छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
षष्ठ अध्याय
षष्ठ अध्याय
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प्रथम खण्ड
आरुणिका अपने पुत्र श्वेतकेतुके प्रति उपदेश
| पूर्वतः सम्बन्ध-प्रदर्शनम् (संस्कृत) | हिन्दी |
|---|---|
| श्वेतकेतुर्हारुणेय आसेत्याद्यध्यायसंबन्धः—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलान्' इत्युक्तम्, कथं तस्माज्जगदिदं जायते तस्मिन्नेव च लीयतेऽनिति च तेनैवेत्येतद्वक्तव्यम् । अनन्तरं चैकस्मिन्भुक्ते विदुषि सर्वं जगत्तृप्तं भवतीत्युक्तम्, तदेकत्वे सत्यात्मनः सर्वभूतस्थस्य उपपद्यते नात्मभेदे। कथं च तदेकत्वमिति तदर्थोऽयं षष्ठोऽध्याय आरभ्यते । पितापुत्राख्यायिका विद्यायाः सारिष्ठत्वप्रदर्शनार्था । | 'श्वेतकेतुर्हारुणेय आस' इत्यादि मन्त्रसे आरम्भ होनेवाले अध्यायका सम्बन्ध इस प्रकार है—ऊपर यह कहा जा चुका है कि 'यह सब निश्चय ब्रह्म ही है तथा उसीसे उत्पन्न हुआ है, उसीमें लीन होनेवाला है और उसीमें चेष्टा कर रहा है'। अब यह बतलाना है कि यह जगत् किस प्रकार उससे उत्पन्न होता है, कैसे उसीमें लीन होता है और किस तरह उसीके द्वारा चेष्टा कर रहा है ? अभी-अभी यह बतलाया गया है कि एक विद्वान्के भोजन करनेपर सारा संसार तृप्त हो जाता है। ऐसा सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित आत्माका एकत्व होनेपर ही हो सकता है, आत्माका भेद होनेपर नहीं हो सकता। उसका एकत्व किस प्रकार है ? इसीके लिये यह छठा अध्याय आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो पिता और पुत्रकी आख्यायिका है वह इस विद्याका सारतमत्व प्रदर्शित करनेके लिये है। |
५७४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
५७४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तꣳह पितोवाच श्वेत-
केतो वस ब्रह्मचर्यम्। न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य
ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥
अरुणका सुप्रसिद्ध पौत्र श्वेतकेतु था, उससे पिताने कहा—‘हे श्वेतकेतो ! तू ब्रह्मचर्यवास कर; क्योंकि ‘हे सोम्य ! हमारे कुलमें उत्पन्न हुआ कोई पुरुष अध्ययन न करके ब्रह्मबन्धु-सा नहीं होता’ ॥ १ ॥
| श्वेतकेतुरिति नामतो हेत्यैति-<br>ह्यार्थः आरुणेयोऽरुणस्य पौत्र<br>आस बभूव । तं पुत्रं हारुणिः<br>पिता योग्यं विद्याभाजनं मन्वा-<br>नस्तस्योपनयनकालात्ययं च<br>पश्यन्नुवाच—हे श्वेतकेतोऽनुरूपं<br>गुरुं कुलस्य नो गत्वा वस ब्रह्म-<br>चर्यम् । न चैतद्युक्तं यदस्मत्कु-<br>लीनो हे सोम्याननूच्यानधीत्य<br>ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ब्राह्मणान्<br>बन्धून्व्यपदिशति न स्वयं<br>ब्राह्मणवृत्त इति ॥ १ ॥ | ‘श्वेतकेतु’ ऐसे नामवाला, ‘ह’ यह निपात ऐतिह्यका द्योतक है; आरुणेय—अरुणका पौत्र था । उस पुत्रसे पिता आरुणिने, उसे योग्य—विद्याका पात्र जानकर और उसके उपनयनसंस्कारके समयका अतिक्रम होता देखकर, कहा—‘हे श्वेतकेतो ! तू हमारे कुलके अनुरूप गुरुके पास जाकर ब्रह्मचर्यवास कर । हे सोम्य ! यह उचित नहीं है कि हमारे कुलमें उत्पन्न होकर कोई अध्ययन न करके ब्रह्मबन्धु-सा हो जाय । जो ब्राह्मणोंको अपना बन्धु बतलाया है किन्तु स्वयं ब्राह्मणोंका आचरण नहीं करता उसे ब्रह्मबन्धु कहते हैं ॥ १ ॥ |
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७५
| तस्यातः प्रवासोऽनुमीयते पितुः । येन स्वयं गुणवान्सन्पुत्रं नोपनेष्यति । | इस प्रसंगसे ऐसा अनुमान होता है कि उसका पिता घरसे बाहर जानेवाला है, इसीसे गुणवान् होनेपर भी वह स्वयं पुत्रका उपनयन नहीं करेगा । |
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स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय । तं ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ २ ॥
वह श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामें उपनयन कराकर चौबीस वर्षका होनेपर सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर अपनेको बड़ा बुद्धिमान् और व्याख्या करनेवाला मानते हुए उद्धण्डभावसे घर लौटा । उससे पिताने कहा—'हे सोम्य ! तू जो ऐसा महामना, पण्डितम्मन्य और अविनीत है सो क्या तूने वह आदेश पूछा है ?' ॥ २ ॥
| स पित्रोक्तः श्वेतकेतुर्ह द्वादशवर्षः सन्नुपेत्याचार्यं यावच्चतुर्विंशतिवर्षो बभूव, तावत्सर्वान् वेदांश्चतुरोऽप्यधीत्य तदर्थं च बुद्ध्वा महामना महद्गम्भीरं मनो यस्यासममात्मानमन्यैर्मन्यमानं मनो यस्य सोऽयं महामना अनूचानमान्यनूचानमात्मानं मन्यत इत्येवंशीलो यः सोऽनूचानमानी स्तब्धोऽप्रणतस्वभाव एयाय गृहम् । | पिताके कहनेपर वह श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामें गुरुके समीप जाकर जबतक कि चौबीस वर्षका हुआ तबतक सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर और उनका अर्थ समझकर महामना—जिसका मन महान् अर्थात् गम्भीर हो यानी जिसका मन अपनेको दूसरेके समान न समझनेवाला हो उसे महामना कहते हैं, अनूचानमानी—अपनेको बड़ा प्रवक्ता माननेवाला अर्थात् जो ऐसे स्वभाववाला हो उसे अनूचानमानी कहते हैं, और स्तब्ध—अविनीतस्वभाव होकर घर लौटा । |
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५७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ५७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तमेवंभूतं ह्यात्मनोऽननुरूपशीलं स्तब्धं मानिनं पुत्रं दृष्ट्वा पितोवाच सद्धर्मावतारचिकीर्षया । श्वेतकेतो यन्न्विदं महामना अनूचानमानी स्तब्धश्चासि कस्तेऽतिशयः प्राप्त उपाध्यायात् ? उतापि तमादेशमादिश्यत इत्यादेशः केवलशास्त्राचार्योपदेशगम्यमित्येतत्, येन वा परं ब्रह्मादिश्यते स आदेशस्तमप्राक्ष्यः पृष्टवानस्याचार्यम् ॥ २ ॥ | उस अपने पुत्रको इस प्रकारका अर्थात् अपनेसे विपरीत स्वभाववाला, उद्दण्ड और अभिमानी हुआ देखकर उसमें सद्धर्मकी प्रवृत्ति करनेकी इच्छासे पिताने कहा—'हे श्वेतकेतो ! तू जो ऐसा महामना, अनूचानमानी और स्तब्ध हो रहा है सो तुझे अपने उपाध्यायसे ऐसी क्या विशेषता प्राप्त हो गयी है ? क्या तूने वह आदेश पूछा है--जिसका उपदेश किया जाता है उसे आदेश कहते हैं; इससे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्म केवल शास्त्र और गुरुके उपदेशसे ही ज्ञेय है। अथवा जिसके द्वारा परब्रह्मका उपदेश किया जाय उसे आदेश कहते हैं—सो क्या तूने वह आचार्यसे पूछा है—॥ २ ॥ | | तमादेशं विशिनष्टि— | उस आदेशके लिये श्रुति विशेषण देती है— |
येनाश्रुतꣳश्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति । कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥
'जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत हो जाता है और अविज्ञात विशेषरूपसे ज्ञात हो जाता है।' [यह सुनकर श्वेतकेतुने पूछा---] 'भगवन् ! वह आदेश कैसा है ?' ॥ ३ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७७
| येनादेशेन श्रुतेनाश्रुतमप्यन्यच्छ्रुतं भवत्यमतं मतमतर्कितं तर्कितं भवत्यविज्ञातं विज्ञातमनिश्चितं निश्चितं भवतीति । सर्वानपि वेदानधीत्य सर्वं चान्यज्ज्ञेयमधिगम्याप्यकृतार्थ एव भवति यावदात्मतत्त्वं न जानातीत्याख्यायिकातोऽवगम्यते ।<br><br>तदेतदद्भुतं श्रुत्वाह कथं न्वेतदप्रसिद्धमन्यविज्ञानेनान्यद्विज्ञातं भवतीत्येवं मन्वानः पृच्छति कथं नु केन प्रकारेण हे भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥ | 'जिस आदेशके द्वारा अन्य बिना सुना हुआ भी सुना हुआ हो जाता है, अमत अर्थात् बिना विचार किया हुआ मत—विचारा हुआ हो जाता है और अविज्ञात—अनिश्चित विज्ञात—निश्चित हो जाता है।' इस आख्यायिकासे यह जाना जाता है कि समस्त वेदोंका अध्ययन और अन्य सम्पूर्ण ज्ञेय पदार्थोंका ज्ञान प्राप्त करनेपर भी जबतक पुरुष आत्मतत्त्वको नहीं जानता, तबतक अकृतार्थ ही रहता है। इस विचित्र प्रश्नको सुनकर श्वेतकेतुने यह सोचते हुए कि यह अप्रसिद्ध बात कैसे हो सकती है कि अन्य वस्तुके ज्ञानसे अन्य समस्त पदार्थोंका भी ज्ञान हो जाय, कहा—'हे भगवन् ! वह आदेश कैसा—किस प्रकारका है?' ॥ ३ ॥ |
| यथा स आदेशो भवति तच्छृणु— | पिता—वह आदेश जिस प्रकार है सो सुन— |
यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातꣳ स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥४॥
५७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ५७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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हे सोम्य ! जिस प्रकार एक मृत्तिकाके पिण्डके द्वारा सम्पूर्ण मृन्मय पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है कि विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है ॥ ४ ॥
| हे सोम्य यथा लोक एकेन मृत्पिण्डेन करककुम्भादिकारण-भूतेन विज्ञातेन सर्वमन्यत्तद्वि-कारजातं मृन्मयं मृद्विकारजातं विज्ञातं स्यात् । <br> कथं मृत्पिण्डे कारणे विज्ञाते कार्यमन्यद्विज्ञातं स्यात् ? <br> नैष दोषः कारणेनानन्य-त्वात्कार्यस्य । यन्मन्यसे-ऽन्यस्मिन्विज्ञातेऽन्यन्न ज्ञायत इति, सत्यमेवं स्यात्, यद्यन्य-त्कारणात्कार्यं स्यान्न त्वेवमन्य-त्कारणात्कार्यम् । <br> कथं तर्हीदं लोक इदं कारण-मयमस्य विकार इति ? <br> शृणु; वाचारम्भणं वागा- | हे सोम्य ! लोकमें जिस प्रकार कमण्डलु और घट आदिके कारण-भूत एक मृत्पिण्डके जान लिये जानेपर ही उसका विकारजात सम्पूर्ण मृन्मय अर्थात् मृत्तिकाका कार्यसमूह जान लिया जाता है। <br> **शङ्का—**मृत्तिकाके पिण्डरूप कारणका ज्ञान होनेपर अन्य कार्य-वर्गका ज्ञान कैसे हो सकता है ? <br> **समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि कार्य अपने कारणसे अभिन्न होता है । तुम जो ऐसा मानते हो कि अन्यका ज्ञान होनेपर अन्य नहीं जाना जा सकता, सो यह बात उस समय तो ठीक होती जब कि कारणसे कार्य भिन्न होता, किंतु इस प्रकार कार्य अपने कारणसे भिन्न है नहीं । <br> **शङ्का—**तो फिर लोकमें ऐसा क्यों कहा जाता है कि यह कारण है और यह इसका विकार है ? <br> **समाधान—**सुनो, यह वाचा-रम्भण--वागारम्भण अर्थात् वाणी- |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७९
| रम्भणं वागालम्बनमित्येतत् । कोऽसौ ? विकारो नामधेयं स्वार्थे धेयप्रत्ययः । वागालम्बनमात्रं नामैव केवलं न विकारो नाम वस्त्वस्ति परमार्थतो मृत्तिकेत्येव मृत्तिकैव तु सत्यं वस्त्वस्ति ॥ ४ ॥ | पर ही अवलम्बित है। कौन ? नामधेय विकार—‘नामधेय' पदमें नाम शब्दसे स्वार्थमें ‘धेय' प्रत्यय हुआ है। वस्तुतः विकार नामकी कोई वस्तु नहीं है, यह तो केवल वाणीपर अवलम्बित नाममात्र ही है। सत्य वस्तु तो एकमात्र मृत्तिका ही है॥४॥ |
यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातँस्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ॥ ५ ॥
हे सोम्य ! जिस प्रकार एक लोहमणिका ज्ञान होनेपर सम्पूर्ण लोहमय ( सुवर्णमय ) पदार्थ जान लिये जाते हैं, क्योंकि विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, सत्य केवल सुवर्ण ही है ॥ ५ ॥
| यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सुवर्णपिण्डेन सर्वमन्यद्विकारजातं कटकमुकुटकेयूरादि विज्ञातं स्यात् । वाचारम्भणमित्यादि समानम् ॥ ५ ॥ | हे सोम्य ! जिस प्रकार एक लोहमणि—सुवर्णपिण्डके द्वारा अन्य कटक, मुकुट एवं केयूरादि सारा विकारजात जान लिया जाता है ‘वाचारम्भणम्' इत्यादि शब्दोंका अर्थ पूर्ववत है ॥ ५ ॥ |
यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातँस्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवँसोम्य स आदेशो भवतीति ॥ ६ ॥
छा० उ० १९—
५८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ५८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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हे सोम्य ! जिस प्रकार एक नखकृन्तन ( नहन्ना ) के ज्ञानसे सम्पूर्ण लोहेके पदार्थ जान लिये जाते हैं, क्योंकि विकार वाणीपर अवलम्बित केवल नाममात्र है, सत्य केवल लोहा ही है; हे सोम्य ! ऐसा ही वह आदेश भी है ॥ ६ ॥
| यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेनोपलक्षितेन कृष्णायसपिण्डेनेत्यर्थः, सर्वं कार्ष्णायसं कृष्णायसविकारजातं विज्ञातं स्यात्; समानमन्यत् । अनेकदृष्टान्तोपादानं दार्ष्टान्तिकानेकभेदानुगमार्थं दृढप्रतीत्यर्थं च, एवं सोम्य स आदेशो यो मयोक्तो भवति ॥ ६ ॥ | ‘हे सोम्य ! जिस प्रकार एक नखकृन्तनसे अर्थात् उससे उपलक्षित लोहपिण्डसे सम्पूर्ण कार्ष्णायस—लोहेका विकारसमूह जान लिया जाता है। शेष सब पूर्ववत् है। यहाँ जो अनेक दृष्टान्त लिये गये हैं वे दार्ष्टान्तके अनेक भेदोंका बोध और दृढ़ प्रतीति करानेके लिये हैं—हे सोम्य ! ऐसा ही वह आदेश है जो कि मैंने कहा है’ ॥ ६ ॥ |
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| इत्युक्तवति पितर्याहेतरः— | पिताके इस प्रकार कहनेपर दूसरा ( श्वेतकेतु ) बोला— |
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न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यद्धचेतदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तद्ब्रवीत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥
‘निश्चय ही वे मेरे पूज्य गुरुदेव इसे नहीं जानते थे। यदि वे जानते तो मुझसे क्यों न कहते । अब आप ही मुझे वह बतलाइये।’ तब पिताने कहा—‘अच्छा, सोम्य ! बतलाता हूँ’ ॥ ७ ॥
| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५८१ |
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| न वै नूनं भगवन्तः पूजा- <br> वन्तो गुरवो मम ये त एतद्यद्भव- <br> वदुक्तं वस्तु नावेदिषुर्न विज्ञात- <br> वन्तो नूनम् । यद्यदि ह्यवेदि- <br> ष्यन्विदितवन्त एतद्वस्तु कथं मे <br> गुणवते भक्तायानुगताय नाव- <br> क्ष्यन्नोक्तवन्तस्तेनाहं मन्ये न <br> विदितवन्त इति । अवाच्यमपि <br> गुरोर्न्यूनभावमवादीत्पुनर्गुरुकुलं <br> प्रति प्रेषणभयात् । अतो भगवां- <br> स्त्वेव मे मह्यं तद्वस्तु येन सर्व- <br> ज्ञत्वं ज्ञातेन मे स्यात्तद्ब्रवीतु <br> कथयत्वित्युक्तः पितोवाच तथा- <br> स्तु सोम्येति ॥ ७ ॥ | निश्चय ही, मेरे जो पूज्य गुरुदेव <br> थे, वे आपकी कही हुई इस बातको <br> नहीं जानते थे । यदि वे जानते <br> अर्थात् उन्हें इस बातका पता होता <br> तो मुझ गुणवान् भक्त एवं अपने <br> अनुगत शिष्यके प्रति क्यों न <br> कहते । इससे मैं समझता हूँ उन्हें <br> इसका पता नहीं था । कहने योग्य <br> न होनेपर भी उसने फिर गुरुकुलको <br> भेजे जानेके भयसे गुरुका लघुत्व <br> कह डाला । अतः अब आप ही <br> मेरे प्रति उस वस्तुका वर्णन कीजिये <br> जिसका ज्ञान होनेपर मुझे सर्वज्ञत्व <br> प्राप्त हो जाय । इस प्रकार कहे <br> जानेपर पिताने कहा—'सोम्य ! <br> अच्छा, ऐसा ही हो' ॥ ७ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये
प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
-: ० :-
अन्य पक्षके खण्डनपूर्वक जगत्की सद्रूपताका समर्थन
सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत ॥ १ ॥
हे सोम्य ! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था । उसीके विषयमें किन्हींने ऐसा भी कहा कि आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय असत् ही था । उस असत्से सत्की उत्पत्ति होती है ॥ १ ॥
| सदेव सदित्यस्तितामात्रं वस्तु सूक्ष्मं निर्विशेषं सर्वगतमेकंनिरञ्जनं निरवयवं विज्ञानं यदवगम्यते सर्ववेदान्तेभ्यः । एवशब्दोऽवधारणार्थः । किं तदवध्रियत इत्याह—इदं जगन्नामरूपक्रियावद्विकृतमुपलभ्यते यत्तत्सदेवासीदित्यासीच्छब्देन संबध्यते । | ‘सदेव’—‘सत्’ यह अस्तित्वमात्र वस्तुका बोधक है, जो कि सम्पूर्ण वेदान्तोंसे सूक्ष्म, निर्विशेष, सर्वगत, एक, निरञ्जन, निरवयव और विज्ञानस्वरूप जानी जाती है। ‘एव’ शब्द निश्चयार्थक है । इससे किस वस्तुका निश्चय किया जाता है—यह [आरुणि] बतलाता है—यह जो नामरूप एवं क्रियावान् विकारी जगत् दिखायी देता है ‘सत्’ ही था—इस प्रकार ‘आसीत्’ (था) शब्दसे ‘सत्’ शब्दका सम्बन्ध है । |
| कदा सदेवेदमासीदित्युच्यते ? | शङ्का—यह किस समय सत ही था—ऐसा कहा जाता है ? |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८३
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अग्रे जगतः प्रागुत्पत्तेः। | समाधान— आगे अर्थात् जगत्की उत्पत्तिके पूर्व। |
| किं नेदानीमिदं सद्येनाग्र आसीदिति विशेष्यते ? | शङ्का— तो क्या इस समय यह सत् नहीं है जो 'आरम्भमें था' इस प्रकार विशेषण दिया गया है ? |
| न। | समाधान— नहीं, ऐसी बात नहीं है। |
| कथं तर्हि विशेषणम् ? | शङ्का— तो फिर यह विशेषण क्यों दिया गया है ? |
| इदानीमपीदं सदेव किं तु<br>(जगतः सदैव सन्मात्रत्वे सहेतु-दृष्टान्तप्रदर्शनम्)<br>नामरूपविशेषणवदिदंशब्दबुद्धिविषयं चेतीदं च भवति। प्रागुत्पत्तेस्त्वग्रे केवलसच्छब्दबुद्धिमात्रगम्यमेवेति सदेवेदमग्र आसीदित्यवधार्यते। न हि प्रागुत्पत्तेर्नामवद्रूपवद्वेदमिति ग्रहीतुं शक्यं वस्तु सुषुप्तकाल इव। यथा सुषुप्तादुत्थितः सत्त्वमात्रमवगच्छति सुषुप्ते सन्मात्रमेव केवलं वस्त्विति तथा प्रागुत्पत्तेरित्यभिप्रायः। | समाधान— इस समय भी यह सत् ही है; किंतु नामरूप विशेषणयुक्त तथा इदं शब्द और इदं बुद्धिका विषय होनेके कारण 'इदम्' (यह) इस प्रकार भी निर्देश किया जाता है। किन्तु उत्पत्तिके पूर्व आरम्भमें केवल सत् शब्द और सद्बुद्धिका ही विषय होनेके कारण 'यह पहले सत् ही था' इस प्रकार निश्चय किया जाता है। सुषुप्तकालके समान उत्पत्तिसे पूर्व यह नामयुक्त अथवा रूपयुक्त है इस प्रकार वस्तुका ग्रहण नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार सोनेसे उठा हुआ पुरुष वस्तुकी सत्तामात्रका अनुभव करता है अर्थात् केवल इतना जानता है कि सुषुप्तिमें केवल सन्मात्र वस्तु थी, उसी प्रकार उत्पत्तिसे पूर्व जगत् था—ऐसा इसका अभिप्राय है। |
५८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ५८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| यथेदमुच्यते लोके पूर्वाह्णे घटादि सिसृक्षुणा कुलालेन मृत्पिण्डं प्रसारितमुपलभ्य ग्रामान्तरं गत्वा प्रत्यागतोऽपराह्णे तत्रैव घटशरावाद्यनेकभेदभिन्नं कार्यमुपलभ्य मृदेवेदं घटशरावादि केवलं पूर्वाह्णे आसीदिति तथेहाप्युच्यते सदेवेदमग्र आसीदिति । एकमेवेति, स्वकार्यपतितमन्यन्नास्तीत्येकमेवेत्युच्यते । अद्वितीयमिति, मृद्व्यतिरेकेण;मृदो यथान्यद्घटाद्याकारेण परिणमयितृकुलालादिनिमित्तकारणं दृष्टं तथा सद्व्यतिरेकेण सतः सहकारिकारणं द्वितीयं वस्त्वन्तरं प्राप्तं प्रतिषिध्यतेऽद्वितीयमिति, नास्य द्वितीयं वस्त्वन्तरं विद्यत इत्यद्वितीयम् । | जिस प्रकार लोकमें घटादि बनानेकी इच्छावाले कुम्हारद्वारा पूर्वाह्नमें मृत्तिकाके पिण्डको फैलाया हुआ देखकर कोई पुरुष किसी अन्य ग्राममें जाकर मध्याह्नोत्तरकालमें लौटनेपर उसी स्थानमें घट-शराव आदि अनेकों भेदोंवाले मृत्तिकाके कार्यको देखकर यह कहता है कि पूर्वाह्नमें ये घट-शरावादि केवल मृत्तिका ही थे उसी प्रकार यहाँ भी 'यह आरम्भमें केवल सत् ही था' ऐसा कहा जाता है। यह एक ही था; अर्थात् अपने कार्यवर्गमें पतित कोई दूसरा नहीं था, इसलिये 'एक ही था' ऐसा कहा जाता है। और अद्वितीय था; मृत्तिकासे अतिरिक्त [दूसरी वस्तु नहीं थी] जिस प्रकार मृत्तिकाको घटादि आकारमें परिणत करनेवाला कुलाल आदि निमित्तकारण देखा जाता है उसी प्रकार सत्से भिन्न सत्का सहकारी कारणरूप कोई अन्य पदार्थ प्राप्त होता है, उसका 'अद्वितीय था' ऐसा कहकर प्रतिषेध किया जाता है। अर्थात् इससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु नहीं थी, इसलिये यह अद्वितीय था। |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| ननु वैशेषिकपक्षेऽपि सत्सामानाधिकरण्यं सर्वस्योपपद्यते, द्रव्यगुणादिषु सच्छब्दबुद्ध्यनुवृत्तेः; सद्द्रव्यं सन्गुणः सत्कर्मेत्यादिदर्शनात् । | शङ्का— किंतु सत्के साथ सबका सामानाधिकरण्य तो वैशेषिक मतमें भी सम्भव है; क्योंकि द्रव्य एवं गुण आदिमें सत्-शब्द और सद्-बुद्धिकी अनुवृत्ति होती है; जैसा कि 'सद् द्रव्यम्' 'सन् गुणः' एवं 'सत् कर्म' इत्यादि प्रयोगोंमें देखा जाता है। |
| (वैशेषिककल्पितात् सतोऽत्र भेदप्रदर्शनम्)<br>सत्यमेवं स्यादिदानीम्, प्रागुत्पत्तेस्तु नैवेदं कार्यं सदेवासीदित्यभ्युपगम्यते वैशेषिकैः; प्रागुत्पत्तेः कार्यस्यासत्त्वाभ्युपगमात् । न चैकमेवं सदद्वितीयं प्रागुत्पत्तेरिच्छन्ति । तस्माद्वैशेषिकपरिकल्पितात्सतोऽन्यत्कारणमिदं सदुच्यते मृदादिदृष्टान्तेभ्यः । | समाधान— ठीक है, वर्तमान कालमें तो ऐसा ही है, किंतु उत्पत्तिसे पूर्व यह कार्य सत् ही था—ऐसा वैशेषिक मतावलम्बियोंको मान्य नहीं है, क्योंकि उत्पत्तिसे पूर्व वे कार्यका असत्त्व स्वीकार करते हैं। उत्पत्तिसे पूर्व एकमात्र अद्वितीय सत् ही था—ऐसा मानना उन्हें अभीष्ट नहीं है। अतः मृत्तिका आदिके दृष्टान्तोंसे यह वैशेषिकोंद्वारा परिकल्पित सत्की अपेक्षा अन्य सत् कारण बतलाया जाता है। |
| (वैनाशिकमतम्)<br>तत्र हैतस्मिन्प्रागुत्पत्तेर्वस्तुनिरूपण एके वैनाशिका आहुर्वस्तु निरूपयन्तोऽसत्सद्भावमात्रं प्रागुत्पत्तेरिदं जगदेकमेवाग्रेऽद्वितीयमासीदिति । सद्भावमात्रं हि प्रागुत्पत्तेस्तत्त्वं कल्पयन्ति | इस विषयमें अर्थात् उत्पत्तिसे पूर्व वस्तुका निरूपण करनेमें एक यानी वैनाशिक (बौद्ध) वस्तुका निरूपण करते हुए कहते हैं— 'उत्पत्ति से पूर्व आरम्भमें यह जगत् एक अद्वितीय असत् अर्थात् सत्का अभावमात्र ही था। बौद्ध लोग उत्पत्तिसे पूर्व सत्के अभावमात्रको |
५८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ५८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| बौद्धाः। न तु सत्प्रतिद्वन्द्वि वस्त्वन्तरमिच्छन्ति; यथा सच्चासदिति गृह्यमाणं यथाभूतं तद्विपरीतं तत्त्वं भवतीति नैयायिकाः। | ही तत्त्व मानते हैं। वे सत्की विरोधिनी कोई अन्य वस्तु नहीं मानते; जैसा कि नैयायिकोंका मत है कि गृहीत होनेवाली यथाभूत वस्तु और उससे विपरीत तत्त्व ये क्रमशः 'सत्' और 'असत्' हैं। |
| वैनाशिकमतसमीक्षणम्<br>ननु सदभावमात्रं प्रागुत्पत्तेश्चेदभिप्रेतं वैनाशिकैः, कथं प्रागुत्पत्तेरिदमासीदसदेकमेवाद्वितीयं चेति कालसंबन्धः संख्यासंबन्धोऽद्वितीयत्वं चोच्यते तैः। | शङ्का— यदि वैनाशिक उत्पत्तिसे पूर्व सत्का अभावमात्र ही मानते हैं तो 'उत्पत्तिसे पूर्व यह एकमात्र अद्वितीय असत् ही था' ऐसा कहकर वे उसका कालसम्बन्ध, संख्यासम्बन्ध और अद्वितीयत्व कैसे निरूपण करते हैं ? |
| बाढं न युक्तं तेषां भावाभावमात्रमभ्युपगच्छताम्। असत्त्वमात्राभ्युपगमोऽप्ययुक्त एव, अभ्युपगन्तुरनभ्युपगमानुपपत्तेः। इदानीमभ्युपगन्ताभ्युपगम्यते न प्रागुत्पत्तेरिति चेत् ? न; प्रागुत्पत्तेः सद्भावस्य प्रमाणाभावात्। प्रागुत्पत्तेरसदेवेति कल्पनानुपपत्तिः। | समाधान— ठीक है, सत्की असत्तामात्र माननेवाले उन लोगोंका ऐसा कहना उचित नहीं है। इसके सिवा उनका असत्तामात्र मानना भी अनुचित ही है; क्योंकि जो [ऐसा] माननेवाला है उसका न मानना सम्भव नहीं है। यदि कहो कि इस समय तो माननेवाला माना ही जाता है उत्पत्तिसे पूर्व ही नहीं माना जाता, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि इस प्रकार उत्पत्तिसे पूर्व सत्के अभावको सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं रहता, और फिर 'उत्पत्तिसे पूर्व असत् ही था' ऐसी कल्पनाका होना सम्भव नहीं होता। |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८७
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| ननु कथं वस्त्वाकृतेः शब्दार्थ-<br>त्वेऽसदेकमेवाद्वितीयमितिपदार्थ-<br>वाक्यार्थोपपत्तिः, तदनुपपत्तौ<br>चेदं वाक्यमप्रमाणं प्रसज्येतेति<br>चेत् ?<br><br>नैष दोषः, सद्ग्रहणनिवृत्ति-<br>(मीमांसकोद्भावित-दोषनिराकरणम्) परत्वाद्वाक्यस्य ।<br>सदित्ययं तावच्छ-<br>ब्दः सदाकृतिवाचकः । एकमे-<br>वाद्वितीयमित्येतौ च सच्छब्देन<br>समानाधिकरणौ; तथेेदमासी-<br>दिति च । तत्र नञ् सद्वाक्ये प्रयुक्तः<br>सद्वाक्यमेवावलम्ब्य सद्वाक्यार्थ-<br>विषयां बुद्धिं सदेकमेवाद्वितीयमि-<br>दमासीदित्येवंलक्षणां ततः सद्वा-<br>क्यार्थान्निवर्तयत्यश्वारूढ इवाश्वा-<br>लम्बनोऽश्वं तदभिमुखविषयान्नि-<br>वर्तयति तद्वत् । न तु पुनः सद- | मीमांसक— किंतु शब्दका अर्थ तो वस्तुकी आकृति ही होती है, ऐसी अवस्थामें एकमात्र अद्वितीय असत् ही था, इन पदोंका अथवा इस वाक्यका अर्थ कैसे ठीक हो सकता है ? और ठीक न हो सकनेपर तो यह [ श्रुतिका ] वाक्य ही अप्रामाणिक सिद्ध होगा ।<br><br>सिद्धान्ती— यहाँ यह दोष नहीं आता; क्योंकि यह वाक्य केवल सत्को ग्रहण करनेकी निवृत्ति करने मात्रमें ही तात्पर्य रखता है। 'सत्' यह शब्द तो सत्की आकृतिका वाचक है ही । 'एकमात्र अद्वितीय' ये दोनों शब्द 'सत्' शब्दके साथ समानाधिकरणरूपसे प्रयुक्त हैं । इसी प्रकार 'इदम्' और 'आसीत्' शब्द भी समानाधिकरण हैं । ऐसी अवस्थामें सद्-वाक्यमें प्रयोग किया हुआ 'नञ्¹' सद्-वाक्यको ही आलम्बन करके 'एकमात्र अद्वितीय सत् ही था' ऐसी सद्-वाक्यार्थसम्बन्धिनी बुद्धिको, जिस प्रकार कि घोड़ेपर चढ़ा हुआ पुरुष घोड़ेका ही आश्रय लेकर उसे उसके अभिमुख विषयोंसे फेर देता है उसी प्रकार, सद्-वाक्यके अर्थसे निवृत्त कर देता है । वह |
१. 'असत्' शब्दमें जो 'अ' है उसीको 'नञ्' कहा गया है ।
५८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ५८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| भावमेवाभिधत्ते । अतः पुरुषस्य विपरीतग्रहणनिवृत्त्यर्थपरमिदमसदेवेत्यादि वाक्यं प्रयुज्यते । दर्शयित्वा हि विपरीतग्रहणं ततो निवर्तयितुं शक्यत इत्यर्थवत्त्वादसदादिवाक्यस्य श्रौतत्वं प्रामाण्यं च सिद्धमित्यदोषः । तस्मादसतस्सर्वाभावरूपात्सद्विद्यमानं जायत समुत्पन्नम् । अडभावश्छान्दसः ॥ १ ॥ | सत्के अभावका ही निरूपण नहीं करता अतः पुरुषके विपरीत ग्रहणकी निवृत्तिके लिये ही 'यह असत् ही था' इत्यादि वाक्यका प्रयोग किया गया है। विपरीतग्रहणको दिखलाकर ही उससे निवृत्त करना सम्भव है। इस प्रकार असत् आदि वाक्य सार्थक होनेके कारण उसका श्रौतत्व और प्रामाण्य सिद्ध ही है। अतः इसमें कोई दोष नहीं है। उस सर्वाभावरूप असत्से सत् अर्थात् विद्यमान कार्यजात उत्पन्न हुआ। [मूलमें 'सज्जायत' के स्थानमें 'सत् अजायत' ऐसा होना चाहिये था, सो 'जायत' इस क्रियापदमें ] अट्का अभाव वैदिक है ॥ १ ॥ |
| तदेतद्विपरीतग्रहणं महावैनाशिकपक्षं दर्शयित्वा प्रतिषेधति— | इस प्रकार यह विपरीतग्रहणरूप महावैनाशिकका पक्ष दिखलाकर अब [ आरुणि ] उसका प्रतिषेध करता है- |
कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति । सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥ २ ॥
"किंतु हे सोम्य ! ऐसा कैसे हो सकता है, भला असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? अतः हे सोम्य ! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था' ऐसा [ आरुणिने ] कहा ॥ २ ॥
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८९
| [वैनाशिकमत-खण्डनम्]<br>कुतस्तु प्रमाणात्खलु हे सोम्यैवं स्यात्, असतः सज्जायेतेत्येवं कुतो भवेत् ? न कुतश्चित्प्रमाणादेवं संभवतीत्यर्थः । यदपि बीजोपमर्देऽङ्कुरो जायमानो दृष्टोऽभावादेवेति, तदप्यभ्युपगमविरुद्धं तेषाम् । कथम् ? ये तावद्बीजावयवा बीजसंस्थानविशिष्टास्तेऽङ्कुरेऽप्यनुवर्तन्त एव, न तेषामुपमर्दोऽङ्कुरजन्मनि । यत्पुनर्बीजाकारसंस्थानम्, तद्बीजावयवव्यतिरेकेण वस्तुभूतं न वैनाशिकैरभ्युपगम्यते, यदङ्कुरजन्मन्युपमृद्येत । अथ तदस्त्यवयवव्यतिरिक्तं वस्तुभूतम्, तथा च सत्यभ्युपगमविरोधः । | किंतु हे सोम्य ! ऐसा किस प्रमाणसे हो सकता है ? अर्थात् असत्से सत् उत्पन्न हो—ऐसा कैसे हो सकता है ? तात्पर्य यह है कि ऐसा होना किसी भी प्रमाणसे सम्भव नहीं है तथा वे लोग जो यह मानते हैं कि बीजका नाश होनेपर अभावहीसे अङ्कुर उत्पन्न होता देखा गया है वह भी उनके ही सिद्धान्तके विरुद्ध है । किस प्रकार विरुद्ध है ? बीजके आकारसे युक्त जो बीजके अवयव हैं उनकी अनुवृत्ति अङ्कुरमें भी होती ही है; अङ्कुरके उत्पन्न होनेपर उनका नाश नहीं हो जाता । तथा जो बीजाकारका संस्थान है उसे तो वैनाशिक भी बीजके अवयवोंसे भिन्न कोई वस्तु नहीं मानते; जिसका कि अङ्कुरकी उत्पत्ति होनेपर नाश हो । यदि कहो कि बीजावयवोंसे व्यतिरिक्त वह वास्तविक स्वरूपसे है तो यह उनकी ही मान्यताके विरुद्ध होगा। | | अथ संवृत्याभ्युपगतं बीजसंस्थानरूपमुपमृद्यत इति चेत् ? | यदि कहो कि संवृति (लौकिक व्यवहार) द्वारा माना गया बीजसंस्थानका रूप नष्ट होता है तो यह बतलाओ कि यह संवृति क्या |
५९० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
५९० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| केयं संवृतिर्नाम-किमसावभाव उत भाव इति ? यद्यभावः, दृष्टान्ताभावः । अथ भावः, तथापि नाभावादङ्कुरोत्पत्तिः, बीजावयवेभ्यो ह्यङ्कुरोत्पत्तिः ।<br><br>अवयवा अप्युपमृद्यन्त इति चेत् ? न; तदवयवेषु तुल्यत्वात् । यथा वैनाशिकानां बीजसंस्थानरूपोऽवयवी नास्ति, तथावयवा अपीति तेषामप्युपमर्दानुपपत्तिः । बीजावयवानामपि सूक्ष्मावयवास्तदवयवानामप्यन्ये सूक्ष्मतरावयवा इत्येवं प्रसङ्गस्यानिवृत्तेः सर्वत्रोपमर्दानुपपत्तिः । सद्बुद्ध्यनुवृत्तेः सत्त्वानिवृत्तिश्चेति तद्वादिनां सत | चीज है। यह भाव है या अभाव ? यदि अभाव है तो [अभावसे भावकी उत्पत्ति होनेमें ] कोई दृष्टान्त नहीं है। [ अतः अभावरूपा संवृत्ति बीजकी सत्ताकी साधिका नहीं हो सकती ] और यदि भाव है तो भी अभावसे अङ्कुरकी उत्पत्ति होना सिद्ध नहीं होता, क्योंकि अङ्कुरकी उत्पत्ति तो बीजके अवयवोंसे ही होती है ।<br><br>और यदि ऐसा मानें कि अवयवोंका भी नाश हो जाता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि यह दोष अवयवीके समान ही उसके अवयवोंमें भी है । जिस प्रकार वैनाशिकोंके मतमें बीजसंस्थानरूप अवयवी नहीं है उसी प्रकार अवयव भी नहीं हैं; अतः उनका नाश होना सम्भव नहीं है । बीजावयवोंके भी सूक्ष्म अवयव होने चाहिये और उन अवयवोंके भी दूसरे सूक्ष्मतर अवयव होने चाहिये-इस प्रकार प्रसङ्गकी अनिवृत्ति ( अनवस्था दोष ) होनेके कारण सर्वत्र नाश होना सम्भव नहीं है । तथा सर्वत्र सद्बुद्धिकी अनुवृत्ति होनेके कारण सत्त्वकी निवृत्ति नहीं होगी । इस प्रकार सद्वादियोंकी मानी हुई सत्से सत्की उत्पत्ति |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्याथ ५९१
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एव सदुत्पत्तिः सेत्स्यति। न त्वसद्वादिनां दृष्टान्तोऽस्त्यसतः सदुत्पत्तेः। मृत्पिण्डाद्घटोत्पत्तिर्दृश्यते सद्वादिनां तद्भावे भावात्तदभावे चाभावात्। | ही सिद्ध होगी। असत्से सत्की उत्पत्ति होनेमें असद्वादियोंके पास कोई दृष्टान्त भी नहीं है। सद्वादियोंके मतमें मृत्तिकाके पिण्डसे घटकी उत्पत्ति होती देखी गयी है; क्योंकि उसकी सत्ताके रहते हुए घटकी भी सत्ता है और उसका अभाव होनेपर घटका भी अभाव हो जाता है। |
| यद्यभावादेव घट उत्पद्येत घटार्थिना मृत्पिण्डो नोपादीयेत। अभावशब्दबुद्ध्यनुवृत्तिश्च घटादौ प्रसज्येत न त्वेतदस्त्यतो नासतः सदुत्पत्तिः। | यदि अभावसे ही घटकी उत्पत्ति होती तो घट बनानेकी इच्छावालेको मृत्तिकाका पिण्ड लेनेकी आवश्यकता न होती तथा घटादिमें 'अभाव' शब्द और अभाव-बुद्धिकी अनुवृत्तिका भी प्रसंग उपस्थित होता। किंतु ऐसा नहीं। इसलिये असत्से सत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती। |
| यदप्याहुर्मृद्बुद्धिर्घटबुद्धेर्निमित्तमिति मृद्बुद्धिर्घटबुद्धेः कारणमुच्यते, न तु परमार्थत एव मृद्घटो वास्तीति; तदपि मृद्बुद्धिर्विद्यमाना विद्यमानाया एव घटबुद्धेः कारणमिति नासतः सदुत्पत्तिः। | इसके सिवा वे लोग जो ऐसा कहते हैं कि 'मृत्तिकाबुद्धि घटबुद्धिका निमित्त है; अतः मृद्बुद्धि ही घटबुद्धिका कारण कही जाती है, वस्तुतः मृत्तिका अथवा घट कुछ भी नहीं है' इसके अनुसार भी विद्यमान मृद्बुद्धि ही विद्यमान घटबुद्धिका कारण है; अतः असत्से सत्की उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती। |
५९२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
५९२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
| मृद्घटबुद्ध्योर्निमित्तनैमित्तिकतयानन्तर्यमात्रं न तु कार्यकारणत्वमिति चेत् ? न; बुद्धीनां नैरन्तर्ये गम्यमाने वैनाशिकानां बहिर्दृष्टान्ताभावात् । | यदि कहो कि मृद्बुद्धि तथा घटबुद्धिका निमित्त और नैमित्तिकरूपसे आनन्तर्यमात्र* है; कार्य कारण भाव नहीं है तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि इन बुद्धियोंकी निरन्तरताका ज्ञान करानेमें वैनाशिकोंके पास कोई बाह्य दृष्टान्त नहीं है ।‡ | | अतः कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथं केन प्रकारेणासतः सज्जायेतेति । असतः सदुत्पत्तौ न कश्चिदपि दृष्टान्तप्रकारोऽस्तीत्यभिप्रायः । एवमसद्वादिपक्षमन्मथ्योपसंहरति सदेव सोम्येदमग्र आसीदिति स्वपक्षसिद्धिम् । | 'अतः हे सोम्य ! ऐसा कैसे हो सकता है ?' ऐसा आरुणिने कहा । अर्थात् असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे—किस प्रकार हो सकती है । तात्पर्य यह है कि असत्से सत्की उत्पत्ति होनेमें कोई भी दृष्टान्तका प्रकार नहीं है । इस तरह असद्वादीके पक्षका उन्मन्थन (निरसन) कर आरुणि 'हे सोम्य ! आरम्भमें यह सत् ही था' इस प्रकार अपने पक्षकी सिद्धिका उपसंहार करता है । | | ननु सद्वादिनोऽपि सतः सदुत्पद्यत इति नैव दृष्टान्तोऽस्ति । घटाद्धटान्तरोत्पत्त्यदर्शनात् । | शङ्का—किंतु सद्वादीके मतानुसार सत्से सत्की उत्पत्ति होती है इसमें भी तो कोई दृष्टान्त नहीं है, क्योंकि एक घटसे दूसरे घटकी उत्पत्ति होती नहीं देखी जाती । |
* अर्थात् पहले मृद्बुद्धि होती है उसके बाद घटबुद्धि—यही सूचित करता है ।
‡ बौद्धमतावलम्बी बाह्य पदार्थोंकी सत्ता नहीं मानते; अतः उनके सिद्धान्तानुसार मृद्बुद्धि, घटबुद्धि आदि भी असत् ही है । इसलिये इनका नैरन्तर्य अथवा निमित्त-नैमित्तिकत्व बतलाना भी असंगत ही है ।