छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 71, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 71
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
व्यानदृष्टिसे उद्गीथोपासना
अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानः। अथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः स वाक्। तस्मादप्राणन्नपानन्वाचमभिव्याहरति ॥ ३ ॥
तदनन्तर दूसरे प्रकारसे [अध्यात्मोपासना कही जाती है—] व्यानदृष्टिसे ही उद्गीथकी उपासना करे। पुरुष जो प्राणन करता है (मुख या नासिकाद्वारा वायुको बाहर निकालता है) वह प्राण है और जो अपश्वास लेता है (वायुको भीतरकी ओर खींचता है) वह अपान है। तथा प्राण और अपानकी जो सन्धि है वही व्यान है। जो व्यान है वही वाक् है। इसीसे पुरुष प्राण और अपान क्रिया न करते हुए ही वाणी बोलता है ॥ ३ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथ खल्विति प्रकारान्तरेणोपासनमुद्गीथस्योच्यते; व्यानमेव वक्ष्यमाणलक्षणं प्राणस्यैव वृत्तिविशेषमुद्गीथमुपासीत। अधुना तस्य तत्त्वं निरूप्यते—यद्वै पुरुषः प्राणिति मुखनासिकाभ्यां वायुं बहिर्निःसारयति, स प्राणाख्यो वायोर्वृत्तिविशेषः, यदपानित्यपश्वसिति ताभ्यामेवान्तराकर्षति वायुं सोऽपानोऽपानाख्या वृत्तिः। | ‘अथ खलु’—अब प्रकारान्तरसे उद्गीथकी उपासना कही जाती है। प्राणका ही वृत्तिविशेष जो आगे कहे जानेवाले लक्षणोंसे युक्त व्यान है, उसके रूपमें उद्गीथकी उपासना करे। अब उसके तत्त्वका निरूपण किया जाता है। पुरुष जो प्राणन करता है अर्थात् मुख और नासिकाद्वारा वायुको बाहर निकालता है, वह वायुका प्राण नामक वृत्तिविशेष है; तथा वह जो अपश्वास करता है, अर्थात् उन (मुख और नासिका) के ही द्वारा वायुको भीतर खींचता है वह उसकी अपानसंज्ञक वृत्ति है। |
छा० उ० ३—