भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 66
६२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

तथा यद्यस्मादास्यादयते निर्गच्छति तेनायास्य ऋषिः प्राण एव सन्नित्यर्थः । तथान्योऽप्युपासक आत्मानमेवाङ्गिरसादिगुणं प्राणमुद्गीथमुपासीतेत्यर्थः ॥ १२ ॥तथा क्योंकि यह आस्य (मुख) से निकलता है, इसलिये आयास्य ऋषिने प्राणरूप होकर ही [इस प्राणमय उद्गीथकी उपासना की]- यह इसका तात्पर्य है। अर्थात् अन्य उपासकको भी आङ्गिरस आदि गुणोंसे युक्त आत्मस्वरूप प्राणके रूपमें ही उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये ॥१२॥

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तेन तꣳह बको दाल्भ्यो विदांचकार। स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः कामानागायति॥१३॥

अतः दल्भके पुत्र वकने [ पूर्वोक्तरूपसे ] उसे जाना। [ अर्थात् पूर्वोक्त प्रकारसे प्राणमय उद्गीथकी उपासना की । ] वह नैमिषारण्यमें यज्ञकरनेवालोंका उद्गाता हुआ और उसने उनकी कामनापूर्तिके लिये उद्गान किया ॥ १३ ॥

न केवलमङ्गिरःप्रभृतय उपासांचक्रिरे; तं ह बको नाम दल्भस्यापत्यं दाल्भ्यो विदांचकार यथा दर्शितं प्राणं विज्ञातवान् । विदित्वा च स ह नैमिशीयानां सत्रियामुद्गाता बभूव । स च प्राणविज्ञानसामर्थ्यादेभ्यो नैमिशीयेभ्यः कामानागायति स्महागीतवान्किलेत्यर्थः ॥१३॥केवल अङ्गिरा आदिने ही प्राणरूप उद्गीथकी उपासना नहीं की; बल्कि दल्भके पुत्र बकने भी उसे [ इसी प्रकार ] जाना था अर्थात् पूर्वप्रदर्शित प्राणका ज्ञान प्राप्त किया था । इस प्रकार उसे जानकर वह नैमिषारण्यमें यज्ञ करनेवालोंका उद्गाता हुआ तथा इस प्राण-विज्ञानके सामर्थ्यसे ही उसने उन नैमिशीय याज्ञिकोंकी कामनाओंका [ उनकी पूर्तिके लिये] आगान किया ॥१३॥

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