भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 63
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ५९

| लोकस्तेनाशितेन पीतेन चेतरान् घ्राणादीनवति पालयति। तेन हि तेषां स्थितिर्भवतीत्यर्थः। अतः सर्वंभरिः प्राणोऽतो विशुद्धः।<br><br>कथं पुनर्मुख्याशितपीताभ्यां स्थितिरेषां गम्यते ? इत्युच्यते-<br>एतं मुख्यं प्राणम्, मुख्यप्राणस्य वृत्तिमन्नपाने इत्यर्थः, अन्ततोऽन्ते मरणकालेऽवित्त्वालब्ध्वोत्क्रामति घ्राणादिप्राणसमुदाय इत्यर्थः। अप्राणो हि न शक्नोत्यशितुं पातुं वा। तेन तदोत्क्रान्तिः प्रसिद्धा घ्राणादिकलापस्य।<br><br>दृश्यते ह्युत्क्रान्तौ प्राणस्याशिशिषा। अतो व्याददात्येवास्यविदारणं करोतीत्यर्थः। तद्ध्यन्नालाभ उत्क्रान्तस्य लिङ्गम् ॥९॥ | प्राणके द्वारा लोग जो कुछ खाते-पीते हैं उस खाये-पीयेसे वह मुख्य प्राण घ्राणादि दूसरे प्राणोंका पोषण करता है, क्योंकि उसीसे उन सब-की स्थिति होती है। इसलिये मुख्य प्राण सभीका पोषण करनेवाला है, अतः वह विशुद्ध है।<br><br>किंतु मुख्य प्राणाद्वारा खाये-पीये पदार्थोंसे अन्य प्राणोंकी स्थिति किस प्रकार जानी जाती है ? सो बतलाते हैं—इस मुख्य प्राणको अर्थात् इस मुख्य प्राणकी वृत्तिरूप अन्न-पानको न पाकर ही अन्त समय—मरण-कालमें घ्राणादि इन्द्रिय-समुदाय उत्क्रमण करता है, क्योंकि प्राणहीन पुरुष खाने या पीनेमें समर्थ नहीं होता। इसीसे उस समय घ्राणादि इन्द्रिय-समुदायकी उत्क्रान्ति प्रसिद्ध है। उत्क्रमणके समय प्राणकी भोजन करनेकी इच्छा स्पष्ट देखी जाती है। इसीसे उस समय वह मुख बा देता है। यही उत्क्रमण करनेवाले घ्राणादिको अन्नादि प्राप्त न होनेका चिह्न है ॥ ९ ॥ |

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प्राणकी आङ्गिरस संज्ञा होनेमें हेतु

तꣳ हाङ्गिरा उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसः ॥ १० ॥

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