छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 588, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| यथेदमुच्यते लोके पूर्वाह्णे घटादि सिसृक्षुणा कुलालेन मृत्पिण्डं प्रसारितमुपलभ्य ग्रामान्तरं गत्वा प्रत्यागतोऽपराह्णे तत्रैव घटशरावाद्यनेकभेदभिन्नं कार्यमुपलभ्य मृदेवेदं घटशरावादि केवलं पूर्वाह्णे आसीदिति तथेहाप्युच्यते सदेवेदमग्र आसीदिति । एकमेवेति, स्वकार्यपतितमन्यन्नास्तीत्येकमेवेत्युच्यते । अद्वितीयमिति, मृद्व्यतिरेकेण;मृदो यथान्यद्घटाद्याकारेण परिणमयितृकुलालादिनिमित्तकारणं दृष्टं तथा सद्व्यतिरेकेण सतः सहकारिकारणं द्वितीयं वस्त्वन्तरं प्राप्तं प्रतिषिध्यतेऽद्वितीयमिति, नास्य द्वितीयं वस्त्वन्तरं विद्यत इत्यद्वितीयम् । | जिस प्रकार लोकमें घटादि बनानेकी इच्छावाले कुम्हारद्वारा पूर्वाह्नमें मृत्तिकाके पिण्डको फैलाया हुआ देखकर कोई पुरुष किसी अन्य ग्राममें जाकर मध्याह्नोत्तरकालमें लौटनेपर उसी स्थानमें घट-शराव आदि अनेकों भेदोंवाले मृत्तिकाके कार्यको देखकर यह कहता है कि पूर्वाह्नमें ये घट-शरावादि केवल मृत्तिका ही थे उसी प्रकार यहाँ भी 'यह आरम्भमें केवल सत् ही था' ऐसा कहा जाता है। यह एक ही था; अर्थात् अपने कार्यवर्गमें पतित कोई दूसरा नहीं था, इसलिये 'एक ही था' ऐसा कहा जाता है। और अद्वितीय था; मृत्तिकासे अतिरिक्त [दूसरी वस्तु नहीं थी] जिस प्रकार मृत्तिकाको घटादि आकारमें परिणत करनेवाला कुलाल आदि निमित्तकारण देखा जाता है उसी प्रकार सत्से भिन्न सत्का सहकारी कारणरूप कोई अन्य पदार्थ प्राप्त होता है, उसका 'अद्वितीय था' ऐसा कहकर प्रतिषेध किया जाता है। अर्थात् इससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु नहीं थी, इसलिये यह अद्वितीय था। |