छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 389, कुल 978 में से
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| खण्ड ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| यूथान्निराकृत्यापकृष्य चतुः-शता चत्वारि शतानि गवा-मुवाचेमा गाः सोम्यानुसंव्रजा-नुगच्छ ।<br><br>इत्युक्तस्ता अरण्यं प्रत्यभि-प्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणा-पूर्णेन सहस्रेण नावर्तेय न प्रत्यागच्छेयम् । स एवमुक्त्वा गा अरण्यं तृणोदकबहुलं द्वन्द्व-रहितं प्रवेश्य स ह वर्षगणं दीर्घं प्रोवास प्रोषितवान् । ताः सम्यग्गावो रक्षिता यदा यस्मि-न्काले सहस्रं संपेदुः संपन्ना बभूवुः ॥ ५ ॥ | चार सौ कृश और निर्बल गौएँ अलग निकालकर उससे कहा—'हे सोम्य ! तू इन गौओंका अनुगमन कर—इनके पीछे-पीछे जा ।'<br><br>इस प्रकार कहे जानेपर उन्हें वनकी ओर हाँकते हुए सत्यकामने कहा—'बिना एक सहस्र हुए अर्थात् इनकी एक सहस्र संख्या पूरी हुए बिना मैं नहीं लौटूंगा ।' ऐसा कह वह उन गौओंको एक वनमें, जिसमें कि तृण और जलकी अधिकता थी तथा जो सर्वथा द्वन्द्व-रहित था, ले गया और वर्षोंतक—बहुत कालपर्यन्त, जबतक कि सम्यक् प्रकारसे रक्षा की हुई वे गौएँ एक सहस्र हुईं, वहीं रहा ॥ ५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥