छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 67, कुल 978 में से
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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यम् [ ६३
प्राणदृष्टिसे ओंकारोपासनाका फल
आगाता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥ १४ ॥
इसे इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् इस उद्गीथसंज्ञक अक्षर [ओंकार] की इस प्रकार उपासना करता है, वह कामनाओंका आगान करनेवाला होता है—ऐसी यह अध्यात्म उपासना है ॥ १४ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथा अन्योऽप्युद्गाता आगाता ह वै कामानां भवति य एवं विद्वान्यथोक्तगुणं प्राणमक्षरमुद्गीथमुपास्ते । तस्यैतद् दृष्टं फलमुक्तम्, प्राणात्मभावस्त्वदृष्टं “देवो भूत्वा देवानप्येति” इति श्रुत्यन्तरात्सिद्धमेवेत्यभिप्रायः। इत्यध्यात्ममेतदात्मविषयमुद्गीथोपासनमित्युक्तोपसंहारोऽधिदैवतोद्गीथोपासने वक्ष्यमाणे बुद्धिसमाधानार्थः ॥ १४ ॥ | इसे इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् इस उद्गीथसंज्ञक अक्षरकी उपर्युक्त गुणविशिष्ट प्राणरूपसे उपासना करता है, वह अन्य उद्गाता भी कामनाओंका आगान करनेवाला हो जाता है। यह उसका दृष्ट फल बतलाया गया है। “देवता होकर ही देवताओंको प्राप्त होता है” इस अन्य श्रुतिके अनुसार प्राणस्वरूपता-की प्राप्तिरूप अदृष्ट फल तो सिद्ध ही है—यह इसका अभिप्राय है। इत्यध्यात्मम्—यह उद्गीथोपासना आत्मविषयिणी है—इस प्रकार जो पूर्वोक्त कथनका उपसंहार किया गया है वह आगे कही जानेवाली अधिदैवत उद्गीथोपासनामें बुद्धिको समाहित करनेके लिये है ॥१४॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥२॥