छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 582, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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हे सोम्य ! जिस प्रकार एक मृत्तिकाके पिण्डके द्वारा सम्पूर्ण मृन्मय पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है कि विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है ॥ ४ ॥
| हे सोम्य यथा लोक एकेन मृत्पिण्डेन करककुम्भादिकारण-भूतेन विज्ञातेन सर्वमन्यत्तद्वि-कारजातं मृन्मयं मृद्विकारजातं विज्ञातं स्यात् । <br> कथं मृत्पिण्डे कारणे विज्ञाते कार्यमन्यद्विज्ञातं स्यात् ? <br> नैष दोषः कारणेनानन्य-त्वात्कार्यस्य । यन्मन्यसे-ऽन्यस्मिन्विज्ञातेऽन्यन्न ज्ञायत इति, सत्यमेवं स्यात्, यद्यन्य-त्कारणात्कार्यं स्यान्न त्वेवमन्य-त्कारणात्कार्यम् । <br> कथं तर्हीदं लोक इदं कारण-मयमस्य विकार इति ? <br> शृणु; वाचारम्भणं वागा- | हे सोम्य ! लोकमें जिस प्रकार कमण्डलु और घट आदिके कारण-भूत एक मृत्पिण्डके जान लिये जानेपर ही उसका विकारजात सम्पूर्ण मृन्मय अर्थात् मृत्तिकाका कार्यसमूह जान लिया जाता है। <br> **शङ्का—**मृत्तिकाके पिण्डरूप कारणका ज्ञान होनेपर अन्य कार्य-वर्गका ज्ञान कैसे हो सकता है ? <br> **समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि कार्य अपने कारणसे अभिन्न होता है । तुम जो ऐसा मानते हो कि अन्यका ज्ञान होनेपर अन्य नहीं जाना जा सकता, सो यह बात उस समय तो ठीक होती जब कि कारणसे कार्य भिन्न होता, किंतु इस प्रकार कार्य अपने कारणसे भिन्न है नहीं । <br> **शङ्का—**तो फिर लोकमें ऐसा क्यों कहा जाता है कि यह कारण है और यह इसका विकार है ? <br> **समाधान—**सुनो, यह वाचा-रम्भण--वागारम्भण अर्थात् वाणी- |