भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 575

खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५७१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
क्षिप्रमेवं हास्य विदुषः सर्वात्मभूतस्य सर्वान्नानामत्तुः सर्वे निरवशिष्टाः पाप्मानो धर्माधर्माख्या अनेकजन्मसम्व्रिता इह, च प्राग्ज्ञानोत्पत्तेर्ज्ञानसहभाविनश्च प्रहूयन्ते प्रदह्येन्वर्तमानशरीरारम्भकपाप्मवर्जम् ; लक्ष्यं प्रति मुक्तेषुवत्प्रवृत्तफलत्वात्तस्य न दाहः । य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति भुङ्क्ते ॥ ३ ॥में डालनेपर तुरन्त ही जल जाता है उसी प्रकार सबके अन्तरात्मभूत और समस्त अन्नोंके भोक्ता इस विद्वान्के अनेकों जन्मोंमें संचित हुए तथा इस जन्ममें ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व और ज्ञानके साथ-साथ होनेवाले धर्माधर्मसंज्ञक समस्त-निःशेष पाप दग्ध हो जाते हैं; केवल वर्तमान शरीरका आरम्भ करनेवाले पाप रह जाते हैं, क्योंकि लक्ष्यके प्रति छोड़े हुए बाणके समान फल देनेमें प्रवृत्त हो जानेके कारण उनका दाह नहीं हो सकता है। जो इस (वैश्वानरदर्शन) को इस प्रकार जाननेवाला होकर हवन करता यानी भोजन करता है [ उसे उपर्युक्त फल मिलता है ] ॥ ३ ॥

तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरे हुतँस्यादिति तदेष श्लोकः ॥ ४ ॥

अतः वह इस प्रकार जाननेवाला यदि चाण्डालको उच्छिष्ट भी दे तो भी उसका वह अन्न वैश्वानर आत्मामें ही हुत होगा। इस विषयमें यह मन्त्र है ॥ ४ ॥


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
स यद्यपि चाण्डालायोच्छिष्टानर्हायोच्छिष्टं प्रयच्छेदुच्छिष्टं दद्यात्प्रतिषिद्धमुच्छिष्टदानं यद्यपिवह यद्यपि उच्छिष्टदानके अयोग्य चाण्डालको उच्छिष्ट भी दे अर्थात् प्रतिषिद्ध उच्छिष्टदान भी