छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 578, कुल 978 में से
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५७४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तꣳह पितोवाच श्वेत-
केतो वस ब्रह्मचर्यम्। न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य
ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥
अरुणका सुप्रसिद्ध पौत्र श्वेतकेतु था, उससे पिताने कहा—‘हे श्वेतकेतो ! तू ब्रह्मचर्यवास कर; क्योंकि ‘हे सोम्य ! हमारे कुलमें उत्पन्न हुआ कोई पुरुष अध्ययन न करके ब्रह्मबन्धु-सा नहीं होता’ ॥ १ ॥
| श्वेतकेतुरिति नामतो हेत्यैति-<br>ह्यार्थः आरुणेयोऽरुणस्य पौत्र<br>आस बभूव । तं पुत्रं हारुणिः<br>पिता योग्यं विद्याभाजनं मन्वा-<br>नस्तस्योपनयनकालात्ययं च<br>पश्यन्नुवाच—हे श्वेतकेतोऽनुरूपं<br>गुरुं कुलस्य नो गत्वा वस ब्रह्म-<br>चर्यम् । न चैतद्युक्तं यदस्मत्कु-<br>लीनो हे सोम्याननूच्यानधीत्य<br>ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ब्राह्मणान्<br>बन्धून्व्यपदिशति न स्वयं<br>ब्राह्मणवृत्त इति ॥ १ ॥ | ‘श्वेतकेतु’ ऐसे नामवाला, ‘ह’ यह निपात ऐतिह्यका द्योतक है; आरुणेय—अरुणका पौत्र था । उस पुत्रसे पिता आरुणिने, उसे योग्य—विद्याका पात्र जानकर और उसके उपनयनसंस्कारके समयका अतिक्रम होता देखकर, कहा—‘हे श्वेतकेतो ! तू हमारे कुलके अनुरूप गुरुके पास जाकर ब्रह्मचर्यवास कर । हे सोम्य ! यह उचित नहीं है कि हमारे कुलमें उत्पन्न होकर कोई अध्ययन न करके ब्रह्मबन्धु-सा हो जाय । जो ब्राह्मणोंको अपना बन्धु बतलाया है किन्तु स्वयं ब्राह्मणोंका आचरण नहीं करता उसे ब्रह्मबन्धु कहते हैं ॥ १ ॥ |
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