भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 587

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
अग्रे जगतः प्रागुत्पत्तेः।समाधान— आगे अर्थात् जगत्‌की उत्पत्तिके पूर्व।
किं नेदानीमिदं सद्येनाग्र आसीदिति विशेष्यते ?शङ्का— तो क्या इस समय यह सत्‌ नहीं है जो 'आरम्भमें था' इस प्रकार विशेषण दिया गया है ?
न।समाधान— नहीं, ऐसी बात नहीं है।
कथं तर्हि विशेषणम् ?शङ्का— तो फिर यह विशेषण क्यों दिया गया है ?
इदानीमपीदं सदेव किं तु<br>(जगतः सदैव सन्मात्रत्वे सहेतु-दृष्टान्तप्रदर्शनम्)<br>नामरूपविशेषणवदिदंशब्दबुद्धिविषयं चेतीदं च भवति। प्रागुत्पत्तेस्त्वग्रे केवलसच्छब्दबुद्धिमात्रगम्यमेवेति सदेवेदमग्र आसीदित्यवधार्यते। न हि प्रागुत्पत्तेर्नामवद्रूपवद्वेदमिति ग्रहीतुं शक्यं वस्तु सुषुप्तकाल इव। यथा सुषुप्तादुत्थितः सत्त्वमात्रमवगच्छति सुषुप्ते सन्मात्रमेव केवलं वस्त्विति तथा प्रागुत्पत्तेरित्यभिप्रायः।समाधान— इस समय भी यह सत्‌ ही है; किंतु नामरूप विशेषणयुक्त तथा इदं शब्द और इदं बुद्धिका विषय होनेके कारण 'इदम्‌' (यह) इस प्रकार भी निर्देश किया जाता है। किन्तु उत्पत्तिके पूर्व आरम्भमें केवल सत्‌ शब्द और सद्बुद्धिका ही विषय होनेके कारण 'यह पहले सत्‌ ही था' इस प्रकार निश्चय किया जाता है। सुषुप्तकालके समान उत्पत्तिसे पूर्व यह नामयुक्त अथवा रूपयुक्त है इस प्रकार वस्तुका ग्रहण नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार सोनेसे उठा हुआ पुरुष वस्तुकी सत्तामात्रका अनुभव करता है अर्थात् केवल इतना जानता है कि सुषुप्तिमें केवल सन्मात्र वस्तु थी, उसी प्रकार उत्पत्तिसे पूर्व जगत्‌ था—ऐसा इसका अभिप्राय है।