छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 574, कुल 978 में से
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५७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ २ ॥
क्योंकि जो इस (वैश्वानर) को इस प्रकार जाननेवाला पुरुष अग्निहोत्र करता है उसका समस्त लोक, सारे भूत और सम्पूर्ण आत्माओंमें हवन हो जाता है ॥ २ ॥
| अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य यथोक्तवैश्वानरविज्ञानवतः सर्वेषु लोकेष्वित्याद्युक्तार्थम् । हुतमन्नमत्तीत्यनयोरेकार्थत्वात् ॥ २ ॥ | क्योंकि जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष अग्निहोत्र करता है उस उपर्युक्त वैश्वानर विद्यावान्का 'सर्वेषु लोकेषु' इत्यादि शब्दोंका अर्थ पहले (छा० ५ । १८ । १ के भाष्यमें) कहा जा चुका है, क्योंकि यहाँके 'हुतम्' और वहाँके 'अन्नम् अत्ति' इन दोनों पदोंका एक ही अर्थ है ॥२॥ |
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| किं च— | तथा— |
तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवंऽहास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति॥३॥
इस विषयमें यह दृष्टान्त भी है--जिस प्रकार सींकका अग्रभाग अग्निमें घुसा देनेसे तत्काल जल जाता है उसी प्रकार जो इस प्रकार जाननेवाला होकर अग्निहोत्र करता है उसके समस्त पाप भस्म हो जाते हैं ॥ ३ ॥
| तद्यथेषीकायास्तूलमग्रमग्नौ प्रोतं प्रक्षिप्तं प्रदूयेत प्रदह्येत | इस विषयमें यह दृष्टान्त है—जिस प्रकार सींकका तूल—अग्रभाग अग्नि- |
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