छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 572, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंश खण्ड
'उदानाय स्वाहा' इस पाँचवीं आहुतिका वर्णन
अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहे- त्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥ उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृ- प्यत्याकाशे तृप्यति यत्किं च वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठ- तस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिर- न्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
फिर जो पाँचवीं आहुति दे उसे 'उदानाय स्वाहा' ऐसा कहकर देना चाहिये, इससे उदान तृप्त होता है ॥ १ ॥ उदानके तृप्त होनेपर त्वचा तृप्त होती है, त्वचाके तृप्त होनेपर वायु तृप्त होता है, वायुके तृप्त होनेपर आकाश तृप्त होता है तथा आकाशके तृप्त होनेपर जिस किसीपर वायु और आकाश [स्वामिभावसे] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, और उसकी तृप्तिके पश्चात् स्वयं भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥
| अथ यां द्वितीयां तृतीयां चतुर्थीं पञ्चमीमिति समानम् ॥ ५ । २० — ५ । २३ ॥ | 'अथ यां द्वितीयां तृतीयां चतुर्थीं पञ्चमीम्' इत्यादि श्रुतियोंका अर्थ समान है॥ ५ । २० — ५ । २३॥ |
इति च्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये त्रयोविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २३ ॥