BharatKosha
Back to the archive

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

३६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 372Permalink
३६८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४
वान्यदिमा गा यच्चान्यद्धनं तत्साध्विति वाक्यशेषः। शूद्रेति पूर्वोक्तानुकृतिमात्रं न तु कारणान्तरापेक्षया पूर्ववत्। अनेनैव मुखेन विद्याग्रहणतीर्थेनालापयिष्यथा आलापयसीति मां भाषयसीत्यर्थः।अन्य धन लाया है; यह ठीक ही है,—ऐसा वाक्यशेष है। यहाँ जो 'शूद्र' ऐसा सम्बोधन है यह पूर्वोक्तका अनुकरणमात्र ही है, पूर्ववत किसी अन्य कारणकी अपेक्षासे नहीं है। इस मुख यानी विद्याग्रहणके द्वारसे ही तू मुझसे आलाप अर्थात् सम्भाषण कराता है।
ते हैते ग्रामा रैक्वपर्णा नाम विख्याता महावृषेषु देशेषु यत्र येषुग्रामेषूवासोषितावान्रैक्वः, तानस्मै ग्रामानदादस्मै रैक्वाय राजा। तस्मै राज्ञे धनं दत्तवते ह किलोवाच विद्यां स रैक्वः॥४-२-५॥वे ये रैक्वपर्ण नामसे प्रसिद्ध ग्राम महावृष देशमें हैं, जिन ग्रामोंमें कि रैक्व रहा करता था, वे ग्राम राजाने इस रैक्वको दे दिये। इस प्रकार धन देनेवाले उस राजाको रैक्वने विद्याका उपदेश किया॥४-५॥
<div align="center">

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥२॥

</div>
Page 373Permalink

तृतीय खण्ड

—: ० :—

रैकद्वारा संवर्गविद्याका उपदेश

वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥

वायु ही संवर्ग है। जब अग्नि बुझता है तो वायुमें ही लीन होता है, जब सूर्य अस्त होता है तो वायुमें ही लीन होता है और जब चन्द्रमा अस्त होता है तो वायुमें ही लीन हो जाता है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
वायुर्वाव संवर्गो वायुर्वाह्यो वावेत्यवधारणार्थः । संवर्गः संवर्जनात्संग्रहणात्संग्रसनाद्वा संवर्गः । वक्ष्यमाणा अग्नयाद्या देवता आत्मभावमापादयतीत्यतः संवर्गः । संवर्जनाख्यो गुणो ध्येयो वायुवत, कृतायान्तर्भावदृष्टान्तात् । कथं संवर्गत्वं वायोः ? इत्याह—यदा यस्मिन्काले वा अग्निरुद्वायत्युद्वासनं प्राप्नो-वायु ही संवर्ग है। यहाँ 'वायु' शब्दसे बाह्यवायु अभिप्रेत है। 'वाव' यह निपात निश्चयार्थक है। संवर्जन—संग्रहण अथवा संग्रसन करनेके कारण वह संवर्ग है। आगे कहे जानेवाले अग्नि आदि देवताओंको वायु अपने स्वरूपमें मिला लेता है इसलिये वह संवर्ग है। कृतनामक पासेमें जैसे अन्य पासोंका अन्तर्भाव हो जाता है उसी दृष्टान्तके अनुसार वायुके समान संवर्जनसंज्ञक गुणका चिन्तन करना चाहिये। वायुकी संवर्गता किस प्रकार है ? इस विषयमें श्रुति कहती है—जब अर्थात् जिस समय अग्नि उद्वासनको प्राप्त होता है अर्थात्

३७० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

Page 374Permalink

३७० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


त्युपशाम्यति तदासावग्निर्वायुमेवाप्येति वायुस्वाभाव्यमपिगच्छति । तथा यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति । यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ।<br><br>ननु कथं सूर्याचन्द्रमसोः स्वरूपावस्थितयोर्वायावपिगमनम् ?<br><br>नैष दोषः; अस्तमनेऽदर्शनप्राप्तेर्वायुनिमित्तत्वात्, वायुना ह्यस्तं नीयते सूर्यः; चलनस्य वायुकार्यत्वात् । अथवा प्रलये सूर्याचन्द्रमसोः स्वरूपभ्रंशे तेजोरूपयोर्वायावेवापिगमनं स्यात् ॥ १ ॥शान्त हो जाता है उस समय यह अग्नि वायुमें ही लीन हो जाता है अर्थात् वायुके स्वभावको प्राप्त हो जाता है । तथा जिस समय सूर्य अस्त होता है वह भी वायुमें ही लीन हो जाता है और जब चन्द्रमा अस्त होता है वह भी वायुमें ही लीन हो जाता है ।<br><br>शङ्का—अपने स्वरूपमें स्थित सूर्य और चन्द्रमाका वायुमें किस प्रकार लय हो सकता है ?<br><br>समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि इनका अस्त होनेपर अदर्शनको प्राप्त होना वायुके कारण होता है । सूर्य वायुके ही द्वारा अस्तको प्राप्त कराया जाता है, क्योंकि गति वायुका ही कार्य है अथवा प्रलयकालमें तेजोरूप सूर्य और चन्द्रमाके स्वरूपका नाश होनेपर भी उनका वायुमें ही लय हो सकता है ॥ १ ॥

— : ० : —

| तथा— | । तथा— |

यदाप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्ह्यैवैतान् सर्वान्संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥

Page 375Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७१


जिस समय जल सूखता है वह वायुमें ही लीन हो जाता है । वायु ही इन सब जलोंको अपनेमें लीन कर लेता है । यह अधिदैवत दृष्टि है ॥ २ ॥

यदाप उच्छुष्यन्त्युच्छोष-<br>माप्नुवन्ति तदा वायुमेवापिय-<br>न्ति । वायुर्हि यस्माद्वैतान-<br>ग्न्याद्यान्महाबलान्संवृङ्क्ते, अतो<br>वायुः संवर्गगुण उपास्य इत्यर्थः<br>इत्यधिदैवतं देवतासु संवर्गदर्श-<br>नमुक्तम् ॥ २ ॥जब जल सूखता है—शोषणको प्राप्त होता है उस समय वह भी वायुमें ही लीन हो जाता है । क्योंकि वायु ही इन अग्नि आदि महाबलवान् तत्त्वोंको अपनेमें लीन कर लेता है, इसलिये वायुकी संवर्ग गुणरूपसे उपासना करनी चाहिये—यह इसका तात्पर्य है । इस प्रकार यह अधिदैवत—देवताओंमें संवर्ग-दृष्टि कही गयी ॥ २ ॥

अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणꣳश्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥

अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—प्राण ही संवर्ग है । जिस समय वह पुरुष सोता है, प्राणको ही वाक इन्द्रिय प्राप्त हो जाती है; प्राणको ही चक्षु, प्राणको ही श्रोत्र और प्राणको ही मन प्राप्त हो जाता है, प्राण ही इन सबको अपनेमें लीन कर लेता है ॥ ३ ॥

अथानन्तरमध्यात्ममात्मनि<br>संवर्गदर्शनमिदमुच्यते — प्राणो<br>मुख्यो वाव संवर्गः । स पुरुषो<br>यदा यस्मिन्काले स्वपिति प्राण-अब आगे यह अध्यात्म अर्थात् शरीरमें संवर्गदर्शन कहा जाता है । मुख्य प्राण ही संवर्ग है । यह पुरुष जिस समय सोता है उस समय प्राणको ही वाक् इन्द्रिय प्राप्त हो

३७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 376Permalink

३७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४


मेव वागप्येति वायुमिवाग्निः । प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो हि यस्मादेवैतान्वागादीन्सर्वान्संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥जाती है, जिस प्रकार कि अग्नि वायुको । तथा प्राणको ही चक्षु, प्राणको ही श्रोत्र और प्राणको ही मन प्राप्त हो जाता है; क्योंकि प्राण ही इन वाक् आदि सबको अपनेमें लीन कर लेता है ॥ ३ ॥

—: ० :—

तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥ ४ ॥

वे ये दो ही संवर्ग हैं--देवताओंमें वायु और इन्द्रियोंमें प्राण ॥४॥

तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ संवर्जनगुणौ वायुरेव देवेषु संवर्गः प्राणः प्राणेषु वागादिषु मुख्यः ॥ ४ ॥वे ये दो ही संवर्ग—संवर्जन गुणवाले हैं—देवताओंमें वायु ही संवर्ग है तथा वाक् आदि प्राणोंमें (इन्द्रियोंमें) मुख्य प्राण ॥ ४ ॥

—: ० :—

संवर्गकी स्तुतिके लिये आख्यायिका

अथैतयोः स्तुत्यर्थमियमाख्यायिकारभ्यते—अब इन (वायु और प्राण) की स्तुतिके लिये आख्यायिका आरम्भ की जाती है—

अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः ॥ ५ ॥

एक बार कपिगोत्रज शौनक और कक्षसेनके पुत्र अभिप्रतारीसे, जब कि उन्हें भोजन परोसा जा रहा था एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी; किंतु उन्होंने उसे भिक्षा न दी ॥ ५ ॥

Page 377Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७३


| हेत्यैतिह्यार्थः, शौनकं च शुनकस्यापत्यं शौनक कापेयं कपिगोत्रमभिप्रतारिणं च नामतः कक्षसेनस्यापत्यं काक्षसेनिं भोजनायोपविष्टौ परिविष्यमाणौ सूपकारैर्ब्रह्मचारी ब्रह्मविच्छौण्डो बिभिक्षे भिक्षितवान् । ब्रह्मचारिणो ब्रह्मविन्मानितां बुद्ध्वा तं जिज्ञासमानौ तस्मा उ भिक्षां न ददतुर्न दत्तवन्तौ ह किमयं वक्ष्यतीति ॥ ५ ॥ | ‘ह’ यह निपात ऐतिह्य (परम्परागत कथानक) का द्योतक है । शौनक-शुनकका पुत्र शौनक जो कि कापेय—कपिके गोत्रमें उत्पन्न हुआ था, उससे और कक्षसेनका पुत्र काक्षसेनि, जो नामसे अभिप्रतारी था, उससे, जब कि वे दोनों भोजनके लिये बैठे थे और रसोइयोंद्वारा इन्हें भोजन परोसा जा रहा था; अपनेको ब्रह्मवेत्ताओं में शूरवीर समझनेवाले एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी। ब्रह्मचारीके ‘मैं ब्रह्मवेत्ता हूँ’ ऐसे अभिमानको जानकर यह जाननेकी इच्छासे कि ‘देखें यह क्या कहता है ?’ उन्होंने भिक्षा न दी ॥ ५ ॥ |

— : ० : —

स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन्बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥ ६ ॥

उसने कहा—भुवनोंके रक्षक उस एक देव प्रजापतिने चार महात्माओंको ग्रस लिया है । हे कापेय ! हे अभिप्रतारिन् ! मनुष्य अनेक प्रकारसे निवास करते हुए उस एक देवको नहीं देखते; तथा जिसके लिये यह अन्न है उसे ही नहीं दिया गया ॥ ६ ॥

| स होवाच ब्रह्मचारी महात्मनश्चतुर इति द्वितीयाबहुवचनम् । | उस ब्रह्मचारीने कहा—‘महात्मनः और ‘चतुरः’ ये पद द्वितीया विभक्तिके बहुवचन हैं । उस एक ही देव |

३७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 378Permalink
३७४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| देव एकोऽग्न्यादीन्वायुर्वागादीन् प्राणः, कः स प्रजापतिर्जगार ग्रसितवान् कः स जगारेति प्रश्नमेके । भुवनस्य भवन्त्यस्मिन् भूतानीति भुवनं भूरादिः सर्वो लोकस्तस्य गोपा गोपायिता रक्षिता गोप्तेत्यर्थः । तं कं प्रजापतिं हे कापेय नाभि- पश्यन्ति न जानन्ति मर्त्या मरणधर्माणोऽविवेकिनो वा हेऽभिप्रतारिन्बहुधाध्यात्ममाधिदैवताधिभूतप्रकारैर्वसन्तम् । यस्मै वा एतदहन्यहन्यन्नमदनायाह्रियते संस्क्रियते च तस्मै प्रजापतय एतदन्नं न दत्तमिति ॥ ६ ॥ | क—प्रजापतिने अर्थात् वायुने अग्नि आदिको और प्राणने वागादिको ग्रस लिया है । किन्हीं-किन्हींका मत है कि जिसने ग्रसा है वह एक देव कौन है ? इस प्रकार यह प्रश्न है । वह भुवनका—जिसमें भूत ( प्राणी ) आदि होते हैं उस भूर्लोक आदि समस्त लोकोंको भुवन कहते हैं, उसका गोपा—गोपायिता अर्थात् रक्षा करनेवाला है । हे कापेय ! उस क अर्थात् प्रजापतिको अथवा हे अभिप्रतारिन् ! अनेक प्रकारसे यानी अध्यात्म, अधिदैवत और अधिभूत-भेदसे वास करते हुए उस देवको मर्त्य—मरणधर्मा अथवा अविवेकी पुरुष नहीं देखते । तथा जिसके भक्षणके लिये नित्यप्रति इस अन्नका आहरण-संस्कार किया जाता है उस प्रजापतिको ही यह अन्न नहीं दिया गया ॥ ६ ॥ |

—: ० :—

तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायात्मा देवानां जनिता प्रजानाँ१हिरण्यदंष्ट्रो बभसोऽनसूरिर्महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदनन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥७॥

उस वाक्यका कपिगोत्रोत्पन्न शौनक ने मनन किया और फिर उस [ ब्रह्मचारी ] के पास आकर कहा—'जो देवताओंका आत्मा, प्रजाओंका

Page 379Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७५


उत्पत्तिकर्ता, हिरण्यदंष्ट्र, भक्षणशील और मेधावी है, जिसकी बड़ी महिमा कही गयी है, जो स्वयं दूसरोंसे न खाया जानेवाला और जो वस्तुतः अन्न नहीं है उनको भी भक्षण कर जाता है, हे ब्रह्मचारिन् ! उसीकी हम उपासना करते हैं । [ ऐसा कहकर उसने सेवकोंको आज्ञा दी कि ] 'इस ब्रह्मचारीको भिक्षा दो' ॥ ७ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तदु ह—ब्रह्मचारिणो वचनं शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानो मनसालोचयन्ब्रह्मचारिणं प्रत्ये-यायाजगाम । गत्वा चाह यं त्वमवोचो न पश्यन्ति मर्त्या इति तं वयं पश्यामः; कथम् ? आत्मा सर्वस्य स्थावरजङ्गमस्य, किञ्च देवानामग्न्यादीनामात्मनि संहृत्य ग्रसित्वा पुनजनितोत्पाद-यिता वायुरूपेणाधिदैवतमग्न्या-दीनाम् । अध्यात्मं च प्राण-रूपेण वागादीनां प्रजानां च जनिता ।कपिगोत्रोत्पन्न शौनक ब्रह्मचारी-के उस वचनकी मनसे आलोचना कर ब्रह्मचारीके समीप गया तथा जाकर इस प्रकार बोला—जिसके विषयमें तुमने कहा कि मर्त्यगण उसे नहीं देखते उसे हम देखते हैं । किस प्रकार देखते हैं ? वह सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गमका आत्मा तथा अग्नि आदि देवताओंका उत्पत्तिकर्ता अर्थात् अधिदैवत वायुरूपसे अपनेमें लीन कर अग्नि आदिका पुनः उत्पन्न करनेवाला और अध्यात्म प्राणरूपसे वागादि प्रजाओंकी उत्पत्ति करने-वाला है ।
अथवात्मा देवानामग्निवागा-दीनां जनिता प्रजानां स्थावर-जङ्गमानाम् । हिरण्यदंष्ट्रोऽमृतदंष्ट्रो-ऽभग्नदंष्ट्र इति यावत् । बभसो भक्षणशीलः । अनसूरिः सूरिर्मे-अथवा यों समझो कि अग्नि और वाक् आदि देवोंका आत्मा और स्थावर-जङ्गम प्रजाओंका उत्पत्तिकर्ता है । हिरण्यदंष्ट्र—अमृतदंष्ट्र अर्थात् जिसकी डाढ़ें कभी नहीं टूटतीं, 'बभसः'—भक्षणशील, 'अनसूरिः'—सूरि मेधावीको कहते हैं, जो सूरि न

३७६] छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४

Page 380Permalink

३७६] छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४


| धावी न सूरिरसूरिस्तत्प्रतिषेधोऽनसूरिः सूरिरेवेत्यर्थः । महान्तमतिप्रमाणमप्रमेयस्य प्रजापतेर्महिमानं विभूतिमाहुर्ब्रह्मविदः ।<br><br>यस्मात्स्वयमन्यैरनद्यमानोऽभक्ष्यमाणो यदनन्नमग्निवागादिदेवतारूपमत्ति भक्षयतीति । वा इति निरर्थकः । वयं हे ब्रह्मचारिन् आ इदमेवं यथोक्तलक्षणं ब्रह्म वयमा उपास्महे । वयमिति व्यवहितेन सम्बन्धः। अन्ये न वयमिदमुपास्महे, किं तर्हि ? परमेव ब्रह्मोपास्महे इति वर्णयन्ति । दत्तास्मै भिक्षामित्यवोचद् भृत्यान् ॥ ७ ॥ | हो वह 'असूरि' कहलाता है उसका भी प्रतिषेध 'अनसूरि' है अर्थात् वह सूरि (मेधावी) ही है। ब्रह्मवेत्ता-लोग इस प्रजापतिकी महती—अति प्रमाणवाली अर्थात् अप्रमेय महिमा विभूति बतलाते हैं; क्योंकि यह स्वयं दूसरोंसे अभक्ष्यमाण—न खाया जानेवाला और जो अग्नि आदि देवता-रूप अनन्न (दूसरोंका अन्न नहीं) है उसका अदन—भक्षण करता है। 'वै' यह अव्यय निरर्थक है। हे ब्रह्मचारिन् ! हम इस उपर्युक्त लक्षणोंवाले ब्रह्मकी ही उपासना करते हैं। 'उपास्महे' इस क्रियाका व्यवधानयुक्त 'वयम्' इस कर्तासे सम्बन्ध है। कोई-कोई ['ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे' इसका 'ब्रह्मचारिन् न इदम् उपास्महे' ऐसा पदच्छेद कर] हम इस ब्रह्मकी उपासना नहीं करते; तो किसकी करते हैं ? परब्रह्मकी ही उपासना करते हैं—ऐसी व्याख्या करते हैं। फिर उसने सेवकोंसे कहा कि 'इसे भिक्षा दो' ॥७॥ |


तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात्सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृतꣳसैषा

Page 381Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०७


विराडन्नादि तयेदꣳसर्वं दृष्टꣳसर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥

तब उन्होंने उसे भिक्षा दे दी। वे ये [अग्न्यादि और वायु] पाँच [वागादिसे] अन्य हैं तथा इनसे [वागादि और प्राण] ये पाँच अन्य हैं इस प्रकार ये सब दश होते हैं। ये दश कृत (कृतनामक पासेसे उपलक्षित द्यूत) हैं। अतः सम्पूर्ण दिशाओंमें ये अन्न ही दश कृत हैं। यह विराट् ही अन्नादी (अन्न भक्षण करनेवाला) है। उसके द्वारा यह सब देखा जाता है। जो ऐसा जानता है उसके द्वारा यह सब देख लिया जाता है और वह अन्न भक्षण करनेवाला होता है ॥ ८ ॥

| तस्मा उ ह ददुस्ते हि भिक्षाम्। ते वै ये ग्रस्यन्तेऽग्न्यादयो यश्च तेषां ग्रसिता वायुः पञ्चान्ये वागादिभ्यः तथान्ये तेभ्यः पञ्चाध्यात्मं वागादयः प्राणश्च, ते सर्वे दश भवन्ति संख्यया, दश सन्तस्तत्कृतं भवति ते। चतुरङ्क एकाय एवं चत्वारस्त्र्यङ्काय एवं त्रयोऽपरे द्व्यङ्काय | तब उन्होंने उसे भिक्षा दे दी। वे ये अग्नि आदि, जो कि भक्षण किये जाते हैं और जो उन्हें भक्षण करनेवाला वायु है—ये पाँचों वागादिसे अन्य हैं तथा उनसे वागादि और प्राण—ये पाँच अध्यात्म अन्य हैं। ये सब संख्यामें दश होते हैं और दश होनेके कारण ये कृत हैं। उनमें एक पासा चार अङ्कोंवाला होता है; उसी प्रकार [अग्नि आदि और वागादि--ये] चार हैं। जिस प्रकार तीन अङ्कोंवाला पासा होता है उसी प्रकार [अग्न्यादि और वागादिमेंसे एक-एकको छोड़कर] शेष अन्न है। जिस प्रकार दो अङ्कोंवाला पासा होता है उसी प्रकार [दो-दोको छोड़कर] अन्य |

३७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

Page 382Permalink

३७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एवं द्वावन्यावेकाङ्काय एवमेकोऽन्य इति । एवं दश सन्तस्तत्कृतं भवति ।अन्न हैं तथा जिस प्रकार एक अङ्कवाला पासा होता है उसी प्रकार इनसे भिन्न [ वायु और प्राण --ये अन्नादी ] हैं । इस प्रकार [ ४, ३, २, १ ] ये सब मिलकर दश होनेके कारण ही कृत हैं।
यत एवम्, तस्मात्सर्वासु दिक्षु दशस्वप्यग्न्याद्या वागाद्याश्च दशसंख्यासामान्यादन्नमेव । "दशाक्षरा विराट्" "विराडन्नम्" इति हि श्रुतिः । अतोऽन्नमेव दशसंख्यत्वात् । तत एव दश कृतं कृतेऽन्तर्भावाच्चतुरङ्कत्वेनेत्यवोचाम । सैषा विराड् दशसंख्या सत्यन्नं चान्नादी-अन्नादिनी च कृतत्वेन । कृते हि दशसंख्यान्तर्भूतातोऽन्नमन्नादिनी च सा ।क्योंकि ऐसा है, इसलिये सम्पूर्ण यानी दशों दिशाओंमें अग्न्यादि और वागादि—ये दश संख्यामें समान होनेके कारण अन्न ही हैं । "विराट् दश अक्षरोंवाला है" "विराट् अन्न है" ऐसी श्रुति भी है । अतः दश संख्यावाले होनेके कारण ये [ अग्न्यादि और वागादि ] अन्न ही हैं । इसीलिये ये दश कृत ही हैं, क्योंकि चार अङ्कवाला होनेसे कृतनामक पासेमें सब पासोंका अन्तर्भाव हो जाता है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं । वह यह विराट् देवता दश संख्यावाली होती हुई अन्न और अन्नादी—अन्नादिनी अर्थात अन्न भक्षण करनेवाली है, क्योंकि वह कृतरूपा है । कृतमें दश संख्याका अन्तर्भाव है, इसलिये यह अन्न और अन्नादिनी है ।
Page 383Permalink

खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ३७९


| तथा विद्वान्दशदेवतात्मभूतः संवर्गविद्यायाः सन्विराट्त्वेन दशसर्वोपलब्धि-संख्यान्नं कृतफलत्वम् संख्ययान्नादी च । तथात्रान्नादित्येदं सर्वं जगद्दशदिक्संस्थं दृष्टं कृतसंख्याभूतयोपलब्धम् । एवंविदोऽस्य सर्वं कृतसंख्याभूतस्य दशदिक्संबद्धं दृष्टमुपलब्धं भवति । किञ्चान्नादश्च भवति य एवं वेद यथोक्तदर्शी । द्विरभ्यास उपासनसमाप्त्यर्थः ॥ ८ ॥ | इस प्रकार जाननेवाला उपासक दश देवताओंसे तादात्म्य प्राप्त कर दश संख्याके कारण विराट्रूपसे अन्न और कृतरूपसे अन्नादी हो जाता है । इस प्रकार कृतसंख्याभूत उस अन्न और अन्नादिनीद्वारा दशों दिशाओंसे सम्बद्ध यह सारा जगत् दृष्ट अर्थात् उपलब्ध कर लिया गया है । इस प्रकार जाननेवाले कृतसंख्याभूत इस विद्वान्‌को दशों दिशाओंसे सम्बद्ध सब कुछ दृष्ट यानी उपलब्ध हो जाता है । तथा पूर्वोक्तदृष्टिवाला जो उपासक इस प्रकार जानता है वह अन्नाद [दीप्ताग्नि] भी होता है । 'य एवं वेद य एवं वेद' यह द्विरुक्ति उपासनाकी समाप्तिके लिये है ॥ ८ ॥ |

<div align="center">

—: ० :—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥

</div>
Page 384Permalink

चतुर्थ खण्ड

--: ० :--

सत्यकामका ब्रह्मचर्य-पालन और वनमें जाकर गो चराना

| सर्वं वागाद्यग्न्यादि चान्नान्नादत्वसंस्तुतं जगदेकीकृत्य षोडशधा प्रविभज्य तस्मिन्ब्रह्मदृष्टिर्विधातव्येत्यारभ्यते। श्रद्धा-तपसोर्ब्रह्मोपासनाङ्गत्वप्रदर्शनायाख्यायिका। | अन्न और अन्नादरूपसे भली प्रकार स्तुत हुए वागादि और अग्न्यादिरूप सम्पूर्ण जगत्को कारणरूपसे एक कर फिर उसके सोलह-विभाग कर उसमें ब्रह्मदृष्टिका विधान करना है; इसीके लिये अब आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है वह श्रद्धा और तपका ब्रह्मोपासनाका अङ्गत्व प्रदर्शित करनेके लिये है। |

सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयाञ्चक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किंगोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १ ॥

जबालाके पुत्र सत्यकामने अपनी माता जबालाको सम्बोधित करके निवेदन किया—'हे पूज्ये ! मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक [ गुरुकुलमें ] निवास करना चाहता हूँ; [ बता ] मैं किस गोत्रवाला हूँ ?' ॥ १ ॥

| सत्यकामो ह नामतः, हशब्द ऐतिह्यार्थः, जबालाया अपत्यं जाबालो जबालां स्वां मातरमामन्त्रयाञ्चक्र आमन्त्रितवान् । ब्रह्मचर्यं स्वाध्यायग्रहणाय हे भवति विवत्स्याम्याचार्यकुले | 'ह' शब्द इतिहासका द्योतक है। जबालाके पुत्रने, जो नामसे सत्यकाम था, अपनी माता जबालाको आमन्त्रित—सम्बोधित [ करके निवेदन] किया—'हे पूजनीये ! मैं स्वाध्यायग्रहणके लिये ब्रह्मचर्यपूर्वक आचार्यकुलमें निवास करूँगा। |

Page 385Permalink

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८१

किंगोत्रोऽहं किमस्य मम गोत्रं सोऽहं किंगोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १।मैं किंगोत्र हूँ ? मेरा क्या गोत्र है ? अर्थात् मैं किस गोत्रवाला हूँ ?' ॥ १॥

— : ० : —

एवं पृष्टा—इस प्रकार पूछी जानेपर—

सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति ॥ २॥

उसने उससे कहा—'हे तात ! तू जिस गोत्रवाला है उसे मैं नहीं जानती । पहले मैं पतिके घर आये हुए बहुत-से अतिथियोंकी सेवा-टहल करनेवाली परिचारिका थी । [परिचर्यामें संलग्न होनेसे गोत्र आदिकी ओर मेरा ध्यान नहीं था ] उन्हीं दिनों युवावस्था में जब मैंने तुझे प्राप्त किया [ तुम्हारे पिता परलोकवासी हो गये, अतः उनसे भी पूछ न सकी ] इसलिये मैं यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मैं तो जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है । अतः तू अपनेको 'सत्यकाम जाबाल' बतला देना' ॥ २ ॥

जबाला सा हैन पुत्रमुवाच— नाहमेतत्तव गोत्रं वेद, हे तात यद्गोत्रस्त्वमसि । कस्मान्न वेत्सि ? इत्युक्ताह-बहु भर्तृगृहे परिचर्याजातमतिथ्यभ्यागतादि चरन्त्यहं परिचारिणी. परिचरन्तीति परिचरणशीलैवाहम्, परिचरणचित्ततया गोत्रादिस्मरणे मम मनोउस जबालाने अपने उस पुत्रसे कहा—'हे तात ! जिस गोत्रवाला तू है मैं इस तेरे गोत्रको नहीं जानती।' क्यों नहीं जानती ?--इस प्रकार कही जानेपर वह बोली—पतिके घरमें अतिथि और अभ्यागतादिकोंकी बहुत टहल करनेवाली मैं परिचारिणी—परिचर्या करनेवाली अर्थात् शुश्रूषापरायण थी । इस प्रकार परिचर्यामें चित्त लगा रहनेके कारण गोत्रादिको याद रखनेमें मेरा

३८२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

Page 386Permalink

३८२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


| नाभूत् । यौवने च तत्काले त्वामलभे लब्धवत्यस्मि । तदैव ते पितोपरतः । अतोऽनाथां साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि । जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स त्वं सत्यकाम एवाहं जाबालोऽस्मीत्याचार्याय ब्रूवीथाः, यद्याचार्येण पृष्ट इत्यभिप्रायः ॥ २ ॥ | मन नहीं था । तथा उस समय युवावस्थामें ही मैंने तुझे प्राप्त किया था । उसी समय तेरे पिताका देहान्त हो गया । इसलिये मैं अनाथा हो गयी और इसीसे मुझे इसका कुछ पता नहीं कि तू किस गोत्रवाला है । मैं तो जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है; अतः तात्पर्य यह है कि यदि आचार्य तुझसे पूछें तो तू यही कह देना कि 'मैं सत्यकाम जाबाल हूँ' ॥२॥ |

स ह हारिद्रुमतं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्यं भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ॥ ३ ॥

उसने हारिद्रुमत गौतमके पास जाकर कहा—'मैं पूज्य श्रीमान्‌के यहाँ ब्रह्मचर्यपूर्वक वास करूँगा; इसीसे आपकी सन्निधिमें आया हूँ' ॥ ३ ॥

| स ह सत्यकामो हारिद्रुमतं हरिद्रुमतोऽपत्यं हारिद्रुमतं गौतमं गोत्रत एत्य गत्वोवाच ब्रह्मचर्यं भगवति पूजावति त्वयि वत्स्याम्यत्र उपेयामुपगच्छेयं शिष्यतया भगवन्तम् ॥ ३ ॥ | उस सत्यकामने, जो गोत्रतः गौतम थे, उन हारिद्रुमत-हरिद्रुमान्‌के पुत्रके पास जाकर कहा—'आप भगवान्--पूज्यवरके यहाँ मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक वास करूँगा; इसीसे मैं आपकी सन्निधिमें उपसत्ति--शिष्यभावसे गमन करता हूँ' ॥ ३ ॥ |


| इत्युक्तवन्तम्— | इस प्रकार कहनेवाले— |

तँहोवाच किंगोत्रो नु सोम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्म्यपृच्छं मातरँसा मा प्रत्यब्रवीद्बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे

Page 387Permalink

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८१


साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोऽहꣳसत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥ ४ ॥

उससे [गौतमने] कहा—'हे सोम्य ! तू किस गोत्रवाला है ?' उसने कहा—'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ उसे नहीं जानता । मैंने मातासे पूछा था । उसने मुझे यह उत्तर दिया कि 'पहले मैं पतिके घर आये हुए बहुतसे अतिथियोंकी सेवा-टहल करनेवाली परिचारिका थी [ परिचर्यामें संलग्न होनेसे ही गोत्र आदिकी ओर मेरा ध्यान नहीं रहा ] । उन्हीं दिनों युवावस्थामें जब मैंने तुझे प्राप्त किया [ तुम्हारे पिता परलोकवासी हो गये, अतः उनसे भी न पूछ सकी], इसलिये मैं यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मैं जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है ।' अतः हे गुरो ! मैं सत्यकाम जाबाल हूँ ॥ ४ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तं होवाच गौतमः—किंगोत्रो नु सोम्यासि ? इति, विज्ञातकुलगोत्रः शिष्य उपनेतव्यः, इति पृष्टः प्रत्याह सत्यकामः । स होवाच नाहमेतद्वेद भोः, यद्गोत्रोऽहमस्मि, किं त्वपृच्छं पृष्टवानस्मि, मातरम्; सा मया पृष्टा मां प्रत्यब्रवीन्माता—बह्वहं चरन्तीत्यादि पूर्ववत् । तस्या अहं वचः स्मरामि, सोऽहं सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥४॥उससे गौतमने कहा---'हे सोम्य ! तू किस गोत्रवाला है ? क्योंकि जिसके कुल और गोत्रका पता हो उसी शिष्यका उपनयन करना चाहिये ।' इस प्रकार पूछे जानेपर सत्यकामने उत्तर दिया । वह बोला—'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ, उसे नहीं जानता किंतु मैंने मातासे पूछा था, मेरेद्वारा पूछे जानेपर माताने मुझे यही उत्तर दिया कि 'मैं बहुत-से अतिथियोंकी सेवा-टहल करनेवाली' इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । मुझे उसके वे वचन याद हैं; अतः हे गुरो ! मैं सत्यकाम जाबाल हूँ' ॥ ४ ॥

३८४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

Page 388Permalink

३८४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


तं होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधꣳ सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशता गा निराकृत्योवाचेमाःसोम block-ान्वनुसंव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणावर्तेयेति स ह वर्षगणं प्रोवास ता यदा सहस्रꣳ संपदुः ॥५॥

उससे गौतमने कहा—'ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर नहीं कर सकता। अतः हे सोम्य ! तू समिधा ले आ, मैं तेरा उपनयन कर दूँगा; क्योंकि तूने सत्यका त्याग नहीं किया।' तब उसका उपनयन कर चार सौ कृश और दुर्बल गौएँ अलग निकालकर उससे कहा—'सोम्य ! तू इन गौओंके पीछे जा।' उन्हें ले जाते समय उसने कहा—'इनकी एक सहस्र गायें हुए बिना मैं नहीं लौटूँगा' जब तक कि वे एक सहस्र हुईं वह बहुत वर्षोंतक वनमें ही रहा ॥ ५ ॥

| तं होवाच गौतमो नैतदृचोऽब्राह्मणो विशेषेण वक्तुमर्हत्यार्जवार्थसंयुक्तम्। ऋजवो हि ब्राह्मणा नेतरे स्वभावतः। यस्मान्न सत्याद्ब्राह्मणजातिधर्मादगा नापेतवानसि, अतो ब्राह्मणं त्वामुपनेष्येऽतः संस्कारार्थं होमाय समिधं सोम्याहरेत्युक्त्वा तमुपनीय कृशानामबलानां गो- | उससे गौतमने कहा—'ऐसा सरलार्थयुक्त वचन विशेषतः कोई अब्राह्मण नहीं बोल सकता, क्योंकि ब्राह्मण तो स्वभावतः ही सरल होते हैं, और लोग नहीं। क्योंकि तू ब्राह्मणजातिके धर्म सत्यसे विचलित अर्थात् भ्रष्ट नहीं हुआ, अतः मैं तुझ ब्राह्मणका उपनयन-संस्कार करूँगा। इसलिये हे सोम्य ! संस्कारार्थ होम करनेके लिये तू समिध ले आ।' ऐसा कह उसका उपनयन करनेके अनन्तर उसने गौओंके यूथमेंसे |

Page 389Permalink
खण्ड ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ
संस्कृत-भाष्यभाष्यार्थ
यूथान्निराकृत्यापकृष्य चतुः-शता चत्वारि शतानि गवा-मुवाचेमा गाः सोम्यानुसंव्रजा-नुगच्छ ।<br><br>इत्युक्तस्ता अरण्यं प्रत्यभि-प्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणा-पूर्णेन सहस्रेण नावर्तेय न प्रत्यागच्छेयम् । स एवमुक्त्वा गा अरण्यं तृणोदकबहुलं द्वन्द्व-रहितं प्रवेश्य स ह वर्षगणं दीर्घं प्रोवास प्रोषितवान् । ताः सम्यग्गावो रक्षिता यदा यस्मि-न्काले सहस्रं संपेदुः संपन्ना बभूवुः ॥ ५ ॥चार सौ कृश और निर्बल गौएँ अलग निकालकर उससे कहा—'हे सोम्य ! तू इन गौओंका अनुगमन कर—इनके पीछे-पीछे जा ।'<br><br>इस प्रकार कहे जानेपर उन्हें वनकी ओर हाँकते हुए सत्यकामने कहा—'बिना एक सहस्र हुए अर्थात् इनकी एक सहस्र संख्या पूरी हुए बिना मैं नहीं लौटूंगा ।' ऐसा कह वह उन गौओंको एक वनमें, जिसमें कि तृण और जलकी अधिकता थी तथा जो सर्वथा द्वन्द्व-रहित था, ले गया और वर्षोंतक—बहुत कालपर्यन्त, जबतक कि सम्यक् प्रकारसे रक्षा की हुई वे गौएँ एक सहस्र हुईं, वहीं रहा ॥ ५ ॥
<div align="center">

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥

</div>
Page 390Permalink

पञ्चम खण्ड

—: o :—

वृषभद्वारा सत्यकामको ब्रह्मके प्रथम पादका उपदेश

| तमेतं श्रद्धातपोभ्यां सिद्धं वायुदेवता दिक्सम्बन्धिनी तुष्टा सत्यृषभमनुप्रविश्यर्षभभावमापन्नानुग्रहाय । | श्रद्धा और तपसे सिद्ध हुए उस इस सत्यकामसे दिक्सम्बन्धिनी वायुदेवता संतुष्ट होकर ऋषभ ( साँड ) में अनुप्रविष्ट हुई अर्थात् उसपर कृपा करनेके लिये ऋषभभावको प्राप्त हुई । |

अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रꣳ स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ॥ १ ॥

तब उससे साँडने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया । [ वह बोला— ] 'हे सोम्य ! हम एक सहस्र हो गये हैं, अब तू हमें आचार्यकुलमें पहुँचा दे' ॥ १ ॥

| अथ हैनमृषभोऽभ्युवादा- <br> भ्युक्तवान्सत्यकाम ३ इति <br> संबोध्य, तमंसौ सत्यकामो <br> भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्रति- <br> वचनं ददौ । प्राप्ताः सोम्य <br> सहस्रं स्मः, पूर्णा तव प्रतिज्ञा, <br> अतः प्रापय नोऽस्मानाचार्य- <br> कुलम् ॥ १ ॥ | तब उससे साँडने 'सत्यकाम !' <br> इस प्रकार सम्बोधन करते हुए <br> कहा । उसे सत्यकामने 'भगवन् !' <br> ऐसा कहकर प्रतिवचन—प्रत्युत्तर <br> दिया । [साँडने कहा—] 'हे सोम्य ! <br> हम एक सहस्र हो गये हैं, तेरी <br> प्रतिज्ञा पूरी हो गयी; अतः अब तू <br> हमें आचार्यकुलमें पहुँचा दे' ॥१॥ |

Page 391Permalink

खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८७


किं च—तथा—

ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवा- निति तस्मै होवाच प्राची दिक्कला प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ २ ॥

‘[ क्या ] मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?’ तब [ सत्यकामने ] कहा—‘भगवान् मुझे [ अवश्य ] बतलावें ।’ साँड उससे बोला—‘पूर्व दिक्कला, पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला, हे सोम्य ! यह ब्रह्मका ‘प्रकाशवान्’ नामक चार कलाओंवाला पाद है’ ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
अहं ब्रह्मणः परस्य ते तुभ्यं पादं ब्रवाणि कथयानि ? इत्युक्तः प्रत्युवाच—ब्रवीतु कथयतु मे मह्यं भगवान् । इत्युक्त ऋषभस्तस्मै सत्यकामाय होवाच—प्राची दिक्कला ब्रह्मणः पादस्य चतुर्थो भागः तथा प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य ब्रह्मणः पादश्चतुष्कलश्चतस्रः कला अवयवा यस्य सोऽयं चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम प्रकाशवानित्येव नामाभिधानं यस्य । तथोत्तरेऽपि पादास्त्रयश्चतुष्कला ब्रह्मणः ॥२॥‘[ क्या ] मैं तुझसे परब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ—कहूँ ?’ ऐसा कहे जानेपर सत्यकामने उत्तर दिया—‘भगवान् मुझे [ अवश्य ] बतलावें ।’ इस प्रकार कहे जानेपर साँडने उस सत्यकामसे कहा—‘पूर्व दिक्कला उस ब्रह्मके पादका चौथा भाग है । इसी प्रकार पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला है—हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कलपाद है—जिसमें चार कलाएँ अवयव हैं ऐसा यह ब्रह्मका प्रकाशवान् नामका अर्थात् ‘प्रकाशवान्’ यही जिसका नाम है [ ऐसा एक पाद है ] । इसी प्रकार ब्रह्मके आगेके तीन पाद भी चार कलाओंवाले ही हैं’ ॥ २ ॥

छा० उ० १३—