छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 60, कुल 978 में से
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५६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
एवं यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वꣳसत एवꣳहैव स विध्वꣳसते य एवंविदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माखणः ॥ ८ ॥
जिस प्रकार [ मिट्टीका ढेला ] दुर्भेद्य पाषाणको प्राप्त होकर विनष्ट हो जाता है उसी प्रकार वह व्यक्ति नाशको प्राप्त हो जाता है जो इस प्रकार जाननेवाले पुरुषके प्रति पापाचरणकी कामना करता है अथवा जो इसको कोसता या मारता है; क्योंकि यह प्राणोपासक अभेद्य पाषाण ही है॥ ८॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| यथाश्मानमिति, एष एव दृष्टान्तः; एवं हैव स विध्वंसते विनश्यति; कोऽसौ? इत्याह—य एवंविदि यथोक्तप्राणविदि पापं तदनर्हं कर्तुं कामयत इच्छति यश्चाप्येनमभिदासति हिनस्ति प्राणविदं प्रत्याक्रोशताडनादि प्रयुङ्क्ते सोऽप्येवमेव विध्वंसत इत्यर्थः। यस्मात्स एष प्राणवित् प्राणभूतत्वादश्माखण इवाश्माखणोऽधर्षणीय इत्यर्थः। | **जिस प्रकार पाषाणको प्राप्त होकर इत्यादि—**यही इसमें दृष्टान्त है। उसी प्रकार निश्चय ही वह नष्ट हो जाता है; कौन नष्ट हो जाता है? सो बतलाते हैं—जो इस प्रकार पूर्वोक्त प्राणको जाननेवाले उपासकके प्रति उसके अयोग्य **पापाचरण करनेकी कामना—**इच्छा **करता है; तथा जो इसका हनन करता है—**इस प्राणवेत्ताके प्रति गाली-गलौज एवं ताडनादिका प्रयोग करता है वह भी इसी प्रकार नष्ट हो जाता है—यह इसका अभिप्राय है; क्योंकि वह प्राणवेत्ता प्राणस्वरूप होनेके कारण दुर्भेद्य पाषाणके समान दुर्भेद्य पाषाण अर्थात् दुर्धर्ष है। |