छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 55, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 55
| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५१ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| नैष दोषः; उद्गीथकर्मण्येव हि तत्कर्तृप्राणदेवतादृष्ट्योद्गीथभक्त्यवयवश्चोङ्कार उपास्यत्वेन विवक्षितो न स्वतन्त्रः। अतस्तादर्थ्येन कर्माहृतवन्त इति युक्तमेवोक्तम्। | **समाधान—**यह कोई दोष नहीं हैं, क्योंकि यहाँ उद्गीथ कर्ममें ही उसका कर्ता जो प्राणदेवता है उसीकी दृष्टिसे उद्गीथभक्तिका अवयवभूत ओंकार उपास्यरूपसे विवक्षित है—स्वतन्त्र ओंकार नहीं। अतः उसीके लिये उद्गाताके कर्मका अनुष्ठान किया—ऐसा जो कहा है वह उचित ही है। |
| तमेवं देवैर्वृतमुद्गातारं हासुराः स्वाभाविकतम आत्मानो ज्योतीरूपं नासिक्यं प्राणं देवं स्वोत्थेन पाप्मना धर्मासङ्गरूपेण विविधुर्विद्धवन्तः संसर्गं कृतवन्त इत्यर्थः। स हि नासिक्यः प्राणः कल्याणगन्धग्रहणाभिमानासङ्गाभिभूतविवेकविज्ञानो बभूव। स तेन दोषेण पाप्मसंसर्गी बभूव। तदिदमुक्तमसुराः पाप्मना विविधुरिति। | देवताओंसे इस प्रकार वरण किये हुए उस उद्गाता ज्योतिःस्वरूप नासिकास्थित प्राणदेवको स्वभावसे ही तमोमय असुरोंने अधर्म और आसक्तिरूप अपने पापसे बेध दिया; अर्थात् उससे संयुक्त कर दिया। वह जो नासिकास्थित प्राण है उसमें पुण्य गन्धको ग्रहण करनेके अभिमान और आसक्तिरूप दोष आ जानेसे उसके विवेक और विज्ञानका अभाव हो गया। उस दोषके कारण वह पापसे संसर्ग रखनेवाला हो गया। इसीसे यह कहा है कि असुरोंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। |
| यस्मादासुरेण पाप्मना विद्धस्तस्मात्तेन पाप्मना प्रेरितो घ्राणः प्राणो दुर्गन्धग्राहकः प्राणिनाम्। अतस्तेनोभयं जिघ्रति लोकः | क्योंकि प्राण आसुर पापसे विद्ध है इसलिये उस पापसे प्रेरित हुआ ही वह प्राणियोंका घ्राणसंज्ञक प्राण दुर्गन्धको ग्रहण करनेवाला है। इसीसे लोक सुगन्धि और दुर्गन्धि |