भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अथाधुना खलूद्गीथाक्षराण्युपासीत भक्त्यक्षराणि मा भूवन्नित्यतो विशिनष्टि—उद्गीथ इति, उद्गीथनामाक्षराणीत्यर्थः। नामाक्षरोपासनेऽपि नामवत एवोपासनं कृतं भवेदमुकमिश्रा इति यद्वत्।<br><br>प्राण एव उत्, उदित्यस्मिन्नक्षरे प्राणदृष्टिः। कथं प्राणस्योच्चमित्याह—प्राणेन ह्युत्तिष्ठति सर्वोऽप्राणस्यावसाददर्शनात्; अतोऽस्त्युदः प्राणस्य च सामान्यम्। वाग्गीः, वाचो ह गिर इत्याचक्षते शिष्टाः। तथान्नं थम्, अन्ने हीदं सर्वस्थितमतोऽस्त्यन्नस्य थाक्षरस्य च सामान्यम् ॥ ६ ॥इसके पश्चात् अब उद्गीथके अक्षरोंकी उपासना करनी चाहिये। 'उद्गीथ' शब्दसे उद्गीथभक्तिके अक्षर न समझ लिये जायँ इसलिये 'उद्गीथ' यह विशेषण लगाते हैं। तात्पर्य यह है कि 'उद्गीथ' इस नामके अक्षरोंकी उपासना करे; क्योंकि 'अमुक मिश्र' ऐसा कहनेसे जैसे उस नामवाले व्यक्ति-विशेषका बोध होता है, उसी प्रकार नामके अक्षरोंकी उपासना करनेसे भी नामीकी ही उपासना की जाती है।<br><br>प्राण ही 'उत्' है, अर्थात् 'उत्' इस अक्षरमें प्राणदृष्टि करनी चाहिये। प्राण किस प्रकार 'उत्' है सो बतलाते हैं—सब लोग प्राणसे ही उठते हैं, क्योंकि प्राणहीनकी शिथिलता देखी गयी है; अतः उत् और प्राणकी समानता स्पष्ट ही है। वाक् 'गी' है; क्योंकि शिष्ट लोग वाक्‌को 'गिरा' ऐसा कहते हैं तथा अन्न 'थ' है, क्योंकि अन्नमें ही यह सब स्थित है; अतः अन्न और थ अक्षरकी समानता है ॥ ६ ॥