छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७७
| येनादेशेन श्रुतेनाश्रुतमप्यन्यच्छ्रुतं भवत्यमतं मतमतर्कितं तर्कितं भवत्यविज्ञातं विज्ञातमनिश्चितं निश्चितं भवतीति । सर्वानपि वेदानधीत्य सर्वं चान्यज्ज्ञेयमधिगम्याप्यकृतार्थ एव भवति यावदात्मतत्त्वं न जानातीत्याख्यायिकातोऽवगम्यते ।<br><br>तदेतदद्भुतं श्रुत्वाह कथं न्वेतदप्रसिद्धमन्यविज्ञानेनान्यद्विज्ञातं भवतीत्येवं मन्वानः पृच्छति कथं नु केन प्रकारेण हे भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥ | 'जिस आदेशके द्वारा अन्य बिना सुना हुआ भी सुना हुआ हो जाता है, अमत अर्थात् बिना विचार किया हुआ मत—विचारा हुआ हो जाता है और अविज्ञात—अनिश्चित विज्ञात—निश्चित हो जाता है।' इस आख्यायिकासे यह जाना जाता है कि समस्त वेदोंका अध्ययन और अन्य सम्पूर्ण ज्ञेय पदार्थोंका ज्ञान प्राप्त करनेपर भी जबतक पुरुष आत्मतत्त्वको नहीं जानता, तबतक अकृतार्थ ही रहता है। इस विचित्र प्रश्नको सुनकर श्वेतकेतुने यह सोचते हुए कि यह अप्रसिद्ध बात कैसे हो सकती है कि अन्य वस्तुके ज्ञानसे अन्य समस्त पदार्थोंका भी ज्ञान हो जाय, कहा—'हे भगवन् ! वह आदेश कैसा—किस प्रकारका है?' ॥ ३ ॥ |
| यथा स आदेशो भवति तच्छृणु— | पिता—वह आदेश जिस प्रकार है सो सुन— |
यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातꣳ स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥४॥