भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 579, कुल 978 में से

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पृष्ठ 579

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७५


तस्यातः प्रवासोऽनुमीयते पितुः । येन स्वयं गुणवान्सन्पुत्रं नोपनेष्यति ।इस प्रसंगसे ऐसा अनुमान होता है कि उसका पिता घरसे बाहर जानेवाला है, इसीसे गुणवान् होनेपर भी वह स्वयं पुत्रका उपनयन नहीं करेगा ।

स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय । तं ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ २ ॥

वह श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामें उपनयन कराकर चौबीस वर्षका होनेपर सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर अपनेको बड़ा बुद्धिमान् और व्याख्या करनेवाला मानते हुए उद्धण्डभावसे घर लौटा । उससे पिताने कहा—'हे सोम्य ! तू जो ऐसा महामना, पण्डितम्मन्य और अविनीत है सो क्या तूने वह आदेश पूछा है ?' ॥ २ ॥

स पित्रोक्तः श्वेतकेतुर्ह द्वादशवर्षः सन्नुपेत्याचार्यं यावच्चतुर्विंशतिवर्षो बभूव, तावत्सर्वान् वेदांश्चतुरोऽप्यधीत्य तदर्थं च बुद्ध्वा महामना महद्गम्भीरं मनो यस्यासममात्मानमन्यैर्मन्यमानं मनो यस्य सोऽयं महामना अनूचानमान्यनूचानमात्मानं मन्यत इत्येवंशीलो यः सोऽनूचानमानी स्तब्धोऽप्रणतस्वभाव एयाय गृहम् ।पिताके कहनेपर वह श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामें गुरुके समीप जाकर जबतक कि चौबीस वर्षका हुआ तबतक सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर और उनका अर्थ समझकर महामना—जिसका मन महान् अर्थात् गम्भीर हो यानी जिसका मन अपनेको दूसरेके समान न समझनेवाला हो उसे महामना कहते हैं, अनूचानमानी—अपनेको बड़ा प्रवक्ता माननेवाला अर्थात् जो ऐसे स्वभाववाला हो उसे अनूचानमानी कहते हैं, और स्तब्ध—अविनीतस्वभाव होकर घर लौटा ।