छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 555, कुल 978 में से
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चतुर्दश खण्ड
--: ३ :--
अश्वपति और इन्द्रद्युम्नका संवाद
अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्व-
मात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष
वै पृथग्वर्त्मात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वां
पृथग्बलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥
तदनन्तर राजाने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्नसे कहा—'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला—'हे पूज्य राजन् ! मैं वायुकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजाने कहा— ] 'जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही पृथग्वर्त्मा वैश्वानर आत्मा है; इसीसे तुम्हारे प्रति पृथक्-पृथक् उपहार आते हैं और तुम्हारे पीछे पृथक् पृथक् रथकी पङ्क्तियाँ चलती हैं' ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्से इत्यादि समानम् । पृथग्वर्त्मा नाना वर्त्मानि यस्य वायोरावहोद्वहादिभिर्भेदैर्वर्तमानस्य सोऽयं पृथग्वर्त्मा वायुः । तस्मात्पृथग्वर्त्मात्मनो वैश्वानरस्योपासनात्पृ- | तदनन्तर राजाने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्नसे कहा—'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । पृथग्वर्त्मा—आवह, उद्वह आदि भेदोंसे विद्यमान जिस वायुके अनेकों मार्ग हैं वह वायु पृथग्वर्त्मा है । 'अतः पृथग्वर्त्मा वैश्वानर आत्माकी उपासना करनेके कारण तुम्हारे पास पृथक् |