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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

५२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १


| सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष यस्माद्विद्धः। उभयग्रहणमविवक्षितम्, 'यस्योभयं हविरार्तिमार्च्छति' इति यद्वत्। <br><br> "यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति" (बृ० उ० १।३।३) इति समानप्रकरणश्रुतेः॥ २ ॥ | दोनोंहीको सूँघता है, क्योंकि यह पापसे बिंधा हुआ है। जिस प्रकार "जिसकी द्रवात्मक एवं पुरोडाशात्मक दोनों हवियाँ दूषित हो जायँ (वह इन्द्र देवताके लिये पाँच सकोरोंमें भात अर्पण करे)" इसवाक्यमें 'दोनों' पद विवक्षित नहीं है; उसी प्रकार यहाँ भी 'उभय' पदका ग्रहण करना इष्ट नहीं है।* [बृहदारण्यक-श्रुतिमें भी] इसीके समान प्रकरणमें यही सुना गया है कि "जो इस प्रतिकूल गन्धको सूँघता है।" [इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'उभय' शब्दको ग्रहण करना उचित नहीं है] ॥२॥ |


अथ ह वाचमुद्गीथमुपासांचक्रिरे। ताँहासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तयोभयं वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥

फिर उन्होंने वाणीके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। किंतु असुरोंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। इसीसे लोक उसके द्वारा सत्य और मिथ्या दोनों बोलता है, क्योंकि वह पापसे बिंधी हुई है ॥ ३ ॥

अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ४ ॥


१. द्रवात्मक या पुरोडाशात्मक किसी एक प्रकारकी हवि भी यदि काक आदि के स्पर्शसे दूषित हो जाय तो उसके लिये प्रायश्चित्तकी आवश्यकता होती है, फिर उपर्युक्त वाक्यमें दोनों हवियोंके दूषित होनेपर प्रायश्चित्तकी व्यवस्था क्यों बतायी गयी। अवश्य ही वहाँ 'दोनों' (उभयम्) पद अनावश्यक या अविवक्षित है।
* क्योंकि 'पापसे विद्ध होनेके कारण लोक दुर्गन्धको ग्रहण करता है।' केवल इतना ही कहना उचित है।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३


फिर उन्होंने चक्षुके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। असुरोंने उसे भी पापसे विद्ध कर दिया। इसीसे लोक उससे देखनेयोग्य और न देखनेयोग्य दोनों प्रकारके पदार्थोंको देखता है, क्योंकि वह (चक्षु-इन्द्रिय) पापसे बिंधा हुआ है ॥ ४ ॥

अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयँ शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ५ ॥

फिर उन्होंने श्रोत्रके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। असुरोंने उसे भी पापसे बेध दिया। इसीसे लोक उससे सुननेयोग्य और न सुननेयोग्य दोनों प्रकारकी बातोंको सुनता है, क्योंकि वह (श्रोत्रेन्द्रिय) पापसे बिंधा हुआ है ॥ ५ ॥

अथ ह मन उद्गीथमुपासांचक्रिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयँ संकल्पयते संकल्पनीयं चासंकल्पनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ६ ॥

फिर उन्होंने मनके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। असुरोंने उसे भी पापसे बेध दिया। इसीसे उसके द्वारा लोक संकल्प करनेयोग्य और संकल्प न करनेयोग्य दोनोंहीका संकल्प करता है, क्योंकि वह पापसे बिंधा हुआ है ॥ ६ ॥

| मुख्यप्राणस्योपास्यत्वाय तद्विशुद्धत्वानुभवार्थोऽयं विचारः श्रुत्या प्रवर्तितः। अतश्चक्षुरादि- | मुख्य प्राणको उपास्य सिद्ध करनेके लिये उसकी विशुद्धताका अनुभव करानेके प्रयोजनसे श्रुतिने इस विचारका आरम्भ किया है। अतः चक्षु आदि |

५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

५४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| देवताः क्रमेण विचार्यासुरेण पाप्मना विद्धा इत्यपोह्यन्ते । समानमन्यत् । अथ ह वाचं चक्षुः श्रोत्रं मन इत्यादि । अनुक्ता अप्यन्यास्त्वग्रसनादिदेवता द्रष्टव्याः “एवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिः”(बृ०उ० १।३।६) इति श्रुत्यन्तरात्॥ ३–६॥ | देवता आसुर पापसे विद्ध हैं—इस प्रकार क्रमशः विचार करके उनका अपवाद किया जाता है। शेष सब भी इसीके समान हैं। इसी प्रकार उन्होंने वाक्, चक्षु, श्रोत्र और मन आदिको भी [पापसे विद्ध कर दिया] “इस प्रकार निश्चय ही ये देवता पापसे संयुक्त हैं” इस अन्य श्रुतिके अनुसार, यहाँ जिनका नाम नहीं लिया गया है, उन त्वक् एवं रसना आदि अन्य देवताओंको भी ऐसे ही पापविद्ध समझना चाहिये ॥ ३–६ ॥ |

—: ० :—

मुख्य प्राणद्वारा असुरोंका पराभव

आसुरेण विद्धत्वादघ्राणादिदेवता अपोह्य—आसुर पापसे विद्ध होनेके कारण घ्राणादि देवताओंका त्याग कर—

अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तँहासुरा ऋत्वा विदध्वंसुर्यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेत ॥ ७ ॥

फिर यह जो प्रसिद्ध मुख्य प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। उस (प्राणके) समीप पहुँचकर असुरगण इस प्रकार विध्वस्त हो गये जैसे दुर्भेद्य पाषाणके पास पहुँचकर मिट्टीका ढेला नष्ट हो जाता है ॥७॥

अथानन्तरं य एवायं प्रसिद्धो मुखे भवो मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तं हासुराः पूर्व-अथ--इसके पश्चात् जो कि यह प्रसिद्ध मुख्य—मुखमें रहनेवाला प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना की । असुरगण पूर्ववत्
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ५५

| बद्दृत्वा प्राप्य विदध्वंसुर्विनेशुः, अभिप्रायमात्रेण, अकृत्वा किंचिदपि प्राणस्य । <br> कथं विनेशुः ? इत्यत्र दृष्टान्तमाह—यथा लोकेऽश्मानमाखणं—न शक्यते खनितुं कुद्दालादिभिरपि, टङ्कैश्चच्छेत्तुं न शक्योऽखणः, अखण एव आखणस्तमृत्वा सामर्थ्याल्लोष्टः पांसुपिण्डः श्रुत्यन्तराच्चाश्मनि क्षिप्तोऽश्मभेदनाभिप्रायेण तस्याश्मनः किंचिदप्यकृत्वा स्वयं विध्वंसेत विदीर्येतैव विद्ध्वंसुरित्यर्थः । एवं विशुद्धोऽसुरैरधर्षितत्वात् प्राण इति ॥ ७ ॥ | उसे प्राप्त होते ही—प्राणका कुछ भी न बिगाड़कर केवल उसे विद्ध करनेका संकल्प करके ही विध्वस्त हो गये । <br> वे किस प्रकार नष्ट हो गये ? इसमें दृष्टान्त कहते हैं—जिस प्रकार लोकमें आखण—पाषाणको प्राप्त होकर—जिसे कुद्दालादिसे भी न खोदा जा सके तथा जो टाँकियोंसे भी छिन्न न किया जा सके उसे 'अखण' कहते हैं, 'अखण' ही 'आखण' (अभेद्य) कहा गया है उसीको प्राप्त होकर अर्थात् पाषाणकी ओर उसे फोड़नेके अभिप्रायसे फेंका हुआ लोष्ट-पांसुपिण्ड यानी मिट्टीका ढेला उस पत्थरका कुछ भी न बिगाड़ कर स्वयं नष्ट हो जाता है उसी प्रकार वे असुर भी विनष्ट हो गये । इस प्रकार असुरोंसे पराभूत न होनेके कारण मुख्य प्राण शुद्ध रहा—यह इसका तात्पर्य है । यहाँ प्रकरणके सामर्थ्यसे और दूसरी श्रुतिके अनुसार 'लोष्ट' शब्द अध्याहृत किया गया है। ७। |


प्राणोपासकका महत्त्व

एवंविदः प्राणात्मभूतस्येदं फलमाह—इस प्रकार जाननेवाले प्राणात्मभूत व्यक्तिके लिये श्रुति यह फल बतलाती है—

५६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

५६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १


एवं यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वꣳसत एवꣳहैव स विध्वꣳसते य एवंविदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माखणः ॥ ८ ॥

जिस प्रकार [ मिट्टीका ढेला ] दुर्भेद्य पाषाणको प्राप्त होकर विनष्ट हो जाता है उसी प्रकार वह व्यक्ति नाशको प्राप्त हो जाता है जो इस प्रकार जाननेवाले पुरुषके प्रति पापाचरणकी कामना करता है अथवा जो इसको कोसता या मारता है; क्योंकि यह प्राणोपासक अभेद्य पाषाण ही है॥ ८॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
यथाश्मानमिति, एष एव दृष्टान्तः; एवं हैव स विध्वंसते विनश्यति; कोऽसौ? इत्याह—य एवंविदि यथोक्तप्राणविदि पापं तदनर्हं कर्तुं कामयत इच्छति यश्चाप्येनमभिदासति हिनस्ति प्राणविदं प्रत्याक्रोशताडनादि प्रयुङ्क्ते सोऽप्येवमेव विध्वंसत इत्यर्थः। यस्मात्स एष प्राणवित् प्राणभूतत्वादश्माखण इवाश्माखणोऽधर्षणीय इत्यर्थः।**जिस प्रकार पाषाणको प्राप्त होकर इत्यादि—**यही इसमें दृष्टान्त है। उसी प्रकार निश्चय ही वह नष्ट हो जाता है; कौन नष्ट हो जाता है? सो बतलाते हैं—जो इस प्रकार पूर्वोक्त प्राणको जाननेवाले उपासकके प्रति उसके अयोग्य **पापाचरण करनेकी कामना—**इच्छा **करता है; तथा जो इसका हनन करता है—**इस प्राणवेत्ताके प्रति गाली-गलौज एवं ताडनादिका प्रयोग करता है वह भी इसी प्रकार नष्ट हो जाता है—यह इसका अभिप्राय है; क्योंकि वह प्राणवेत्ता प्राणस्वरूप होनेके कारण दुर्भेद्य पाषाणके समान दुर्भेद्य पाषाण अर्थात् दुर्धर्ष है।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७


ननु नासिक्योऽपि प्राणो वा-<br>य्वात्मा यथा मुख्यस्तत्र नासि-<br>क्यः प्राणः पाप्मना विद्धः प्राण<br>एव सन्न मुख्यः कथम् ?<br><br>नैष दोषः; नासिक्यस्तु स्थान-<br>करणवैगुण्याद्विद्धो वाय्वात्मापि<br>सन्; मुख्यस्तु तदसंभवात्<br>स्थानदेवताबलीयस्त्वाच्च विद्ध<br>इति युक्तम् । यथा वास्याद् यः<br>शिक्षावत्पुरुषाश्रयाः कार्यविशेषं<br>कुर्वन्ति नान्यहस्तगतास्तद्वद्द्दोष-<br>बद्घ्राणसचिवत्वाद्विद्धा घ्राण-<br>देवता न मुख्यः ॥ ८ ॥शंका—जैसा कि मुख्य प्राण है उसी प्रकार नासिकास्थित प्राण भी तो वायुरूप ही है; किंतु प्राणरूप होते हुए भी केवल नासिकागत प्राण ही पापसे विद्ध है, मुख्य प्राण नहीं है—सो कैसे ?<br><br>समाधान—यह कोई दोष नहीं है। नासिकामें रहनेवाला प्राण तो वायुरूप होनेपर भी स्थानावच्छिन्न इन्द्रियके दोषके कारण असुरोंद्वारा पापसे विद्ध हो गया है; किंतु मुख्य प्राण आश्रयदोषकी असम्भवताके कारण तथा स्थानदेवतासे प्रबलतर होनेके कारण पापसे विद्ध नहीं हुआ—यह उचित ही है। जिस प्रकार बसूला आदि औजार सुशिक्षित पुरुषके हाथमें रहनेपर विशेष कार्य करते हैं, किंतु दूसरेके हाथमें पड़नेपर वैसा नहीं करते, उसी प्रकार दोषयुक्त घ्राणका साथी होनेके कारण घ्राणदेवता पापसे विद्ध है और मुख्य प्राण पापविद्ध नहीं है ॥ ८ ॥
यस्मान्न विद्धोऽसुरैर्मुख्यस्त-<br>स्मात्—क्योंकि मुख्य प्राण असुरोंद्वारा पापविद्ध नहीं हुआ, इसलिये—

५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

५८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १
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नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येष तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान्प्राणानवति । एतमु एवान्ततोऽवित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥ ९ ॥

लोक इस (मुख्य प्राण) के द्वारा न सुगन्धको जानता है और न दुर्गन्धको ही जानता है; क्योंकि यह पापसे पराभूत नहीं है। अतः यह जो कुछ खाता या पीता है उससे अन्य प्राणोंका (इन्द्रियोंका) पोषण करता है। अन्तमें इस मुख्य प्राणको प्राप्त न होनेके कारण ही [घ्राणादि प्राणसमूह] उत्क्रमण करता है और इसीसे अन्तमें पुरुष मुख फाड़ देता है ॥ ९ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
नैवैतेन सुरभि दुर्गन्धि वा विजानाति घ्राणेनैव तदुभयं विजानाति लोकः। अतश्च पाप्मकार्यादर्शनादपहतपाप्माप-हतो विनाशितोऽपनीतः पाप्मा यस्मात्सोऽयमपहतपाप्मा ह्येष विशुद्ध इत्यर्थः।लोक इस मुख्य प्राणके द्वारा न सुगन्धको जानता है और न दुर्गन्ध-को ही, इन दोनोंको वह घ्राणके द्वारा ही जानता है। अतः पापका कार्य न देखे जानेके कारण यह अपहतपाप्मा है—जिससे पाप अपहत-विनाशित अर्थात् दूर कर दिया गया है वह यह मुख्य प्राण अपहतपाप्मा अर्थात् विशुद्ध है।
यस्माच्चात्मंभरयः कल्याणा-द्यासङ्गवत्त्वाद्व्राणादयो न तथात्मंभरिर्मुख्यः, किं तर्हि ? सर्वार्थः कथम् ? इत्युच्यते—तेन मुख्येन यदश्नाति यत्पिबतिक्योंकि घ्राणादि इन्द्रियाँ अपने-अपने कल्याणमें आसक्त होनेके कारण अपना ही पोषण करनेवाली हैं और मुख्य प्राण उस प्रकार अपना ही पोषण करनेवाला नहीं है; तो फिर वह कैसा है ? वह तो सभीका हितकारी है। किस प्रकार ? सो बतलाया जाता है—उस मुख्य
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ५९

| लोकस्तेनाशितेन पीतेन चेतरान् घ्राणादीनवति पालयति। तेन हि तेषां स्थितिर्भवतीत्यर्थः। अतः सर्वंभरिः प्राणोऽतो विशुद्धः।<br><br>कथं पुनर्मुख्याशितपीताभ्यां स्थितिरेषां गम्यते ? इत्युच्यते-<br>एतं मुख्यं प्राणम्, मुख्यप्राणस्य वृत्तिमन्नपाने इत्यर्थः, अन्ततोऽन्ते मरणकालेऽवित्त्वालब्ध्वोत्क्रामति घ्राणादिप्राणसमुदाय इत्यर्थः। अप्राणो हि न शक्नोत्यशितुं पातुं वा। तेन तदोत्क्रान्तिः प्रसिद्धा घ्राणादिकलापस्य।<br><br>दृश्यते ह्युत्क्रान्तौ प्राणस्याशिशिषा। अतो व्याददात्येवास्यविदारणं करोतीत्यर्थः। तद्ध्यन्नालाभ उत्क्रान्तस्य लिङ्गम् ॥९॥ | प्राणके द्वारा लोग जो कुछ खाते-पीते हैं उस खाये-पीयेसे वह मुख्य प्राण घ्राणादि दूसरे प्राणोंका पोषण करता है, क्योंकि उसीसे उन सब-की स्थिति होती है। इसलिये मुख्य प्राण सभीका पोषण करनेवाला है, अतः वह विशुद्ध है।<br><br>किंतु मुख्य प्राणाद्वारा खाये-पीये पदार्थोंसे अन्य प्राणोंकी स्थिति किस प्रकार जानी जाती है ? सो बतलाते हैं—इस मुख्य प्राणको अर्थात् इस मुख्य प्राणकी वृत्तिरूप अन्न-पानको न पाकर ही अन्त समय—मरण-कालमें घ्राणादि इन्द्रिय-समुदाय उत्क्रमण करता है, क्योंकि प्राणहीन पुरुष खाने या पीनेमें समर्थ नहीं होता। इसीसे उस समय घ्राणादि इन्द्रिय-समुदायकी उत्क्रान्ति प्रसिद्ध है। उत्क्रमणके समय प्राणकी भोजन करनेकी इच्छा स्पष्ट देखी जाती है। इसीसे उस समय वह मुख बा देता है। यही उत्क्रमण करनेवाले घ्राणादिको अन्नादि प्राप्त न होनेका चिह्न है ॥ ९ ॥ |

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प्राणकी आङ्गिरस संज्ञा होनेमें हेतु

तꣳ हाङ्गिरा उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसः ॥ १० ॥

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६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

६०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

अङ्गिरा ऋषि‍ने इस [मुख्य प्राण] के ही रूपमें उद्गीथकी उपासना की थी। अतः इस प्राणको ही आङ्गिरस मानते हैं, क्योंकि यह सम्पूर्ण अङ्गोंका रस है ॥ १० ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तं हाङ्गिरास्तं मुख्यं प्राणं हाङ्गिरा इत्येवंगुणमुद्गीथमुपासांचक्रे उपासनं कृतवान्बको दाल्भ्य इति वक्ष्यमाणेन संबध्यते । तथा बृहस्पतिरिति, आयास्य इति चोपासांचक्रे बक इत्येवं संबन्धं कृतवन्तः केचित्; 'एतमु एवाङ्गिरसं बृहस्पतिमायास्यं प्राणं मन्यन्ते' इति वचनात् ।<br><br>भवत्येवं यथाश्रुतासंभवे संभवति तु यथाश्रुतम्, ऋषिचोदनायामपि श्रुत्यन्तरवत्; "तस्माच्छतर्चिन इत्याचक्षत एतमेव सन्तमृषिमपि" । तथा माध्यमो गृत्समदो विश्वामित्रो वामदेवोऽत्रिरित्यादीन् ऋषीनेव प्राणमापादयति श्रुतिः । तथैतानप्यृषीन् प्राणोपासकानङ्गिरोबृहस्पत्यायास्यान्प्राणं करोत्यभेदविज्ञानाय'तं हाङ्गिराः' अर्थात् अङ्गिरा-ऐसे गुणवाले इस मुख्य प्राणरूप उद्गीथकी दाल्भ्य बकने उपासना की—इस प्रकार इसका आगेसे सम्बन्ध है। तथा किसी-किसीने 'दलभपुत्र बकने बृहस्पति और आयास्यगुणवाले प्राणरूप उद्गीथकी उपासना की'—इस तरह इसका सम्बन्ध लगाया है; क्योंकि यहाँ 'इस प्राणको ही आङ्गिरस बृहस्पति और आयास्य मानते हैं' ऐसा वचन है ।<br><br>ठीक है, यदि यथाश्रुत अर्थ (श्रुतिका सरलार्थ) सम्भव न हो तो ऐसा [दूरान्वयी] अर्थ भी लिया जा सकता है । किंतु यहाँ तो "अतः ऋषि होनेपर भी इसे (प्राणको) 'शतर्चिन' ऐसा कहकर पुकारते हैं" इस अन्य श्रुतिके अनुसार ऋषियोंका प्रतिपादन करनेमें प्रवृत्त यथाश्रुत अर्थ भी सम्भव है ही । इसी प्रकार श्रुति माध्यम, गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव और अत्रि आदि ऋषियोंको ही प्राणभावकी प्राप्ति कराती है; ऐसे ही प्राण ही पिता है; प्राण ही माता है' इत्यादिके समान अङ्गिरा,

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१


| 'प्राणो ह पिता प्राणो माता' इत्यादिवच्च । तस्माद्दृष्टिरङ्गिरा नाम प्राण एव सन्नात्मानमङ्गिरसं प्राणमुद्गीथमुपासांचक्र इत्येतत् । यद्यस्मात्सोऽङ्गानां प्राणः सन् रसस्तेनासावाङ्गिरसः॥१०॥ | बृहस्पति और आयास्य—इन प्राणोपासक ऋषियोंको भी श्रुति अभेद-विज्ञानके लिये प्राण बनाती है । अतः इसका तात्पर्य यह है कि अङ्गिरा नामक ऋषिने प्राणस्वरूप होकर ही अङ्गिरस आत्मा प्राणरूप उद्गीथकी उपासना की; क्योंकि प्राण होनेके कारण यह अङ्गोंका रस है, इसलिये आङ्गिरस है ॥१०॥ |


प्राणकी बृहस्पति संज्ञा होनेमें हेतु

तेन तंꣳह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासांचक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते वाग्घि बृहती तस्या एष पतिः॥११॥

इसीसे बृहस्पतिने उस प्राणके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। लोग इस प्राणको ही बृहस्पति मानते हैं; क्योंकि वाक् ही बृहती है और यह उसका पति है ॥ ११ ॥

| तथा वाचो बृहत्याः पतिस्तेनासौ बृहस्पतिः ॥ ११ ॥ | तथा यह वाक् यानी बृहतीका पति है, इसलिये बृहस्पति है॥११॥ |


प्राणकी आयास्य संज्ञा होनेमें हेतु

तेन तंꣳहायास्य उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद्यदयते ॥ १२ ॥

इसीसे आयास्यने इस प्राणके रूपमें ही उद्गीथकी उपासना की। लोग इस प्राणको ही आयास्य मानते हैं; क्योंकि यह आस्य (मुख) से निकलता है ॥ १२ ॥

६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

६२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

तथा यद्यस्मादास्यादयते निर्गच्छति तेनायास्य ऋषिः प्राण एव सन्नित्यर्थः । तथान्योऽप्युपासक आत्मानमेवाङ्गिरसादिगुणं प्राणमुद्गीथमुपासीतेत्यर्थः ॥ १२ ॥तथा क्योंकि यह आस्य (मुख) से निकलता है, इसलिये आयास्य ऋषिने प्राणरूप होकर ही [इस प्राणमय उद्गीथकी उपासना की]- यह इसका तात्पर्य है। अर्थात् अन्य उपासकको भी आङ्गिरस आदि गुणोंसे युक्त आत्मस्वरूप प्राणके रूपमें ही उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये ॥१२॥

— : ० : —

तेन तꣳह बको दाल्भ्यो विदांचकार। स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः कामानागायति॥१३॥

अतः दल्भके पुत्र वकने [ पूर्वोक्तरूपसे ] उसे जाना। [ अर्थात् पूर्वोक्त प्रकारसे प्राणमय उद्गीथकी उपासना की । ] वह नैमिषारण्यमें यज्ञकरनेवालोंका उद्गाता हुआ और उसने उनकी कामनापूर्तिके लिये उद्गान किया ॥ १३ ॥

न केवलमङ्गिरःप्रभृतय उपासांचक्रिरे; तं ह बको नाम दल्भस्यापत्यं दाल्भ्यो विदांचकार यथा दर्शितं प्राणं विज्ञातवान् । विदित्वा च स ह नैमिशीयानां सत्रियामुद्गाता बभूव । स च प्राणविज्ञानसामर्थ्यादेभ्यो नैमिशीयेभ्यः कामानागायति स्महागीतवान्किलेत्यर्थः ॥१३॥केवल अङ्गिरा आदिने ही प्राणरूप उद्गीथकी उपासना नहीं की; बल्कि दल्भके पुत्र बकने भी उसे [ इसी प्रकार ] जाना था अर्थात् पूर्वप्रदर्शित प्राणका ज्ञान प्राप्त किया था । इस प्रकार उसे जानकर वह नैमिषारण्यमें यज्ञ करनेवालोंका उद्गाता हुआ तथा इस प्राण-विज्ञानके सामर्थ्यसे ही उसने उन नैमिशीय याज्ञिकोंकी कामनाओंका [ उनकी पूर्तिके लिये] आगान किया ॥१३॥

—:००:—

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यम् [ ६३


प्राणदृष्टिसे ओंकारोपासनाका फल

आगाता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥ १४ ॥

इसे इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् इस उद्गीथसंज्ञक अक्षर [ओंकार] की इस प्रकार उपासना करता है, वह कामनाओंका आगान करनेवाला होता है—ऐसी यह अध्यात्म उपासना है ॥ १४ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तथा अन्योऽप्युद्गाता आगाता ह वै कामानां भवति य एवं विद्वान्यथोक्तगुणं प्राणमक्षरमुद्गीथमुपास्ते । तस्यैतद् दृष्टं फलमुक्तम्, प्राणात्मभावस्त्वदृष्टं “देवो भूत्वा देवानप्येति” इति श्रुत्यन्तरात्सिद्धमेवेत्यभिप्रायः। इत्यध्यात्ममेतदात्मविषयमुद्गीथोपासनमित्युक्तोपसंहारोऽधिदैवतोद्गीथोपासने वक्ष्यमाणे बुद्धिसमाधानार्थः ॥ १४ ॥इसे इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् इस उद्गीथसंज्ञक अक्षरकी उपर्युक्त गुणविशिष्ट प्राणरूपसे उपासना करता है, वह अन्य उद्गाता भी कामनाओंका आगान करनेवाला हो जाता है। यह उसका दृष्ट फल बतलाया गया है। “देवता होकर ही देवताओंको प्राप्त होता है” इस अन्य श्रुतिके अनुसार प्राणस्वरूपता-की प्राप्तिरूप अदृष्ट फल तो सिद्ध ही है—यह इसका अभिप्राय है। इत्यध्यात्मम्—यह उद्गीथोपासना आत्मविषयिणी है—इस प्रकार जो पूर्वोक्त कथनका उपसंहार किया गया है वह आगे कही जानेवाली अधिदैवत उद्गीथोपासनामें बुद्धिको समाहित करनेके लिये है ॥१४॥
<br>

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥२॥

तृतीय खण्ड


आदित्यदृष्टिसे उद्गीथोपासना

अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन्वा एष प्रजाभ्य उद्गायति । उद्यꣳस्तमोभयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥

इसके अनन्तर अधिदैवत उपासनाका वर्णन किया जाता है—जो कि वह [आदित्य] तपता है, उसके रूपमें उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये। यह उदित होकर प्रजाओंके लिये उद्गान करता है, उदित होकर अन्धकार और भयका नाश करता है। जो इस प्रकार इसको जानता [इसकी उपासना करता] है वह निश्चय ही अन्धकार और भयका नाश करनेवाला होता है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथानन्तरमधिदैवतं देवताविषयमुद्गीथोपासनं प्रस्तुतमित्यर्थः अनेकधोपास्यत्वादुद्गीथस्य। य एवासावादित्यस्तपति तमुद्गीथमुपासीतादित्यदृष्ट्योद्गीथमुपासीतेत्यर्थः । तमुद्गीथमित्युद्गीथशब्दोऽक्षरवाची सन्कथमादित्ये वर्तते ? इत्युच्यते—इसके अनन्तर अधिदैवत अर्थात् देवताविषयक उद्गीथोपासनाका आरम्भ किया जाता है, क्योंकि उद्गीथ अनेक प्रकारसे उपासनीय है। जो कि यह आदित्य तपता है, उसके रूपमें उद्गीथकी उपासना करे; अर्थात आदित्य-दृष्टिसे उद्गीथकी उपासना करे। 'तमुद्गीथम्' इसमें 'उद्गीथ' शब्द अक्षरवाचक होता हुआ किस प्रकार आदित्यमें संगत होता है? यह बतलाया जाता है—

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५


| उद्यन्नुद्गच्छन्वा एष प्रजाभ्यः प्रजार्थमुद्गायति प्रजानामन्नोत्पत्त्यर्थम् । न ह्यनुद्यति तस्मिन् व्रीह्यादेर्निष्पत्तिः स्यादत उद्गायतीवोद्गायति, यथैवोद्गातान्नार्थम् । अत उद्गीथः सवितेत्यर्थः । <br><br> किं चोद्यन्नैशं तमस्तज्जं च भयं प्राणिनामपहन्ति तमेवंगुणं सवितारं यो वेद सोऽपहन्ता नाशयिता ह वै भयस्य जन्ममरणादिलक्षणस्य आत्मनस्तमसश्च तत्कारणस्य अज्ञानलक्षणस्य भवति ॥ १ ॥ | यह [आदित्य] उदित होता हुआ—ऊपरकी ओर जाता हुआ प्रजाके लिये—प्रजाओंके अन्नकी उत्पत्तिके लिये उद्गान करता है, क्योंकि उसके उदित न होनेपर व्रीहि आदिकी निष्पत्ति नहीं हो सकती; अतः जिस प्रकार उद्गाता अन्नके लिये उद्गान करता है, उसी प्रकार वह उद्गान करनेके समान उद्गान करता है। अतः सूर्य उद्गीथ है—यह इसका तात्पर्य है। <br><br> इसके सिवा, वह उदित होकर रात्रिके अन्धकार और उससे होनेवाले प्राणियोंके भयका भी नाश करता है। जो इस प्रकारके गुणसे युक्त सविताकी उपासना करता है, वह जन्म-मरणादिरूप आत्माके भय और अन्धकारका अर्थात् उसके कारणभूत अज्ञानका नाश करनेवाला होता है ॥ १ ॥ |


सूर्य और प्राणकी समानता तथा प्राणदृष्टिसे उद्गीथोपासना

| यद्यपि स्थानभेदात्प्राणादित्यौ भिन्नाविव लक्ष्येते तथापि न स तत्त्वभेदस्तयोः, कथम् ? | यद्यपि स्थानभेदके कारण प्राण और आदित्य भिन्न-से दिखायी देते हैं, तथापि वह उनका तात्त्विक भेद नहीं है। किस प्रकार ? [ यह बतलाते हैं— ] |

६६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय १

६६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय १


समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयममुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥

यह [प्राण] और [सूर्य] परस्पर समान ही हैं। यह प्राण उष्ण है और वह सूर्य भी उष्ण है। इस [प्राण] को 'स्वर' ऐसा कहते हैं और उस [सूर्य] को 'स्वर' एवं प्रत्यास्वर' ऐसा कहते हैं। अतः इस [प्राण] और उस [सूर्य] रूपसे उद्गीथकी उपासना करे ॥ २ ॥

| समान उ एव तुल्य एव प्राणः सवित्रा गुणतः, सविता च प्राणेन। यस्मादुष्णोऽयं प्राण उष्णश्चासौ सविता किं च स्वर इतीमं प्राणमाचक्षते कथयन्ति, तथा स्वर इति प्रत्यास्वर इति चामुं सवितारम्। यस्मात्प्राणः स्वरत्येव न पुनर्मृतः प्रत्यागच्छति, सविता त्वस्तमित्वा पुनरप्यहन्यहनि प्रत्यागच्छति; अतः प्रत्यास्वरः। अस्माद्गुणतो नामतश्च समानावितरेतरं प्राणादित्यौ। अतः तत्त्वाभेदादेतं प्राणमिमममुं चादित्यमुद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥ | गुणदृष्टिसे प्राण सूर्यके सदृश ही है तथा सूर्य प्राणके सदृश है, क्योंकि यह प्राण उष्ण है और वह सूर्य भी उष्ण है तथा इस प्राणको 'स्वर' ऐसा कहकर पुकारते हैं और उस सूर्यको भी 'स्वर' एवं 'प्रत्यास्वर' ऐसा कहते हैं, क्योंकि प्राण तो केवल स्वररण (गमन) ही करता है—मरनेके पश्चात् वह पुनः लौटता नहीं; किंतु सूर्य प्रतिदिन अस्तमित हो-होकर लौट आता है, इसलिये वह प्रत्यास्वर है। इस प्रकार गुण और नामसे भी ये प्राण और आदित्य एक-दूसरेके तुल्य ही हैं। अतः तत्त्वतः अभेद होनेके कारण इस प्राण और उस सूर्यरूपसे उद्गीथकी (उद्गीथावयवभूत ओंकारकी) उपासना करे ॥ २ ॥ |

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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७


व्यानदृष्टिसे उद्गीथोपासना

अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानः। अथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः स वाक्। तस्मादप्राणन्नपानन्वाचमभिव्याहरति ॥ ३ ॥

तदनन्तर दूसरे प्रकारसे [अध्यात्मोपासना कही जाती है—] व्यानदृष्टिसे ही उद्गीथकी उपासना करे। पुरुष जो प्राणन करता है (मुख या नासिकाद्वारा वायुको बाहर निकालता है) वह प्राण है और जो अपश्वास लेता है (वायुको भीतरकी ओर खींचता है) वह अपान है। तथा प्राण और अपानकी जो सन्धि है वही व्यान है। जो व्यान है वही वाक् है। इसीसे पुरुष प्राण और अपान क्रिया न करते हुए ही वाणी बोलता है ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अथ खल्विति प्रकारान्तरेणोपासनमुद्गीथस्योच्यते; व्यानमेव वक्ष्यमाणलक्षणं प्राणस्यैव वृत्तिविशेषमुद्गीथमुपासीत। अधुना तस्य तत्त्वं निरूप्यते—यद्वै पुरुषः प्राणिति मुखनासिकाभ्यां वायुं बहिर्निःसारयति, स प्राणाख्यो वायोर्वृत्तिविशेषः, यदपानित्यपश्वसिति ताभ्यामेवान्तराकर्षति वायुं सोऽपानोऽपानाख्या वृत्तिः।‘अथ खलु’—अब प्रकारान्तरसे उद्गीथकी उपासना कही जाती है। प्राणका ही वृत्तिविशेष जो आगे कहे जानेवाले लक्षणोंसे युक्त व्यान है, उसके रूपमें उद्गीथकी उपासना करे। अब उसके तत्त्वका निरूपण किया जाता है। पुरुष जो प्राणन करता है अर्थात् मुख और नासिकाद्वारा वायुको बाहर निकालता है, वह वायुका प्राण नामक वृत्तिविशेष है; तथा वह जो अपश्वास करता है, अर्थात् उन (मुख और नासिका) के ही द्वारा वायुको भीतर खींचता है वह उसकी अपानसंज्ञक वृत्ति है।

छा० उ० ३—

६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

६८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| ततः किम्? इत्युच्यते—अथ य उक्तलक्षणयोः प्राणापानयोः सन्धिस्तयोरन्तरा वृत्तिविशेषः, स व्यानः; यः सांख्यादिशास्त्रप्रसिद्धः श्रुत्या विशेषनिरूपणान्नासौ व्यान इत्यभिप्रायः । | इससे क्या सिद्ध हुआ ? यह बतलाया जाता है—उन उपर्युक्त लक्षणवाले प्राण और अपानकी जो सन्धि है—उनके बीचका जो वृत्तिविशेष है, वह व्यान है । श्रुतिद्वारा विशेषरूपसे निरूपण किये जानेके कारण यहाँ वह व्यान अभिप्रेत नहीं है जो सांख्यादि शास्त्रमें प्रसिद्ध [ सर्वदेहव्यापी ] व्यान है ऐसा इसका तात्पर्य है । | | कस्मात्पुनः प्राणापानौ हित्वा महतायासेन व्यानस्यैवोपासनमुच्यते ? वीर्यवत्कर्महेतुत्वात् । कथं वीर्यवत्कर्महेतुत्वमित्याह—<br><br>यो व्यानः सा वाक्, व्यानकार्यत्वाद्वाचः । यस्माद्व्याननिर्वर्त्या वाक्तस्मादप्राणन्ननपानन्प्राणापानव्यापारावकुर्वन्वाचमभिव्याहरत्युच्चारयति लोकः ॥ ३ ॥ | किंतु प्राण और अपानको छोड़कर अत्यन्त परिश्रमसे व्यानकी ही उपासनाका निरूपण क्यों किया गया ? [ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—]<br>क्योंकि यह वीर्यवान् कर्मकी निष्पत्तिका कारण है । यह वीर्यवान् कर्मकी सिद्धिका कारण कैसे है ? इसपर कहते हैं—जो व्यान है, वही वाणी है, क्योंकि वाणी व्यानका ही कार्य है । वाणी व्यानसे निष्पन्न होनेवाली है, इसलिये लोक प्राण और अपानन अर्थात् प्राण और अपानकी क्रियाएँ न करता हुआ वाणीका अभिव्याहरण—उच्चारण करता है ॥ ३ ॥ |

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं ६९


व्यानप्रयुक्त होनेसे वाक्, ऋक्, साम और उद्गीथकी समानता

या वाक्सर्क्तस्मादप्राणन्नपानन्नृचमभिव्याहरति यर्क्तत्साम तस्मादप्राणन्नपानन्साम गायति यत्साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्नपानन्नुद्गायति ॥ ४ ॥

जो वाक् है वही ऋक् है। उसीसे पुरुष प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ ऋक् का उच्चारण करता है। जो ऋक् है वही साम है। इसीसे प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ सामगान करता है। जो साम है वही उद्गीथ है। इसीसे प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ उद्गान करता है ॥ ४ ॥

तथा वाग्विषेषामृचम्, ऋक्संस्थं च साम, सामावयवं चोद्गीथम्, अप्राणन्नपानन्व्यानेनैव निर्वर्तयतीत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥इसी प्रकार वाग्विषेष ऋक्, ऋक्सि्थत साम और सामके अवयवभूत उद्गीथको भी पुरुष प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ केवल व्यानसे ही सम्पन्न करता है—यह उसका अभिप्राय है ॥४॥
न केवलं वागाद्यभिव्याहरणमेव—केवल वाणी आदिका उच्चारण ही नहीं—

अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्नपानँस्तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमेवोद्गीथमुपासीत ॥ ५ ॥

इसके सिवा जो और भी वीर्ययुक्त कर्म हैं; जैसे—अग्निका मन्थन; किसी सीमातक दौड़ना तथा सुदृढ़ धनुषको खींचना—इन सब कर्मोंको भी पुरुष प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ ही करता है। इस कारण व्यानदृष्टिसे ही उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये ॥ ५ ॥

७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

७०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| अतोऽस्मादन्यान्यपि यानि वीर्यवन्ति कर्माणि प्रयत्नाधिक्यनिर्वर्त्यानि--यथाग्नेर्मन्थनम्, आजेर्मर्यादायाः सरणं धावनम्, दृढस्य धनुष आयमनमाकर्षणम्-अप्राणन्नपानंस्तानि करोति ।<br><br>अतो विशिष्टो व्यानः प्राणादिवृत्तिभ्यः । विशिष्टस्योपासनं ज्यायः फलवत्त्वाद्राजोपासनवत् । एतस्य हेतोरेतस्मात्कारणाद्व्यानमेवोद्गीथमुपासीत, नान्यद्वृत्त्यन्तरम् । कर्मवीर्यवत्तरत्वं फलम् ॥ ५ ॥ | इसके सिवा जो दूसरे भी अधिक प्रयत्नसे निष्पन्न होनेवाले वीर्ययुक्त कर्म हैं—जैसे अग्निका मन्थन, किसी सीमातक दौड़ना और सुदृढ़ धनुषको खींचना—उन्हें भी पुरुष प्राण और अपानकी क्रिया न करते हुए ही करता है ।<br><br>अतः प्राणादिवृत्तियोंकी अपेक्षा व्यान विशिष्ट है; और राजाकी उपासनाके समान फलवती होनेके कारण विशिष्टकी उपासना भी उत्कृष्टतर है । इस हेतुसे अर्थात् इस कारणसे व्यानरूपसे ही उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये—वायुकी अन्य वृत्तियोंके रूपसे नहीं । कर्मको अधिक प्रबल बनाना ही उसका फल है ॥ ५ ॥ |


उद्गीथाक्षरोंमें प्राणादिदृष्टि

अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीतोद्गीथ इति प्राण एवोत्प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग्गीर्वाचो ह गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदँसर्वँ स्थितम् ॥ ६ ॥

इसके पश्चात् उद्गीथाक्षरोंकी—‘उद्गीथ’ उस नामके अक्षरोंकी उपासना करनी चाहिये—‘उद्गीथ’ इस शब्दमें प्राण ही ‘उत्’ है, क्योंकि प्राणसे ही उठता है; वाणी ही ‘गी’ है, क्योंकि वाणीको ‘गिरा’ कहते हैं तथा अन्न ही ‘थ’ है; क्योंकि अन्नमें ही यह सब स्थित है ॥ ६ ॥

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अथाधुना खलूद्गीथाक्षराण्युपासीत भक्त्यक्षराणि मा भूवन्नित्यतो विशिनष्टि—उद्गीथ इति, उद्गीथनामाक्षराणीत्यर्थः। नामाक्षरोपासनेऽपि नामवत एवोपासनं कृतं भवेदमुकमिश्रा इति यद्वत्।<br><br>प्राण एव उत्, उदित्यस्मिन्नक्षरे प्राणदृष्टिः। कथं प्राणस्योच्चमित्याह—प्राणेन ह्युत्तिष्ठति सर्वोऽप्राणस्यावसाददर्शनात्; अतोऽस्त्युदः प्राणस्य च सामान्यम्। वाग्गीः, वाचो ह गिर इत्याचक्षते शिष्टाः। तथान्नं थम्, अन्ने हीदं सर्वस्थितमतोऽस्त्यन्नस्य थाक्षरस्य च सामान्यम् ॥ ६ ॥इसके पश्चात् अब उद्गीथके अक्षरोंकी उपासना करनी चाहिये। 'उद्गीथ' शब्दसे उद्गीथभक्तिके अक्षर न समझ लिये जायँ इसलिये 'उद्गीथ' यह विशेषण लगाते हैं। तात्पर्य यह है कि 'उद्गीथ' इस नामके अक्षरोंकी उपासना करे; क्योंकि 'अमुक मिश्र' ऐसा कहनेसे जैसे उस नामवाले व्यक्ति-विशेषका बोध होता है, उसी प्रकार नामके अक्षरोंकी उपासना करनेसे भी नामीकी ही उपासना की जाती है।<br><br>प्राण ही 'उत्' है, अर्थात् 'उत्' इस अक्षरमें प्राणदृष्टि करनी चाहिये। प्राण किस प्रकार 'उत्' है सो बतलाते हैं—सब लोग प्राणसे ही उठते हैं, क्योंकि प्राणहीनकी शिथिलता देखी गयी है; अतः उत् और प्राणकी समानता स्पष्ट ही है। वाक् 'गी' है; क्योंकि शिष्ट लोग वाक्‌को 'गिरा' ऐसा कहते हैं तथा अन्न 'थ' है, क्योंकि अन्नमें ही यह सब स्थित है; अतः अन्न और थ अक्षरकी समानता है ॥ ६ ॥