भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 978 में से

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पृष्ठ 573

चतुर्विंश खण्ड

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अविद्वान्‌के हवनका स्वरूप

स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारान-
पोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक्तत्स्यात् ॥ १ ॥

वह जो कि इस वैश्वानरविद्याको न जानकर हवन करता है उसका वह हवन ऐसा है, जैसे अङ्गारोंको हटाकर भस्ममें हवन करे ॥ १ ॥

| स यः कश्चिदिदं वैश्वानरदर्शनं यथोक्तमविद्वान्सन्नग्निहोत्रं प्रसिद्धं जुहोति, यथाङ्गारानाहुतियोग्यानपोह्यानाहुतिस्थाने भस्मनि जुहुयात्, तादृक् तत्तुल्यं तस्य तदग्निहोत्रहवनं स्याद्वैश्वानरविदोऽग्निहोत्रमपेक्ष्येति प्रसिद्धाग्निहोत्रनिन्दया वैश्वानरविदोऽग्निहोत्रं स्तूयते ॥ १ ॥ | वह, जो कोई कि इस उपर्युक्त वैश्वानर-विद्याको न जाननेवाला होकर ही लोकप्रसिद्ध अग्निहोत्र करता है उसका वह हवन वैश्वानरोपासकके अग्निहोत्रकी अपेक्षा ऐसा है अर्थात् इसके सदृश है जैसे कि आहुतियोग्य अङ्गारोंको हटाकर कोई आहुति न देनेयोग्य स्थान—भस्ममें आहुति दे। इस प्रकार प्रसिद्ध अग्निहोत्रकी निन्दाद्वारा वैश्वानरोपासकके अग्निहोत्रकी स्तुति की जाती है ॥ १ ॥ |


विद्वान्‌के हवनका फल

| अतश्चैतद्विशिष्टमग्निहोत्रम् ।<br>कथम् ? | इसलिये भी यह विशिष्ट अग्निहोत्र है; किसलिये— |