्पूर्ण नरोंको पुण्य-पापानुरूप गतिको ले जाता है इसलिये, अथवा सर्वात्मा होनेके कारण विश्व (सर्व) नरस्वरूप है इसलिये, 'वैश्वानर' है, या समस्त नरोंद्वारा अपने प्रत्यगात्मरूपसे विभक्त करके ले जाया जाता है इसलिये 'वैश्वानर' है—उसकी जो इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता हुआ अन्नादी (अन्न खानेवाला) होता है, द्युलोकादि समस्त लोकोंमें, सम्पूर्ण चराचर भूतोंमें तथा शरीर; इन्द्रिय, मन और बुद्धिरूप समस्त आत्माओंमें—क्योंकि इन्हींमें प्राणियोंकी आत्मकल्पनाका निर्देश किया जाता है—अन्न भक्षण करता है। तात्पर्य यह है कि वैश्वानरवेत्ता सर्वात्मा होकर अन्न भक्षण करता है अज्ञानियोंके समान पिण्डमात्रमें अभिमान करके अन्न नहीं खाता। १। |
-- : ॐ : --
वैश्वानरका साङ्गोपाङ्ग स्वरूप
| कस्मादेवम् ? यस्मात्--- | ऐसा क्यों है ? क्योंकि— |
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तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ २ ॥
५६२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
५६२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
उस इस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा ( द्युलोक ) है, चक्षु विश्वरूप ( सूर्य ) है, प्राण पृथग्वर्त्मा ( वायु ) है, देहका मध्यभाग बहुल ( आकाश ) है, बस्ति ही रयि ( जल ) है, पृथिवी ही दोनों चरण हैं, वक्षःस्थल वेदी है, लोम दर्भ है, हृदय गार्हपत्याग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन है और मुख आहवनीय है ॥ २ ॥
| तस्य ह वै प्रकृतस्यैवैतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादौ । अथवा विध्यर्थमेतद्वचनमेवमुपास्य इति ।<br><br>अथेदानीं वैश्वानरविदो भोजनेऽग्निहोत्रं संपिपादयिषन्नाह—एतस्य वैश्वानरस्य भोक्तुरुर एव वेदिराकारसामान्यात् । लोमानि बर्हिर्वेद्यामिवोरसि लोमान्यास्तीर्णानि दृश्यन्ते । हृदयं गार्हपत्यो हृदयाद्धि मनः प्रणीतमिवानन्तरीभवत्यतोऽन्वाहार्यपचनोऽग्निर्मनः । आस्यं मुखमाहवनीय इवाहवनीयो हूयतेऽस्मिन्नन्नमिति ॥ २ ॥ | उस इस प्रकृत वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा है, चक्षु विश्वरूप है, प्राण पृथग्वर्त्मारूप वायु है, शरीरका मध्यभाग बहुल है, बस्ति ही रयि है और पृथिवी ही चरण हैं । अथवा यह वाक्य विधिके लिये है; अर्थात् इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये ।<br><br>अब इससे आगे वैश्वानरवेत्ताके भोजनमें अग्निहोत्रका निश्चय करनेकी इच्छासे राजा कहता है—इस वैश्वानर यानी भोक्ताका वक्षःस्थल ही आकारमें समान होनेके कारण वेदी है, लोम कुशाएँ हैं क्योंकि वेदीमें बिछे हुए कुशोंके समान वे वक्षःस्थलपर बिछे हुए दिखायी देते हैं, हृदय गार्हपत्याग्नि है क्योंकि मन हृदयसे ही उत्पन्न-सा होकर उसका अन्तर्वर्ती होता है; इसीलिये मन अन्वाहार्यपचन अग्नि है तथा आस्य—मुख आहवनीयाग्निके समान आहवनीय है क्योंकि इसमें अन्नका हवन होता है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये अष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१८॥
एकोनविंश खण्ड
भोजनकी अग्निहोत्रत्वसिद्धिके लिये 'प्राणाय स्वाहा' इस पहली आहुतिका वर्णन
तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयꣳस यां प्रथमा-
माहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृ-
प्यति ॥ १ ॥
अतः जो अन्न पहले आवे, उसका हवन करना चाहिये, उस समय वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे 'प्राणाय स्वाहा' ऐसा कह-कर दे। इस प्रकार प्राण तृप्त होता है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| तत्तत्रैवं सति यद्भक्तं भोजन-काल आगच्छेद्भोजनार्थम्, तद्धोमीयं तद्धोतव्यम्, अग्निहोत्रसंपन्मात्रस्य विवक्षितत्वा-न्नाग्निहोत्राङ्गेतिकर्तव्यताप्रा-प्तिरिह; स भोक्ता यां प्रथमा-माहुतिं जुहुयात्तां कथं जुहु-यात् ? इत्याह-प्राणाय स्वाहे-त्यनेन मन्त्रेणाहुतिशब्दादवदा-नप्रमाणमन्नं प्रक्षिपेदित्यर्थः ।<br><br>तेन प्राणस्तृप्यति ॥ १ ॥ | अतः ऐसा होनेके कारण भोजनके समय जो भात (अन्न) आवे उससे हवन करना चाहिये। यहाँ अग्निहोत्रकी कल्पनामात्र विवक्षित है इसलिये अग्निहोत्रकी अङ्गभूत इतिकर्तव्यता (सहकारी साधनों) की प्राप्ति नहीं है। वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे किस प्रकार दे? सो श्रुति बतलाती है—'प्राणाय स्वाहा' इस मन्त्रसे, यहाँ 'आहुति' शब्द होनेके कारण अवदानप्रमाण (जितना कि आहुतिमें विहित है उतना) अन्न [मुखमें] डाले—ऐसा इसका तात्पर्य है। उससे प्राण तृप्त होता है ॥ १ ॥ |
५६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किं च द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
प्राणके तृप्त होनेपर नेत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, नेत्रेन्द्रियके तृप्त होनेपर सूर्य तृप्त होता है, सूर्यके तृप्त होनेपर द्युलोक तृप्त होता है तथा द्युलोकके तृप्त होनेपर जिस किसीपर द्युलोक और आदित्य (स्वामिभावसे) अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है और उसकी तृप्ति होनेपर स्वयं भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥
| प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति, चक्षुरादित्यो द्यौश्चेत्यादि तृप्यति यच्चान्यद्द्यौश्चादित्यश्च स्वामित्वेनाधितिष्ठतस्तच्च तृप्यति, तस्य तृप्तिमनु स्वयं भुञ्जानस्तृप्यत्येवं प्रत्यक्षम्। किञ्च प्रजादिभिश्च। तेजः शरीरस्था दीप्तिः, उज्ज्वलत्वं प्रागल्भ्यं वा; ब्रह्मवर्चसं वृत्तस्वाध्यायनिमित्तं तेजः ॥२॥ | प्राणके तृप्त होनेपर नेत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, इस प्रकार नेत्रेन्द्रिय, आदित्य, द्युलोक इत्यादि तृप्त होते हैं तथा और भी जिस किसीपर द्युलोक और आदित्य स्वामिभावसे अधिष्ठित हैं वह सब तृप्त होता है। तथा उसकी तृप्तिके पश्चात् स्वयं भोजन करनेवाला भी तृप्त होता है—यह तो प्रत्यक्ष ही है। यही नहीं, भोक्ता प्रजादिके द्वारा भी तृप्त होता है। शरीरस्थ दीप्ति, उज्ज्वलता अथवा प्रगल्भताका नाम 'तेज' है तथा सदाचार और स्वाध्यायके कारण होनेवाला तेज 'ब्रह्मतेज' है ॥ २ ॥ |
—:※:—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये एकोनविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥
—:o:—
विंश खण्ड
'व्यानाय स्वाहा' इस दूसरी आहुतिका वर्णन
अथ यां द्वितीयां जुहुयाद्व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥ व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किं च दिशश्च चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥२॥
तत्पश्चात् जो दूसरी आहुति दे उसे 'व्यानाय स्वाहा' ऐसा कहकर देना चाहिये। इससे व्यान तृप्त होता है ॥ १ ॥ व्यानके तृप्त होनेपर श्रोत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, श्रोत्रके तृप्त होनेपर चन्द्रमा तृप्त होता है, चन्द्रमाके तृप्त होनेपर दिशाएँ तृप्त होती हैं तथा दिशाओंके तृप्त होनेपर जिस किसीपर चन्द्रमा और दिशाएँ [ स्वामिभावसे ] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है। उसकी तृप्तिके पश्चात् वह भोक्ता प्रजा पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
विंशखण्डः सम्पूर्णः ॥ २० ॥
एकविंशं खण्ड
‘अपानाय स्वाहा’ इस तीसरी आहुतिका वर्णन
अथ या तृतीयां जुहुयात्तां जुहुयादपानाय स्वाहेत्यपानस्तृप्यति ॥ १ ॥ अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किं च पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
फिर जो तीसरी आहुति दे उसे ‘अपानाय स्वाहा’ ऐसा कहकर देना चाहिये; इससे अपान तृप्त होता है ॥ १ ॥ अपानके तृप्त होनेपर वागिन्द्रिय तृप्त होती है, वाक्के तृप्त होनेपर अग्नि तृप्त होता है, अग्निके तृप्त होनेपर पृथिवी तृप्त होती है तथा पृथिवीके तृप्त होनेपर जिस किसीपर पृथिवी और अग्नि [ स्वामिभावसे ] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके पश्चात् भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥
—: ०० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
एकविंशखण्डः सम्पूर्णः ॥ २१ ॥
द्वाविंश खण्ड
—: ० :—
‘समानाय स्वाहा’ इस चौथी आहुतिका वर्णन
अथ यां चतुर्थीं जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वा-
हेति समानस्तृप्यति ॥ १॥ समाने तृप्यति मनस्तृप्यति
मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तृ-
प्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किं च विद्युच्च पर्जन्य-
श्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया
पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
तदनन्तर जो चौथी आहुति दे उसे ‘समानाय स्वाहा’ ऐसा कहकर देना चाहिये; इससे समान तृप्त होता है ॥ १ ॥ समानके तृप्त होनेपर मन तृप्त होता है, मनके तृप्त होनेपर पर्जन्य तृप्त होता है, पर्जन्यके तृप्त होनेपर विद्युत् तृप्त होती है तथा विद्युत्के तृप्त होनेपर जिस किसीके ऊपर विद्युत् और पर्जन्य अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके अनन्तर भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥
—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
द्वाविंशखण्डः सम्पूर्णः ॥ २२ ॥
त्रयोविंश खण्ड
'उदानाय स्वाहा' इस पाँचवीं आहुतिका वर्णन
अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहे- त्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥ उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृ- प्यत्याकाशे तृप्यति यत्किं च वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठ- तस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिर- न्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
फिर जो पाँचवीं आहुति दे उसे 'उदानाय स्वाहा' ऐसा कहकर देना चाहिये, इससे उदान तृप्त होता है ॥ १ ॥ उदानके तृप्त होनेपर त्वचा तृप्त होती है, त्वचाके तृप्त होनेपर वायु तृप्त होता है, वायुके तृप्त होनेपर आकाश तृप्त होता है तथा आकाशके तृप्त होनेपर जिस किसीपर वायु और आकाश [स्वामिभावसे] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, और उसकी तृप्तिके पश्चात् स्वयं भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥
| अथ यां द्वितीयां तृतीयां चतुर्थीं पञ्चमीमिति समानम् ॥ ५ । २० — ५ । २३ ॥ | 'अथ यां द्वितीयां तृतीयां चतुर्थीं पञ्चमीम्' इत्यादि श्रुतियोंका अर्थ समान है॥ ५ । २० — ५ । २३॥ |
इति च्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये त्रयोविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २३ ॥
चतुर्विंश खण्ड
-: ✤ :-
अविद्वान्के हवनका स्वरूप
स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारान-
पोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक्तत्स्यात् ॥ १ ॥
वह जो कि इस वैश्वानरविद्याको न जानकर हवन करता है उसका वह हवन ऐसा है, जैसे अङ्गारोंको हटाकर भस्ममें हवन करे ॥ १ ॥
| स यः कश्चिदिदं वैश्वानरदर्शनं यथोक्तमविद्वान्सन्नग्निहोत्रं प्रसिद्धं जुहोति, यथाङ्गारानाहुतियोग्यानपोह्यानाहुतिस्थाने भस्मनि जुहुयात्, तादृक् तत्तुल्यं तस्य तदग्निहोत्रहवनं स्याद्वैश्वानरविदोऽग्निहोत्रमपेक्ष्येति प्रसिद्धाग्निहोत्रनिन्दया वैश्वानरविदोऽग्निहोत्रं स्तूयते ॥ १ ॥ | वह, जो कोई कि इस उपर्युक्त वैश्वानर-विद्याको न जाननेवाला होकर ही लोकप्रसिद्ध अग्निहोत्र करता है उसका वह हवन वैश्वानरोपासकके अग्निहोत्रकी अपेक्षा ऐसा है अर्थात् इसके सदृश है जैसे कि आहुतियोग्य अङ्गारोंको हटाकर कोई आहुति न देनेयोग्य स्थान—भस्ममें आहुति दे। इस प्रकार प्रसिद्ध अग्निहोत्रकी निन्दाद्वारा वैश्वानरोपासकके अग्निहोत्रकी स्तुति की जाती है ॥ १ ॥ |
विद्वान्के हवनका फल
| अतश्चैतद्विशिष्टमग्निहोत्रम् ।<br>कथम् ? | इसलिये भी यह विशिष्ट अग्निहोत्र है; किसलिये— |
५७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
५७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ २ ॥
क्योंकि जो इस (वैश्वानर) को इस प्रकार जाननेवाला पुरुष अग्निहोत्र करता है उसका समस्त लोक, सारे भूत और सम्पूर्ण आत्माओंमें हवन हो जाता है ॥ २ ॥
| अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य यथोक्तवैश्वानरविज्ञानवतः सर्वेषु लोकेष्वित्याद्युक्तार्थम् । हुतमन्नमत्तीत्यनयोरेकार्थत्वात् ॥ २ ॥ | क्योंकि जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष अग्निहोत्र करता है उस उपर्युक्त वैश्वानर विद्यावान्का 'सर्वेषु लोकेषु' इत्यादि शब्दोंका अर्थ पहले (छा० ५ । १८ । १ के भाष्यमें) कहा जा चुका है, क्योंकि यहाँके 'हुतम्' और वहाँके 'अन्नम् अत्ति' इन दोनों पदोंका एक ही अर्थ है ॥२॥ |
|---|---|
| किं च— | तथा— |
तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवंऽहास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति॥३॥
इस विषयमें यह दृष्टान्त भी है--जिस प्रकार सींकका अग्रभाग अग्निमें घुसा देनेसे तत्काल जल जाता है उसी प्रकार जो इस प्रकार जाननेवाला होकर अग्निहोत्र करता है उसके समस्त पाप भस्म हो जाते हैं ॥ ३ ॥
| तद्यथेषीकायास्तूलमग्रमग्नौ प्रोतं प्रक्षिप्तं प्रदूयेत प्रदह्येत | इस विषयमें यह दृष्टान्त है—जिस प्रकार सींकका तूल—अग्रभाग अग्नि- |
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खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५७१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| क्षिप्रमेवं हास्य विदुषः सर्वात्मभूतस्य सर्वान्नानामत्तुः सर्वे निरवशिष्टाः पाप्मानो धर्माधर्माख्या अनेकजन्मसम्व्रिता इह, च प्राग्ज्ञानोत्पत्तेर्ज्ञानसहभाविनश्च प्रहूयन्ते प्रदह्येन्वर्तमानशरीरारम्भकपाप्मवर्जम् ; लक्ष्यं प्रति मुक्तेषुवत्प्रवृत्तफलत्वात्तस्य न दाहः । य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति भुङ्क्ते ॥ ३ ॥ | में डालनेपर तुरन्त ही जल जाता है उसी प्रकार सबके अन्तरात्मभूत और समस्त अन्नोंके भोक्ता इस विद्वान्के अनेकों जन्मोंमें संचित हुए तथा इस जन्ममें ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व और ज्ञानके साथ-साथ होनेवाले धर्माधर्मसंज्ञक समस्त-निःशेष पाप दग्ध हो जाते हैं; केवल वर्तमान शरीरका आरम्भ करनेवाले पाप रह जाते हैं, क्योंकि लक्ष्यके प्रति छोड़े हुए बाणके समान फल देनेमें प्रवृत्त हो जानेके कारण उनका दाह नहीं हो सकता है। जो इस (वैश्वानरदर्शन) को इस प्रकार जाननेवाला होकर हवन करता यानी भोजन करता है [ उसे उपर्युक्त फल मिलता है ] ॥ ३ ॥ |
तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरे हुतँस्यादिति तदेष श्लोकः ॥ ४ ॥
अतः वह इस प्रकार जाननेवाला यदि चाण्डालको उच्छिष्ट भी दे तो भी उसका वह अन्न वैश्वानर आत्मामें ही हुत होगा। इस विषयमें यह मन्त्र है ॥ ४ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| स यद्यपि चाण्डालायोच्छिष्टानर्हायोच्छिष्टं प्रयच्छेदुच्छिष्टं दद्यात्प्रतिषिद्धमुच्छिष्टदानं यद्यपि | वह यद्यपि उच्छिष्टदानके अयोग्य चाण्डालको उच्छिष्ट भी दे अर्थात् प्रतिषिद्ध उच्छिष्टदान भी |
५७२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५ ]
५७२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५ ]
| कुर्यादात्मनि हैवास्य चण्डालदेहस्थे वैश्वानरे तद्धुतं स्यान्नाधर्मनिमित्तमिति विद्यामेव स्तौति। तदेतस्मिन्स्तुत्यर्थे श्लोको मन्त्रोऽप्येष भवति ॥ ४ ॥ | करे तो भी वह चाण्डालके देहमें स्थित वैश्वानर आत्मामें ही हुत होगा, अधर्मका हेतु नहीं होगा—ऐसा कहकर श्रुति विद्याकी ही स्तुति करती है। उस इस स्तुतिके विषयमें यह श्लोक यानी मन्त्र भी है ॥४॥ |
यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासत एवँसर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत इति ॥५॥
जिस प्रकार इस लोकमें भूखे बालक सब प्रकार माताकी उपासना करते हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणी इस ज्ञानीके भोजनरूप अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं, अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं ॥ ५ ॥
| यथेह लोके क्षुधिता बुभुक्षिता बाला मातरं पर्युपासते कदा नो मातान्नं प्रयच्छतीति, एवं सर्वाणि भूतान्यन्नादान्येवंविदोऽग्निहोत्रं भोजनमुपासते कदा न्वसौ भोक्ष्यत इति; जगत्सर्वं विद्वद्भोजनेन तृप्तं भवतीत्यर्थः। द्विरुक्तिरध्यायपरिसमाप्त्यर्था ॥ ५ ॥ | जिस प्रकार इस लोकमें क्षुधित-भूखे बालक सब प्रकार माताकी उपासना (प्रतीक्षा) करते हैं कि माता हमें कब अन्न देगी ? उसी प्रकार अन्न भक्षण करनेवाले समस्त प्राणी इस प्रकार जाननेवालेके अग्निहोत्र अर्थात् भोजनकी उपासना करते हैं कि यह कब भोजन करेगा, क्योंकि विद्वान्के भोजन करनेसे सारा जगत् तृप्त होता है—यह इसका तात्पर्य है। यहाँ जो द्विरुक्ति है वह अध्यायकी समाप्तिके लिये है ॥५॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये चतुर्विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥२४॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्द्विवरणे पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ५ ॥
षष्ठ अध्याय
षष्ठ अध्याय
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प्रथम खण्ड
आरुणिका अपने पुत्र श्वेतकेतुके प्रति उपदेश
| पूर्वतः सम्बन्ध-प्रदर्शनम् (संस्कृत) | हिन्दी |
|---|---|
| श्वेतकेतुर्हारुणेय आसेत्याद्यध्यायसंबन्धः—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलान्' इत्युक्तम्, कथं तस्माज्जगदिदं जायते तस्मिन्नेव च लीयतेऽनिति च तेनैवेत्येतद्वक्तव्यम् । अनन्तरं चैकस्मिन्भुक्ते विदुषि सर्वं जगत्तृप्तं भवतीत्युक्तम्, तदेकत्वे सत्यात्मनः सर्वभूतस्थस्य उपपद्यते नात्मभेदे। कथं च तदेकत्वमिति तदर्थोऽयं षष्ठोऽध्याय आरभ्यते । पितापुत्राख्यायिका विद्यायाः सारिष्ठत्वप्रदर्शनार्था । | 'श्वेतकेतुर्हारुणेय आस' इत्यादि मन्त्रसे आरम्भ होनेवाले अध्यायका सम्बन्ध इस प्रकार है—ऊपर यह कहा जा चुका है कि 'यह सब निश्चय ब्रह्म ही है तथा उसीसे उत्पन्न हुआ है, उसीमें लीन होनेवाला है और उसीमें चेष्टा कर रहा है'। अब यह बतलाना है कि यह जगत् किस प्रकार उससे उत्पन्न होता है, कैसे उसीमें लीन होता है और किस तरह उसीके द्वारा चेष्टा कर रहा है ? अभी-अभी यह बतलाया गया है कि एक विद्वान्के भोजन करनेपर सारा संसार तृप्त हो जाता है। ऐसा सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित आत्माका एकत्व होनेपर ही हो सकता है, आत्माका भेद होनेपर नहीं हो सकता। उसका एकत्व किस प्रकार है ? इसीके लिये यह छठा अध्याय आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो पिता और पुत्रकी आख्यायिका है वह इस विद्याका सारतमत्व प्रदर्शित करनेके लिये है। |
५७४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
५७४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तꣳह पितोवाच श्वेत-
केतो वस ब्रह्मचर्यम्। न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य
ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥
अरुणका सुप्रसिद्ध पौत्र श्वेतकेतु था, उससे पिताने कहा—‘हे श्वेतकेतो ! तू ब्रह्मचर्यवास कर; क्योंकि ‘हे सोम्य ! हमारे कुलमें उत्पन्न हुआ कोई पुरुष अध्ययन न करके ब्रह्मबन्धु-सा नहीं होता’ ॥ १ ॥
| श्वेतकेतुरिति नामतो हेत्यैति-<br>ह्यार्थः आरुणेयोऽरुणस्य पौत्र<br>आस बभूव । तं पुत्रं हारुणिः<br>पिता योग्यं विद्याभाजनं मन्वा-<br>नस्तस्योपनयनकालात्ययं च<br>पश्यन्नुवाच—हे श्वेतकेतोऽनुरूपं<br>गुरुं कुलस्य नो गत्वा वस ब्रह्म-<br>चर्यम् । न चैतद्युक्तं यदस्मत्कु-<br>लीनो हे सोम्याननूच्यानधीत्य<br>ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ब्राह्मणान्<br>बन्धून्व्यपदिशति न स्वयं<br>ब्राह्मणवृत्त इति ॥ १ ॥ | ‘श्वेतकेतु’ ऐसे नामवाला, ‘ह’ यह निपात ऐतिह्यका द्योतक है; आरुणेय—अरुणका पौत्र था । उस पुत्रसे पिता आरुणिने, उसे योग्य—विद्याका पात्र जानकर और उसके उपनयनसंस्कारके समयका अतिक्रम होता देखकर, कहा—‘हे श्वेतकेतो ! तू हमारे कुलके अनुरूप गुरुके पास जाकर ब्रह्मचर्यवास कर । हे सोम्य ! यह उचित नहीं है कि हमारे कुलमें उत्पन्न होकर कोई अध्ययन न करके ब्रह्मबन्धु-सा हो जाय । जो ब्राह्मणोंको अपना बन्धु बतलाया है किन्तु स्वयं ब्राह्मणोंका आचरण नहीं करता उसे ब्रह्मबन्धु कहते हैं ॥ १ ॥ |
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७५
| तस्यातः प्रवासोऽनुमीयते पितुः । येन स्वयं गुणवान्सन्पुत्रं नोपनेष्यति । | इस प्रसंगसे ऐसा अनुमान होता है कि उसका पिता घरसे बाहर जानेवाला है, इसीसे गुणवान् होनेपर भी वह स्वयं पुत्रका उपनयन नहीं करेगा । |
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स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय । तं ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ २ ॥
वह श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामें उपनयन कराकर चौबीस वर्षका होनेपर सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर अपनेको बड़ा बुद्धिमान् और व्याख्या करनेवाला मानते हुए उद्धण्डभावसे घर लौटा । उससे पिताने कहा—'हे सोम्य ! तू जो ऐसा महामना, पण्डितम्मन्य और अविनीत है सो क्या तूने वह आदेश पूछा है ?' ॥ २ ॥
| स पित्रोक्तः श्वेतकेतुर्ह द्वादशवर्षः सन्नुपेत्याचार्यं यावच्चतुर्विंशतिवर्षो बभूव, तावत्सर्वान् वेदांश्चतुरोऽप्यधीत्य तदर्थं च बुद्ध्वा महामना महद्गम्भीरं मनो यस्यासममात्मानमन्यैर्मन्यमानं मनो यस्य सोऽयं महामना अनूचानमान्यनूचानमात्मानं मन्यत इत्येवंशीलो यः सोऽनूचानमानी स्तब्धोऽप्रणतस्वभाव एयाय गृहम् । | पिताके कहनेपर वह श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामें गुरुके समीप जाकर जबतक कि चौबीस वर्षका हुआ तबतक सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर और उनका अर्थ समझकर महामना—जिसका मन महान् अर्थात् गम्भीर हो यानी जिसका मन अपनेको दूसरेके समान न समझनेवाला हो उसे महामना कहते हैं, अनूचानमानी—अपनेको बड़ा प्रवक्ता माननेवाला अर्थात् जो ऐसे स्वभाववाला हो उसे अनूचानमानी कहते हैं, और स्तब्ध—अविनीतस्वभाव होकर घर लौटा । |
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५७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ५७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तमेवंभूतं ह्यात्मनोऽननुरूपशीलं स्तब्धं मानिनं पुत्रं दृष्ट्वा पितोवाच सद्धर्मावतारचिकीर्षया । श्वेतकेतो यन्न्विदं महामना अनूचानमानी स्तब्धश्चासि कस्तेऽतिशयः प्राप्त उपाध्यायात् ? उतापि तमादेशमादिश्यत इत्यादेशः केवलशास्त्राचार्योपदेशगम्यमित्येतत्, येन वा परं ब्रह्मादिश्यते स आदेशस्तमप्राक्ष्यः पृष्टवानस्याचार्यम् ॥ २ ॥ | उस अपने पुत्रको इस प्रकारका अर्थात् अपनेसे विपरीत स्वभाववाला, उद्दण्ड और अभिमानी हुआ देखकर उसमें सद्धर्मकी प्रवृत्ति करनेकी इच्छासे पिताने कहा—'हे श्वेतकेतो ! तू जो ऐसा महामना, अनूचानमानी और स्तब्ध हो रहा है सो तुझे अपने उपाध्यायसे ऐसी क्या विशेषता प्राप्त हो गयी है ? क्या तूने वह आदेश पूछा है--जिसका उपदेश किया जाता है उसे आदेश कहते हैं; इससे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्म केवल शास्त्र और गुरुके उपदेशसे ही ज्ञेय है। अथवा जिसके द्वारा परब्रह्मका उपदेश किया जाय उसे आदेश कहते हैं—सो क्या तूने वह आचार्यसे पूछा है—॥ २ ॥ | | तमादेशं विशिनष्टि— | उस आदेशके लिये श्रुति विशेषण देती है— |
येनाश्रुतꣳश्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति । कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥
'जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत हो जाता है और अविज्ञात विशेषरूपसे ज्ञात हो जाता है।' [यह सुनकर श्वेतकेतुने पूछा---] 'भगवन् ! वह आदेश कैसा है ?' ॥ ३ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७७
| येनादेशेन श्रुतेनाश्रुतमप्यन्यच्छ्रुतं भवत्यमतं मतमतर्कितं तर्कितं भवत्यविज्ञातं विज्ञातमनिश्चितं निश्चितं भवतीति । सर्वानपि वेदानधीत्य सर्वं चान्यज्ज्ञेयमधिगम्याप्यकृतार्थ एव भवति यावदात्मतत्त्वं न जानातीत्याख्यायिकातोऽवगम्यते ।<br><br>तदेतदद्भुतं श्रुत्वाह कथं न्वेतदप्रसिद्धमन्यविज्ञानेनान्यद्विज्ञातं भवतीत्येवं मन्वानः पृच्छति कथं नु केन प्रकारेण हे भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥ | 'जिस आदेशके द्वारा अन्य बिना सुना हुआ भी सुना हुआ हो जाता है, अमत अर्थात् बिना विचार किया हुआ मत—विचारा हुआ हो जाता है और अविज्ञात—अनिश्चित विज्ञात—निश्चित हो जाता है।' इस आख्यायिकासे यह जाना जाता है कि समस्त वेदोंका अध्ययन और अन्य सम्पूर्ण ज्ञेय पदार्थोंका ज्ञान प्राप्त करनेपर भी जबतक पुरुष आत्मतत्त्वको नहीं जानता, तबतक अकृतार्थ ही रहता है। इस विचित्र प्रश्नको सुनकर श्वेतकेतुने यह सोचते हुए कि यह अप्रसिद्ध बात कैसे हो सकती है कि अन्य वस्तुके ज्ञानसे अन्य समस्त पदार्थोंका भी ज्ञान हो जाय, कहा—'हे भगवन् ! वह आदेश कैसा—किस प्रकारका है?' ॥ ३ ॥ |
| यथा स आदेशो भवति तच्छृणु— | पिता—वह आदेश जिस प्रकार है सो सुन— |
यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातꣳ स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥४॥
५७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ५७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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हे सोम्य ! जिस प्रकार एक मृत्तिकाके पिण्डके द्वारा सम्पूर्ण मृन्मय पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है कि विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है ॥ ४ ॥
| हे सोम्य यथा लोक एकेन मृत्पिण्डेन करककुम्भादिकारण-भूतेन विज्ञातेन सर्वमन्यत्तद्वि-कारजातं मृन्मयं मृद्विकारजातं विज्ञातं स्यात् । <br> कथं मृत्पिण्डे कारणे विज्ञाते कार्यमन्यद्विज्ञातं स्यात् ? <br> नैष दोषः कारणेनानन्य-त्वात्कार्यस्य । यन्मन्यसे-ऽन्यस्मिन्विज्ञातेऽन्यन्न ज्ञायत इति, सत्यमेवं स्यात्, यद्यन्य-त्कारणात्कार्यं स्यान्न त्वेवमन्य-त्कारणात्कार्यम् । <br> कथं तर्हीदं लोक इदं कारण-मयमस्य विकार इति ? <br> शृणु; वाचारम्भणं वागा- | हे सोम्य ! लोकमें जिस प्रकार कमण्डलु और घट आदिके कारण-भूत एक मृत्पिण्डके जान लिये जानेपर ही उसका विकारजात सम्पूर्ण मृन्मय अर्थात् मृत्तिकाका कार्यसमूह जान लिया जाता है। <br> **शङ्का—**मृत्तिकाके पिण्डरूप कारणका ज्ञान होनेपर अन्य कार्य-वर्गका ज्ञान कैसे हो सकता है ? <br> **समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि कार्य अपने कारणसे अभिन्न होता है । तुम जो ऐसा मानते हो कि अन्यका ज्ञान होनेपर अन्य नहीं जाना जा सकता, सो यह बात उस समय तो ठीक होती जब कि कारणसे कार्य भिन्न होता, किंतु इस प्रकार कार्य अपने कारणसे भिन्न है नहीं । <br> **शङ्का—**तो फिर लोकमें ऐसा क्यों कहा जाता है कि यह कारण है और यह इसका विकार है ? <br> **समाधान—**सुनो, यह वाचा-रम्भण--वागारम्भण अर्थात् वाणी- |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७९
| रम्भणं वागालम्बनमित्येतत् । कोऽसौ ? विकारो नामधेयं स्वार्थे धेयप्रत्ययः । वागालम्बनमात्रं नामैव केवलं न विकारो नाम वस्त्वस्ति परमार्थतो मृत्तिकेत्येव मृत्तिकैव तु सत्यं वस्त्वस्ति ॥ ४ ॥ | पर ही अवलम्बित है। कौन ? नामधेय विकार—‘नामधेय' पदमें नाम शब्दसे स्वार्थमें ‘धेय' प्रत्यय हुआ है। वस्तुतः विकार नामकी कोई वस्तु नहीं है, यह तो केवल वाणीपर अवलम्बित नाममात्र ही है। सत्य वस्तु तो एकमात्र मृत्तिका ही है॥४॥ |
यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातँस्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ॥ ५ ॥
हे सोम्य ! जिस प्रकार एक लोहमणिका ज्ञान होनेपर सम्पूर्ण लोहमय ( सुवर्णमय ) पदार्थ जान लिये जाते हैं, क्योंकि विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, सत्य केवल सुवर्ण ही है ॥ ५ ॥
| यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सुवर्णपिण्डेन सर्वमन्यद्विकारजातं कटकमुकुटकेयूरादि विज्ञातं स्यात् । वाचारम्भणमित्यादि समानम् ॥ ५ ॥ | हे सोम्य ! जिस प्रकार एक लोहमणि—सुवर्णपिण्डके द्वारा अन्य कटक, मुकुट एवं केयूरादि सारा विकारजात जान लिया जाता है ‘वाचारम्भणम्' इत्यादि शब्दोंका अर्थ पूर्ववत है ॥ ५ ॥ |
यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातँस्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवँसोम्य स आदेशो भवतीति ॥ ६ ॥
छा० उ० १९—