छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें५२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
| सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष यस्माद्विद्धः। उभयग्रहणमविवक्षितम्, 'यस्योभयं हविरार्तिमार्च्छति' इति यद्वत्। <br><br> "यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति" (बृ० उ० १।३।३) इति समानप्रकरणश्रुतेः॥ २ ॥ | दोनोंहीको सूँघता है, क्योंकि यह पापसे बिंधा हुआ है। जिस प्रकार "जिसकी द्रवात्मक एवं पुरोडाशात्मक दोनों हवियाँ दूषित हो जायँ (वह इन्द्र देवताके लिये पाँच सकोरोंमें भात अर्पण करे)" इसवाक्यमें 'दोनों' पद विवक्षित नहीं है; उसी प्रकार यहाँ भी 'उभय' पदका ग्रहण करना इष्ट नहीं है।* [बृहदारण्यक-श्रुतिमें भी] इसीके समान प्रकरणमें यही सुना गया है कि "जो इस प्रतिकूल गन्धको सूँघता है।" [इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'उभय' शब्दको ग्रहण करना उचित नहीं है] ॥२॥ |
अथ ह वाचमुद्गीथमुपासांचक्रिरे। ताँहासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तयोभयं वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥
फिर उन्होंने वाणीके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। किंतु असुरोंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। इसीसे लोक उसके द्वारा सत्य और मिथ्या दोनों बोलता है, क्योंकि वह पापसे बिंधी हुई है ॥ ३ ॥
अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ४ ॥
१. द्रवात्मक या पुरोडाशात्मक किसी एक प्रकारकी हवि भी यदि काक आदि के स्पर्शसे दूषित हो जाय तो उसके लिये प्रायश्चित्तकी आवश्यकता होती है, फिर उपर्युक्त वाक्यमें दोनों हवियोंके दूषित होनेपर प्रायश्चित्तकी व्यवस्था क्यों बतायी गयी। अवश्य ही वहाँ 'दोनों' (उभयम्) पद अनावश्यक या अविवक्षित है।
* क्योंकि 'पापसे विद्ध होनेके कारण लोक दुर्गन्धको ग्रहण करता है।' केवल इतना ही कहना उचित है।