छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 571, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंश खण्ड
—: ० :—
‘समानाय स्वाहा’ इस चौथी आहुतिका वर्णन
अथ यां चतुर्थीं जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वा-
हेति समानस्तृप्यति ॥ १॥ समाने तृप्यति मनस्तृप्यति
मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तृ-
प्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किं च विद्युच्च पर्जन्य-
श्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया
पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
तदनन्तर जो चौथी आहुति दे उसे ‘समानाय स्वाहा’ ऐसा कहकर देना चाहिये; इससे समान तृप्त होता है ॥ १ ॥ समानके तृप्त होनेपर मन तृप्त होता है, मनके तृप्त होनेपर पर्जन्य तृप्त होता है, पर्जन्यके तृप्त होनेपर विद्युत् तृप्त होती है तथा विद्युत्के तृप्त होनेपर जिस किसीके ऊपर विद्युत् और पर्जन्य अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके अनन्तर भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥
—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
द्वाविंशखण्डः सम्पूर्णः ॥ २२ ॥