छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 557, कुल 978 में से
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पञ्चदश खण्ड
一: ० :一
अश्वपति और जनका संवाद
अथ होवाच जनँशार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमु- पास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥
तदनन्तर राजाने जनसे कहा—'हे शार्कराक्ष्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'हे पूज्य राजन् ! मैं आकाशकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला- ] 'यह निश्चय ही बहुलसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है जिसकी कि तुम उपासना करते हो । इसीसे तुम प्रजा और धनके कारण बहुल हो' ॥ १ ॥
| अथ होवाच जनमित्यादि समानम् । एष वै बहुल आत्मा वैश्वानरः । बहुलत्वमाकाशस्य सर्वगतत्वाद्वहुलगुणोपासनाच्च । त्वं बहुलोऽसि प्रजया च पुत्रपौत्रादिलक्षणया धनेन च हिरण्यादिना ॥ १ ॥ | 'फिर उसने जनसे कहा' इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है। यह निश्चय ही बहुलसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है । सर्वगत होनेके कारण तथा बहुल-गुणरूपसे उपासित होनेके कारण आकाशका बहुलत्व ( पूर्णत्व ) है । इसीसे तुम पुत्र पौत्रादिरूप प्रजा और सुवर्णादि धनसे बहुल ( परिपूर्ण ) हो ॥ १ ॥ |
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अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर-