छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 567, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 567
एकोनविंश खण्ड
भोजनकी अग्निहोत्रत्वसिद्धिके लिये 'प्राणाय स्वाहा' इस पहली आहुतिका वर्णन
तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयꣳस यां प्रथमा-
माहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृ-
प्यति ॥ १ ॥
अतः जो अन्न पहले आवे, उसका हवन करना चाहिये, उस समय वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे 'प्राणाय स्वाहा' ऐसा कह-कर दे। इस प्रकार प्राण तृप्त होता है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्तत्रैवं सति यद्भक्तं भोजन-काल आगच्छेद्भोजनार्थम्, तद्धोमीयं तद्धोतव्यम्, अग्निहोत्रसंपन्मात्रस्य विवक्षितत्वा-न्नाग्निहोत्राङ्गेतिकर्तव्यताप्रा-प्तिरिह; स भोक्ता यां प्रथमा-माहुतिं जुहुयात्तां कथं जुहु-यात् ? इत्याह-प्राणाय स्वाहे-त्यनेन मन्त्रेणाहुतिशब्दादवदा-नप्रमाणमन्नं प्रक्षिपेदित्यर्थः ।<br><br>तेन प्राणस्तृप्यति ॥ १ ॥ | अतः ऐसा होनेके कारण भोजनके समय जो भात (अन्न) आवे उससे हवन करना चाहिये। यहाँ अग्निहोत्रकी कल्पनामात्र विवक्षित है इसलिये अग्निहोत्रकी अङ्गभूत इतिकर्तव्यता (सहकारी साधनों) की प्राप्ति नहीं है। वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे किस प्रकार दे? सो श्रुति बतलाती है—'प्राणाय स्वाहा' इस मन्त्रसे, यहाँ 'आहुति' शब्द होनेके कारण अवदानप्रमाण (जितना कि आहुतिमें विहित है उतना) अन्न [मुखमें] डाले—ऐसा इसका तात्पर्य है। उससे प्राण तृप्त होता है ॥ १ ॥ |