छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 559, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंषोडश खण्ड
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अश्वपति और बुडिलका संवाद
अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वꣳ रयिमान्पुष्टिमानसि ॥ १ ॥
फिर उसने अश्वतराश्वके पुत्र बुडिलसे कहा—'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'हे पूज्य राजन् ! मैं तो जलकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला—] 'जिसकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही रयिसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है; इसीसे तुम रयिमान् (धनवान्) और पुष्टिमान् हो' ॥ १ ॥
| अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विमित्यादि समानम् । एष वै रयिरात्मा वैश्वानरो धनरूपः, अद्भ्योऽन्नं ततो धनमिति । तस्माद्रयिमान् धनवांस्त्वं पुष्टिमांश्च शरीरेण, पुष्टेश्चान्ननिमित्तत्वात् ॥ १ ॥ | 'तदनन्तर राजाने अश्वतराश्वके पुत्र बुडिलसे कहा'—इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है। यह निश्चय ही धनरूप रयिसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है; क्योंकि जलसे अन्न होता है और अन्नसे धन। इसीसे तुम रयिमान् यानी धनवान् हो तथा शरीरसे पुष्टिमान् हो, क्योंकि पुष्टि अन्नके कारण हुआ करती है ॥ १ ॥ |
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अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर-