भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 577

षष्ठ अध्याय

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प्रथम खण्ड


आरुणिका अपने पुत्र श्वेतकेतुके प्रति उपदेश

पूर्वतः सम्बन्ध-प्रदर्शनम् (संस्कृत)हिन्दी
श्वेतकेतुर्हारुणेय आसेत्याद्यध्यायसंबन्धः—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलान्' इत्युक्तम्, कथं तस्माज्जगदिदं जायते तस्मिन्नेव च लीयतेऽनिति च तेनैवेत्येतद्वक्तव्यम् । अनन्तरं चैकस्मिन्भुक्ते विदुषि सर्वं जगत्तृप्तं भवतीत्युक्तम्, तदेकत्वे सत्यात्मनः सर्वभूतस्थस्य उपपद्यते नात्मभेदे। कथं च तदेकत्वमिति तदर्थोऽयं षष्ठोऽध्याय आरभ्यते । पितापुत्राख्यायिका विद्यायाः सारिष्ठत्वप्रदर्शनार्था ।'श्वेतकेतुर्हारुणेय आस' इत्यादि मन्त्रसे आरम्भ होनेवाले अध्यायका सम्बन्ध इस प्रकार है—ऊपर यह कहा जा चुका है कि 'यह सब निश्चय ब्रह्म ही है तथा उसीसे उत्पन्न हुआ है, उसीमें लीन होनेवाला है और उसीमें चेष्टा कर रहा है'। अब यह बतलाना है कि यह जगत् किस प्रकार उससे उत्पन्न होता है, कैसे उसीमें लीन होता है और किस तरह उसीके द्वारा चेष्टा कर रहा है ? अभी-अभी यह बतलाया गया है कि एक विद्वान्‌के भोजन करनेपर सारा संसार तृप्त हो जाता है। ऐसा सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित आत्माका एकत्व होनेपर ही हो सकता है, आत्माका भेद होनेपर नहीं हो सकता। उसका एकत्व किस प्रकार है ? इसीके लिये यह छठा अध्याय आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो पिता और पुत्रकी आख्यायिका है वह इस विद्याका सारतमत्व प्रदर्शित करनेके लिये है।