छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
| 'प्राणो ह पिता प्राणो माता' इत्यादिवच्च । तस्माद्दृष्टिरङ्गिरा नाम प्राण एव सन्नात्मानमङ्गिरसं प्राणमुद्गीथमुपासांचक्र इत्येतत् । यद्यस्मात्सोऽङ्गानां प्राणः सन् रसस्तेनासावाङ्गिरसः॥१०॥ | बृहस्पति और आयास्य—इन प्राणोपासक ऋषियोंको भी श्रुति अभेद-विज्ञानके लिये प्राण बनाती है । अतः इसका तात्पर्य यह है कि अङ्गिरा नामक ऋषिने प्राणस्वरूप होकर ही अङ्गिरस आत्मा प्राणरूप उद्गीथकी उपासना की; क्योंकि प्राण होनेके कारण यह अङ्गोंका रस है, इसलिये आङ्गिरस है ॥१०॥ |
प्राणकी बृहस्पति संज्ञा होनेमें हेतु
तेन तंꣳह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासांचक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते वाग्घि बृहती तस्या एष पतिः॥११॥
इसीसे बृहस्पतिने उस प्राणके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। लोग इस प्राणको ही बृहस्पति मानते हैं; क्योंकि वाक् ही बृहती है और यह उसका पति है ॥ ११ ॥
| तथा वाचो बृहत्याः पतिस्तेनासौ बृहस्पतिः ॥ ११ ॥ | तथा यह वाक् यानी बृहतीका पति है, इसलिये बृहस्पति है॥११॥ |
प्राणकी आयास्य संज्ञा होनेमें हेतु
तेन तंꣳहायास्य उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद्यदयते ॥ १२ ॥
इसीसे आयास्यने इस प्राणके रूपमें ही उद्गीथकी उपासना की। लोग इस प्राणको ही आयास्य मानते हैं; क्योंकि यह आस्य (मुख) से निकलता है ॥ १२ ॥