भारतकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

४४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४४८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

वागिन्द्रियकी परीक्षा

तथोक्तेषु पित्रा प्राणेषु—प्राणोंके प्रति पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर—

सा ह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥

उस वाक् इन्द्रियने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा 'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके?' [उन्होंने कहा--] 'जिस प्रकार गूँगे लोग बिना बोले प्राणसे प्राणन-क्रिया करते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार [हम भी जीवित रहे]।' ऐसा सुनकर वाक् इन्द्रियने शरीरमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥

सा ह वागुच्चक्रामोत्क्रान्तवती । सा चोत्क्रम्य संवत्सरमात्रं प्रोष्य स्वव्यापारान्निवृत्ता सती पुनः पर्येत्येतरान्प्राणानुवाच—कथं केन प्रकारेणाशकत शक्तवन्तो यूयं मद्ऋते मां विना जीवितुं धारयितुमात्मानमिति, ते होचुर्यथा कला इत्यादि । कला मूका यथा लोकेऽवदन्तो वाचा जीवन्ति । कथम् ?उस वाक् इन्द्रियने उत्क्रमण किया। तथा उसने उत्क्रमण कर केवल एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर--अपने व्यापारसे निवृत्त रहकर फिर लौटकर अन्य प्राणोंसे कहा--'तुमलोग मेरे बिना कैसे किस प्रकारसे जीवित रह सके?' तब उन्होंने 'जिस प्रकार गूँगे' इत्यादि उत्तर दिया । जिस प्रकार 'कला:'-गूँगेलोग संसारमें वाणीसे बिना बोले भी जीवित रहते हैं—किस प्रकार ?—प्राणसे प्राणन

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४९


| प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवं सर्वकरणचेष्टां कुर्वन्त इत्यर्थः, एवं वयमजीविष्वेत्यर्थः । आत्मनोऽश्रेष्ठतां प्राणेषु बुद्ध्वा प्रविवेश ह वाक्पुनः स्वव्यापारे प्रवृत्ता बभूवेत्यर्थः ॥ ८ ॥ | करते हुए, नेत्रसे देखते हुए, कानसे सुनते हुए और मनसे चिन्तन करते हुए, तात्पर्य यह है कि इस प्रकार समस्त इन्द्रियोंकी चेष्टाएँ करते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार हम भी जीवित रहे। तब प्राणोंमें अपनी अश्रेष्ठता समझकर वाक् इन्द्रियने प्रवेश किया; अर्थात् वह पुनः अपने व्यापारमें प्रवृत्त हो गयी ॥ ८ ॥ |


चक्षुकी परीक्षा

चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथान्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥

[ फिर ] चक्षुने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ] 'जिस प्रकार अन्धे लोग बिना देखे प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ] । ऐसा सुनकर चक्षुने प्रवेश किया ॥ ९ ॥

श्रोत्रकी परीक्षा

श्रोत्र꣫ होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथा बधिरा अशृण्वन्त

४५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४५०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥

[ तदनन्तर ] श्रोत्रने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ] जिस प्रकार बहरे मनुष्य बिना सुने प्राणसे प्राण करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ] ।' यह सुनकर श्रोत्रने शरीरमें प्रवेश किया ॥ १० ॥

मनकी परीक्षा

मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥

[ तत्पश्चात् ] मनने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास कर फिर लौटकर कहा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ] 'जिस प्रकार बच्चे, जिनका कि मन विकसित नहीं होता, प्राणसे प्राणनक्रिया करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और कानसे सुनते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ] ।' यह सुनकर मनने भी प्रवेश किया ॥ ११ ॥

समानमन्यत्, चक्षुर्होच्चक्राम श्रोत्रं होच्चक्राम मनो होच्चक्रामेत्यादि । यथाचक्षुने उत्क्रमण किया, श्रोत्रने उत्क्रमण किया एवं मनने उत्क्रमण किया इत्यादि शेष समस्त श्रुतियोंका तात्पर्य समान है । जिस प्रकार बालक 'अमना'—अप्ररूढमना
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४५१

| बाला अमनसोऽप्ररूढमनस इत्यर्थः ॥ ९-११ ॥ | अर्थात् जिनका मन विकसित नहीं हुआ है ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ९-११ ॥ |

प्राणकी परीक्षा और विजय

| एवं परीक्षितेषु वागादिषु— | इस प्रकार वागादिकी परीक्षा हो चुकनेपर— |

अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन्स यथा सुहयः पड्वीशशङ्कून्संखिदेदेवमितरान्प्राणान्समखिदत्तंहाभिसमेत्योचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२॥

फिर प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा की। उसने, जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपने पैर बाँधनेकी कीलोंको उखाड़ डालता है उसी प्रकार अन्य प्राणोंको भी उखाड़ दिया। तब उन सबने उसके सामने जाकर कहा 'भगवन् ! आप [हमारे स्वामी] रहें, आप ही हम सबमें श्रेष्ठ हैं, आप उत्क्रमण न करें' ॥ १२ ॥

| अथानन्तरं ह स मुख्यः प्राण उच्चिक्रमिषन्नुत्क्रमितुमिच्छन्किमकरोत् ? इत्युच्यते—यथा लोके सुहयः शोभनोऽश्वः पड्वीशशङ्कन्पादबन्धनकीलान् परीक्षणायारूढेन कशया हतः सन्संखिदेत्समुत्खनेत्समुत्पाटयेत, एवमितरान्वागादीन्प्राणान्समखिदत्समुद्धृतवान् ।<br><br>ते प्राणाः संचालिताः सन्तः स्वस्थाने स्थातुमनुत्सहमाना | अथ—इसके पश्चात् उस मुख्य प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा करते हुए क्या किया ? सो बतलाया जाता है—लोकमें जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपनी परीक्षाके लिये चढ़े हुए मनुष्यद्वारा चाबुकसे मारे जानेपर पैर बाँधनेकी कीलोंको उखाड़ डालता है उसी प्रकार उसने वाक् आदि अन्य प्राणोंको उखाड़ दिया अर्थात् [शरीरसे] बाहर निकाल लिया।<br><br>[इसी प्रकार] विचलित कर दिये जानेपर वे प्राण अपने गोलकोंमें स्थित रहनेमें असमर्थ होनेके कारण |


छा० उ० १५—

४५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४५२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| अभिसमेत्य मुख्यं प्राणं तमूचुः--हे भगवन्नेधि भव नः स्वामी, तस्मात्त्वं नोऽस्माकं श्रेष्ठोऽसि; मा चास्माद्देहादुत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥ | मुख्यप्राणके सम्मुख जा उससे बोले--'हे भगवन् ! एधि'--'आप हमारे स्वामी हों, क्योंकि हम सबमें आप श्रेष्ठ हैं । तथा इस शरीरसे आप उत्क्रमण न करें' ॥ १२ ॥ |


इन्द्रियोंद्वारा प्राणकी स्तुति

अथ हैनँ वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनँ चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति ॥१३॥ अथ हैनꣳ श्रोत्रमुवाच यदहꣳसंपदस्मि त्वं तत्संपदसीत्यथ हैनँ मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥

फिर उससे वाक् इन्द्रियने कहा--'मैं जो वसिष्ठ हूँ सो तुम्हीं वसिष्ठ हो ।' तदनन्तर उससे चक्षुने कहा—'मैं जो प्रतिष्ठा हूँ सो तुम्हीं प्रतिष्ठा हो' ॥१३॥ फिर उससे श्रोत्रने कहा—'मैं जो सम्पद् हूँ सो तुम्हीं सम्पद् हो ।' तत्पश्चात् उससे मन बोला—'मैं जो आयतन हूँ सो तुम्हीं आयतन हो' ॥ १४ ॥

अथ हैनँ वागादयः प्राणस्य श्रेष्ठत्वं कार्येणापादयन्त आहुर्बलिमिव हरन्तो राज्ञे विशः । कथम् ? वाक् तावदुवाच-यदहं वसिष्ठोऽस्मि, यदिति क्रियाविशेषणम्, यद्वसिष्ठत्वगुणास्मीत्य-तदनन्तर वैश्यलोग जिस प्रकार राजाको भेंट समर्पण करते हैं उसी प्रकार वागादि इन्द्रियोंने अपने कार्यसे प्राणकी श्रेष्ठता सम्पादन करते हुए कहा । किस प्रकार कहा ?--पहले वाणी बोली--मैं जो वसिष्ठ हूँ, यहाँ मूलमें 'यत' शब्द क्रिया-विशेषण है, अर्थात् 'मैं जो वसिष्ठत्व

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५३


र्थः; त्वं तद्वसिष्ठस्तेन वसिष्ठत्वगुणेन त्वं तद्वसिष्ठोऽसि तद्गुणस्त्वमित्यर्थः । अथवा तच्छब्दोऽपि क्रियाविशेषणमेव । त्वत्कृतस्त्वदीयोऽसौ वसिष्ठत्वगुणोऽज्ञानान्ममेति मयाभिमत इत्येतत् । तथोत्तरेषु योज्यं चक्षुःश्रोत्रमनःसु ॥१३-१४॥गुणवाली हूँ सो तुम वसिष्ठ हो—उस वसिष्ठत्व गुणसे तद्वसिष्ठ हो अर्थात् तुम्हीं उस गुणवाले हो।' अथवा 'सत्' शब्द भी क्रियाविशेषण ही है। तब इसका यह तात्पर्य होगा कि 'तुम्हारा किया हुआ अर्थात् तुम्हारा जो यह वसिष्ठत्व गुण है वह अज्ञानसे 'मेरा है' ऐसा मैंने समझ लिया है।' इसी प्रकार आगेके चक्षु, श्रोत्र और मनके विषयमें योजना कर लेनी चाहिये ॥ १३-१४ ॥

श्रुतेरिदं वचो युक्तमिदं वागादिभिर्मुख्यं प्राणं प्रत्यभिहितं यस्मात्—वाक् आदि इन्द्रियोंद्वारा मुख्य प्राणके प्रति कहा हुआ जो यह श्रुतिका वाक्य है सो ठीक ही है, क्योंकि—

न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥

[ लोकमें समस्त इन्द्रियोंको ] न वाक्, न चक्षु, न श्रोत्र और न मन ही कहते हैं; परंतु 'प्राण' ऐसा कहते हैं, क्योंकि ये सब प्राण ही हैं ॥ १५ ॥

न वै लोके वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीति वागादीनि करणान्याचक्षते लौकिकालोकमें इन वाक् आदि [समस्त] इन्द्रियोंको लौकिक अथवा शास्त्रज्ञ पुरुष न तो वाक् कहते हैं और न

| ४५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |

४५४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| आगमज्ञा वा; किं तर्हि ? प्राणा इत्येवाचक्षते कथयन्ति । यस्मात् प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि वागादीनि करणजातानि भवत्यतो मुख्यं प्राणं प्रत्यनुरूपमेव वागादिभिरुक्तमिति प्रकरणार्थमुपसंहिहीर्षति ।<br><br>ननु कथमिदं युक्तं चेतनावन्त इव पुरुषा अहंश्रेष्ठतायै विवदन्तोऽन्योन्यं स्पर्धेरन् ? इति । न हि चक्षुरादीनां वाचं प्रत्याख्याय प्रत्येकं वदनं संभवति; तथापगमो देहात्पुनः प्रवेशो ब्रह्मगमनं प्राणस्तुतिर्वोपपद्यते ।<br><br>तत्राग्न्यादिचेतनावद्देवताधिष्ठितत्वाद्वागादीनां चेतनावत्त्वं तावत्सिद्धमागमतः । तार्किकसमयविरोध इति चेद्देह एकस्मिन्ननेकचेतनावत्त्वे, न, ईश्वरस्य | चक्षु, न श्रोत्र और न मन ही कहते हैं ! तो फिर क्या कहते हैं ? बस 'प्राण' ऐसा ही कहते हैं । क्योंकि प्राण ही यह समस्त वागादि इन्द्रियसमुदाय हो जाता है, अतः मुख्य प्राणके प्रति वागादि इन्द्रियोंद्वारा ठीक ही कहा गया है—इस प्रकार श्रुति इस प्रकरणके अर्थका उपसंहार करना चाहती है ।<br><br>शङ्का—किंतु यह किस प्रकार सम्भव है कि वागादि प्राणोंने चेतनायुक्त पुरुषोंके समान अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करते हुए एकदूसरेसे स्पर्धा की ? क्योंकि वाक्-के सिवा अन्य चक्षु आदि इन्द्रियोंमेंसे किसीका भी बोलना सम्भव नहीं है और न उनका देहसे चला जाना, उसमें पुनः प्रवेश करना, ब्रह्माके पास जाना अथवा प्राणकी स्तुति करना ही सम्भव है ।<br><br>समाधान—उसमें हमारा यह कथन है कि अग्नि आदि चेतन देवताओंसे अधिष्ठित होनेके कारण वागादि इन्द्रियोंकी चेतनता तो शास्त्रसे ही सिद्ध है । यदि कहो कि इस प्रकार एक ही देहमें अनेक चेतनावालोंके रहनेसे तार्किकोंके मतसे विरोध होगा—तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि |

खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४५५

| निमित्तकारणत्वाभ्युपगमात् । ये तावदीश्वरमभ्युपगच्छन्ति तार्किकास्ते मनआदिकार्यकरणानामाध्यात्मिकानां बाह्यानां च पृथिव्यादीनामीश्वराधिष्ठितानामेव नियमेन प्रवृत्तिमिच्छन्ति रथादिवत् । न चास्माभिरग्न्याद्याश्चेतनावत्योऽपि देवता अध्यात्मं भोक्तृत्वेऽभ्युपगम्यन्ते; किं तर्हि ? कार्यकरणवतीनां हि तासां प्राणैकदेवताभेदानामध्यात्माधिभूताधिदैवभेदकोटिविकल्पानामध्यक्षतामात्रेण नियन्तेश्वरोऽभ्युपगम्यते, स ह्यकरणः । "अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः” ( श्वे० उ० ३ । १९ ) इत्यादिमन्त्रवर्णात् । "हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानम्” (श्वे० उ० ४।१२)। "हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वम्” (श्वे० उ० ३ । ४ ) इत्यादि च श्वेताश्वतरीयाः पठन्ति । | उन्होंने ईश्वरकी निमित्तकारणता स्वीकार की है । तार्किकलोग जो ईश्वरको स्वीकार करते हैं तो वे रथ आदिके समान ईश्वरसे अधिष्ठित हुए ही मन आदि आध्यात्मिक भूत एवं इन्द्रियोंकी तथा पृथिवी आदि बाह्य पदार्थोंकी नियत प्रवृत्ति मानते हैं । तथा हमलोग तो अग्नि आदि चेतन देवताओंको भी अध्यात्म ( शरीरान्तर्वर्ती ) भोक्ता नहीं मानते । तो क्या मानते हैं ?—हम तो अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवभेदसे करोड़ों विकल्पोंवाली एकमात्र प्राणदेवताकी भेदस्वरूप उन देहेन्द्रियवती देवताओंका ईश्वरको अध्यक्षतामात्रसे नियन्ता मानते हैं, क्योंकि वह ( ईश्वर ) अकरण ( इन्द्रियादिरहित ) है । जैसा कि “वह बिना हाथ-पाँवके ही वेगवान् और ग्रहण करनेवाला है तथा बिना नेत्रवाला होकर भी देखता है और कर्णहीन होनेपर भी सुनता है” इस मन्त्रवर्णसे प्रमाणित होता है । इसके सिवा श्वेताश्वतर शाखावालोंका यह भी पाठ है कि—“उत्पन्न होते हुए हिरण्यगर्भको देखो” तथा “पहले हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया” इत्यादि । |

४५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४५६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| भोक्ता कर्मफलसम्बन्धी देहे तद्विलक्षणो जीव इति वक्ष्यामः। वागादीनां चेह संवादः कल्पितो विदुषोऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां प्राणश्रेष्ठता निर्धारणार्थम्; यथा लोके पुरुषा अन्योन्यमात्मनः श्रेष्ठतायै विवदमानाः कञ्चिद् गुणविशेषाभिज्ञं पृच्छन्ति को नः श्रेष्ठो गुणैः ? इति तेनोक्ता एकैकश्येनादः कार्यं साधयितुमुद्यच्छत, येनादः कार्यं साध्यते स वः श्रेष्ठः, इत्युक्तास्तथा एवोद्यच्छन्त आत्मनोऽन्यस्य वा श्रेष्ठतां निर्धारयन्ति; तथेमं संव्यवहारं वागादिषु कल्पितवती श्रुतिः, कथं नाम विद्वान्वागादीनामेकैकस्याभावेऽपि जीवनं दृष्टं न तु प्राणस्येति प्राणश्रेष्ठतां प्रतिपद्येतेति । | [इस शरीरमें ] उन ईश्वर और देवताओंसे विलक्षण कर्मफलसे सम्बन्ध रखनेवाला जीव भोक्ता है--ऐसा हम ( आगे ) कहेंगे । वागादिका संवाद तो यहाँ उपासकके प्रति अन्वय एवं व्यतिरेकसे प्राणकी श्रेष्ठताका निर्णय करानेके लिये कल्पित किया गया है। जिस प्रकार लोकमें मनुष्य अपनी श्रेष्ठताके लिये एक-दूसरेसे विवाद करते हुए किसी विशेष गुणज्ञसे पूछते हैं कि 'हममें गुणोंकी दृष्टिसे कौन श्रेष्ठ है ?' और उसके यह कहनेपर कि 'इस कार्यको सिद्ध करनेके लिये तुम एक-एक करके उद्योग करो; जिससे यह कार्य सिद्ध हो जाय, वही तुममें श्रेष्ठ है' उसी प्रकार उद्योग करके अपनी या किसी दूसरेकी श्रेष्ठताका निर्णय करते हैं--उसी प्रकार श्रुतिने वागादिमें इस व्यवहारकी कल्पना की है, जिससे कि 'वागादिमेंसे एक-एकके अभावमें भी जीवन देखा गया है किंतु प्राणके अभावमें नहीं देखा गया' ऐसा देखकर उपासक किसी प्रकार प्राणकी श्रेष्ठता समझ जाय । |

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५७


| तथा च श्रुतिः कौषीतकिनाम्; "जीवति वागपेतो मूकान्हि पश्यामो जीवति चक्षुरपेतोऽन्धान्हि पश्यामो जीवति श्रोत्रापेतो बधिरान्हि पश्यामो जीवति मनोऽपेतो बालान्हि पश्यामो जीवति बाहुच्छिन्नो जीवत्यूरुच्छिन्न": ( कौ० उ० ३ । ३ ) इत्याद्या ॥ १५ ॥ | ऐसी ही कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद्की श्रुति भी है—"मनुष्य बिना वाणीके जीवित रहता है, क्योंकि हम गूँगोंको देखते हैं; नेत्रके बिना जीवित रहता है, क्योंकि हम अन्धोंको देखते हैं; श्रोत्रके बिना जीवित रहता है, क्योंकि हम बहरोंको देखते हैं; मनके बिना जीवित रहता है, क्योंकि हम बालकोंको देखते हैं तथा भुजा कट जानेपर जीवित रहता है, ऊरु ( जाँघ ) कट जानेपर जीवित रहता है" इत्यादि ॥ १५ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥

द्वितीय खण्ड

प्राणका अन्ननिर्देश

स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किञ्चि-
दिदमा श्वभ्य आ शकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतद-
नस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि
किञ्चनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥

उसने कहा—'मेरा अन्न क्या होगा ?' तब वागादिने कहा—'कुत्तों और पक्षियोंसे लेकर सब जीवोंका यह जो कुछ अन्न है [सब तुम्हारा अन्न है ]', सो यह सब अन ( प्राण ) का अन्न है । 'अन' यह प्राणका प्रत्यक्ष नाम है । इस प्रकार जाननेवालेके लिये भी कुछ अनन्न ( अभक्ष्य ) नहीं होता है ॥ १ ॥

| स होवाच मुख्यः प्राणः किं मेऽन्नं भविष्यतीति । मुख्यं प्राणं प्रष्टारमिव कल्पयित्वा वागादीन्प्रतिवक्तृनिव कल्पयन्ती श्रुतिराह—यदिदं लोकेऽन्नजातं प्रसिद्धमा श्वभ्यः श्वभिः सहा शकुनिभ्यः सह शकुनिभिः सर्वप्राणिनां यदन्नं तत्तवान्नममिति होचुर्वागादय इति । प्राणस्य सर्वमन्नं प्राणोऽत्ता सर्वस्यान्नस्येत्येवं प्रतिपत्तये कल्पिताख्यायिका- रूपाद्यावृत्त्य स्वेन श्रुतिरूपे- | उस मुख्य प्राणने कहा—'मेरा अन्न क्या होगा ?' [ इस प्रकार ] मुख्य प्राणको मानो प्रश्नकर्ता बनाकर वागादिको उत्तरदाता-सा कल्पित करती हुई श्रुति कहती है—'इस लोकमें कुत्तोंके सहित और पक्षियोंके सहित सम्पूर्ण प्राणियोंका यह जो कुछ अन्न प्रसिद्ध है वही तेरा अन्न है' ऐसा वागादिने कहा । इस प्रकार सब कुछ प्राणका अन्न है और प्राण इस अन्नका भोक्ता है—इस बातको समझानेके लिये कल्पित आख्यायिकारूपसे निवृत्त हो ग्रन्थ अपने श्रुतिरूपसे कहता |

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
णाह-तद्वा एतद्यत्किञ्चिदिलोके प्राणिभिरन्नमद्यतेऽनस्य प्राणस्य तदन्नं प्राणेनैव तदद्यत इत्यर्थः ।है—'यह जो कुछ अन्न इस लोकमें प्राणियोंद्वारा भक्षित होता है वह अन—प्राणका ही अन्न है; अर्थात् वह प्राणसे ही भक्षित होता है ।'
सर्वप्रकारचेष्टाव्याप्तिगुणप्रदर्शना-र्थमन इति प्राणस्य प्रत्यक्ष नाम । प्राद्युपसर्गपूर्वत्वे हि विशेषगतिरेव स्यात् । तथा च सर्वान्नानामत्तुर्नामग्रहणमितीदं प्रत्यक्षं नामान इति सर्वान्नानामत्तुः साक्षादभिधानम् ।प्राणका सब प्रकारकी चेष्टामें व्याप्तिरूप गुण प्रदर्शित करनेके लिये उसका 'अन' यह प्रत्यक्ष नाम है, क्योंकि 'प्र' आदि उपसर्ग पूर्वमें रहनेपर उसकी विशेष गति ही सिद्ध होती है ।* इस प्रकार सम्पूर्ण अन्नोंको भक्षण करनेवाले प्राणका नाम ग्रहण किया गया है अतः उसका 'अन' यह प्रत्यक्ष नाम है; अर्थात् यह सर्वान्नभक्षी प्राणका साक्षात् नाम है ।
न ह वा एवंविदि यथोक्तप्राणविदि प्राणोऽहमस्मि सर्वभूतस्थः सर्वान्नानामत्तेति, तस्मिन्नेवंविदि ह वै किञ्चन किञ्चिदपि प्राणिभिराद्यं सर्वैरन्नमनाद्यं न भवति सर्वमेवंवित्यन्नं भवतीत्यर्थः;इस प्रकार जाननेवाले—उपर्युक्त प्राणवेत्ताके लिये, अर्थात् जो यह जानता है कि मैं सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित सारे अन्नोंका भोक्ता प्राण हूँ उसके लिये कुछ भी, समस्त प्राणियोंद्वारा भक्षित होनेवाला कोई भी अन्न, अभक्ष्य नहीं होता । तात्पर्य यह है कि इस प्रकार जाननेवालेके लिये सभी अन्न है,

* 'अन प्राणने' इस धातुपाठके अनुसार 'अन' शब्द गतिशीलका वाचक है । उसके पहले प्र, अप, उत्+आ, वि+आ इन उपसर्गोंके तथा 'सम्' शब्दके लगनेसे क्रमशः प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान शब्द सिद्ध होते हैं । इनके योगसे मुख्य प्राणका गतिभेद ही द्योतित होता है ।

४६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५

४६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५


| प्राणभूतत्वाद्विदुषः । "प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति" (बृ० १ । ५ । २३) इत्युपक्रम्य "एवंविदो ह वा उदेति सूर्य एवं विद्ध्यस्तमेति" इति श्रुत्यन्तरात् ॥ १ ॥ | क्योंकि वह विद्वान् प्राणस्वरूप हो जाता है; जैसा कि एक दूसरी श्रुतिमें भी "प्राणसे ही यह सूर्य उदित होता और प्राणमें ही अस्त होता है" ऐसा उपक्रम कर "इस प्रकार जाननेवालेसे ही सूर्य उदित होता है और ऐसा जाननेवालेमें ही अस्त हो जाता है" [ऐसा उपसंहार किया गया है] ॥ १ ॥ |

— : ० : —

प्राणका वस्त्रनिर्देश

स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥

उसने कहा—'मेरा वस्त्र क्या होगा ?' तब वागादि बोले—'जल' । इसीसे भोजन करनेवाले पुरुष भोजनके पूर्व और पश्चात् इसका जलसे आच्छादन करते हैं । [ ऐसा करनेसे ] वह वस्त्र प्राप्त करनेवाला और अनग्न होता है ॥ २ ॥

| स होवाच पुनः प्राणः, पूर्ववदेव कल्पना, किं मे वासो भविष्यति ? इति; आप इति होचुर्वागादयः । यस्मात्प्राणस्य वास आपः, तस्माद्वा एतदशिष्यन्तो भोक्ष्यमाणा भुक्तवन्तश्च ब्राह्मणा विद्वांस एतत्कुर्वन्ति, किम्? अद्भिर्वासस्थानीयाभिः पुरस्ता- | उस प्राणने फिर कहा—यह कल्पना भी पहलेहीके समान है—'मेरा वस्त्र क्या होगा ?' इसपर वागादिने कहा—'जल' । क्योंकि जल प्राणका वस्त्र है इसीसे भोजन करनेवाले विद्वान् यह करते हैं; क्या करते हैं ? भोजनके पूर्व और पश्चात् वे वस्त्रस्थानीय जलसे |

खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ४११
संस्कृतहिन्दी
द्भोजनात्पूर्वमुपरिष्टाच्च भोजनादूर्ध्वं च परिदधति परिधानं कुर्वन्ति मुख्यस्य प्राणस्य । लम्भुको लम्भनशीलो वासो ह भवति, वाससो लब्धैव भवतीत्यर्थः । अनग्नो ह भवति, वाससो लम्भुकत्वेनार्थसिद्धैवानग्नतेत्यनग्नो ह भवतीत्युत्तरीयवान् भवतीत्येतत् ।मुख्य प्राणका परिधान (आच्छादन) करते हैं । [ ऐसा करनेसे ] वह लम्भुक—वस्त्रोंका लम्भनशील अर्थात् वस्त्रोंको प्राप्त करनेवाला ही होता है और अनग्न होता है । वस्त्रोंको प्राप्त करनेवाला होनेसे अनग्नता अर्थतः सिद्ध ही है; अतः अनग्न होता है। इसका अभिप्राय यह है कि उत्तरीय वस्त्रसे युक्त होता है।
भोक्ष्यमाणस्य भुक्तवतश्च यदाचमनं शुद्धयर्थं विज्ञातं तस्मिन् प्राणस्य वास इति दर्शनमात्रमिह विधीयते । अद्भिः परिदधतीति नाचमनान्तरम् । यथा लौकिकैः प्राणिभिर्भक्ष्यमानमन्नं प्राणस्येति दर्शनमात्रम्, तद्वत् । किं मेऽन्नं किं मे वास इत्यादिप्रश्नप्रतिवचनयोस्तुल्यत्वात् । यद्याचमनमपूर्वं तादर्थ्येन क्रियेतभोजन आरम्भ करनेवाले और भोजन कर चुकनेवालेका जो आचमन शुद्धिके लिये विदित है उसमें 'यह प्राणका वस्त्र है' ऐसी दृष्टिमात्रका विधान किया गया है । 'जलसे परिधान करता है' ऐसा कहकर किसी अन्य आचमनका विधान नहीं किया गया । जिस प्रकार लौकिक प्राणियोंद्वारा भक्षित होनेवाला अन्न प्राणका है—यहाँ जिस तरह केवल दृष्टिमात्रका विधान किया गया है उसी तरह इसे समझना चाहिये; क्योंकि 'मेरा अन्न क्या है ? मेरा वस्त्र क्या है '? इत्यादि प्रश्न और इनके उत्तर दोनों समान हैं । यदि [ इस श्रुतिके अनुसार ] प्राणके लिये अपूर्व—नवीन आचमनका विधान मान

४६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४६२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

संस्कृत मूल / भाष्यहिन्दी अनुवाद
तदा कृम्याद्यन्नमपि प्राणस्येति भक्ष्यत्वेन विहितं स्यात् । तुल्ययोर्विज्ञानार्थयोः प्रश्नप्रतिवचनयोः प्रकरणस्य विज्ञानार्थत्वादर्धजरतीयो न्यायो न युक्तः कल्पयितुम् ।लिया जाय तो कृमि आदि अन्नका भी प्राणके भक्ष्यरूपसे विधान समझा जायगा । इस प्रकार समानरूपसे विज्ञानार्थक प्रश्न और उत्तरोंका यह प्रकरण विज्ञानरूप प्रयोजनके लिये ही होनेके कारण यहाँ अर्धजरतीय न्यायकी* कल्पना करना उचित नहीं है ।
यत्तु प्रसिद्धमाचमनं प्रायत्यार्थं प्राणस्यानग्नतार्थं च न भवतीत्युच्यते, न तथा वयमाचमनमुभयार्थं ब्रूमः; किं तर्हि ? प्रायत्यार्थाचमनसाधनभूता आपः प्राणस्य वास इति दर्शनं चोद्यत इति ब्रूमः । तत्राचमनस्योभयार्थत्वप्रसङ्गदोषचोदनानुपपन्ना । वासोऽर्थ एवाचमने तद्दर्शनं स्यादिति चेत् ?तथा ऐसा जो कहा जाता है कि 'शुद्धिके लिये किया जानेवाला प्रसिद्ध आचमन प्राणकी नग्नताके निवारणके लिये नहीं हो सकता' उसके विषयमें हमें यह कहना है कि इस प्रकार हम आचमनको दोनों प्रयोजनोंके लिये नहीं बतलाते । तो फिर क्या कहते हैं ?—हमारा कथन तो यह है कि शुद्धिके लिये किये जानेवाले आचमनका साधनभूत जल प्राणका वस्त्र है--ऐसी दृष्टिका विधान किया गया है । उसमें आचमनके दो प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये होनेरूप दोषकी शङ्का करना उचित नहीं है । यदि कहो कि 'ऐसी दृष्टि करना तो तब उचित होता जब कि आचमन प्राणके वस्त्रके लिये ही किया जाता'—तो

  • यदि कोई मनुष्य कहे कि आधी गाय तो जवान है और आधी बूढ़ी है तो इसे अर्धजरतीय न्याय कहते हैं । अतः ऐसी कल्पना नहीं करनी चाहिये कि अन्नोंमें तो केवल दृष्टिमात्रका विधान है; किंतु आचमन नवीन विहित है !

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६३


| न; वासोऽज्ञानाथंवाक्ये वासोऽर्थापूर्वाचमनविधाने तत्रानग्नतार्थत्वदृष्टिविधाने च वाक्यभेदः । आचमनस्य तदर्थत्वमन्यार्थत्वं चेति प्रमाणाभावात्॥२॥ | यह ठीक नहीं; क्योंकि वस्त्रदृष्टिके लिये प्रवृत्त हुए वाक्यमें वस्त्रके लिये नवीन आचमनका विधान और उसमें प्राणकी नग्नताके निवारणरूप प्रयोजनकी दृष्टिका विधान माननेसे वाक्यभेदरूप दोष होगा, क्योंकि आचमनके वासोऽर्थत्व और किसी अन्यार्थत्वमें कोई प्रमाण नहीं है॥२॥ |


प्राणविद्याकी स्तुति

तदेतत्प्राणदर्शनं स्तूयते। कथम् ?उस इस प्राणदर्शनकी स्तुति की जाती है; किस प्रकार ?

तद्धैतत्सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥

उस इस ( प्राणदर्शन ) को सत्यकाम जाबालने वैयाघ्रपद्य गोश्रुतिके प्रति निरूपित करके कहा—'यदि इसे शुष्क स्थाणुके प्रति कहे तो उसमें शाखा उत्पन्न हो जायगी और पत्ते फूट आवेंगे ॥ ३ ॥

तद्वैतत्प्राणदर्शनं सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये नाम्ना वैयाघ्रपद्याय व्याघ्रपदोऽपत्यं वैयाघ्रपद्यस्तस्मै गोश्रुत्याख्यायोक्त्वोवाचान्यदपि वक्ष्यमाणं वचः । किं तदुवाच ? त्याह-- यद्यपि शुष्काय स्थाणव एतद्-उस इस प्राणदर्शनको सत्यकाम जाबालने गोश्रुतिनामक वैयाघ्रपद्यसे—व्याघ्रपदके पुत्रको वैयाघ्रपद्य कहते हैं, उस गोश्रुति नामवालेसे कहकर और भी आगे कहा जानेवाला वचन कहा। उसने क्या कहा ? सो बतलाते हैं—यदि प्राणवेत्ता पुरुष इस दर्शनको शुष्क स्थाणुके प्रति

४१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४१४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| र्शनं ब्रूयात्प्राणाविजायेरन्नुत्पद्ये-<br>रन्नेवास्मिन्स्थाणौ शाखाः प्ररो-<br>हेयुश्च पलाशानि पत्राणि। किमु<br>जीवते पुरुषाय ब्रूयादिति ॥ ३ ॥ | कहे तो उस स्थाणुमें शाखाएँ उत्पन्न<br>हो जायँ और पत्ते निकल आवें,<br>यदि जीवित पुरुषसे कहे तब तो<br>कहना ही क्या है ? ॥ ३ ॥ |

—: ० :—

मन्थकर्म

| यथोक्तप्राणदर्शनविद इदं<br>मन्थाख्यं कर्मारभ्यते--- | उपर्युक्त प्राणदर्शनके ज्ञाताके<br>लिये इस मन्थनामक कर्मका आरम्भ<br>किया जाता है— |

अथ यदि महज्जिगमिषेदामावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्यां रात्रौ सर्वौषधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥ ४ ॥

अब यदि वह महत्त्वको प्राप्त होना चाहे तो उसे अमावास्याको दीक्षित होकर पूर्णिमाकी रात्रिको सर्वौषधके दधि और मधुसम्बन्धी मन्थका मन्थन कर 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' ऐसा कहते हुए अग्निमें घृतका हवन कर मन्थपर उसका अवशेष डालना चाहिये ॥ ४ ॥

| अथानन्तरं यदि महन्महत्त्वं<br>जिगमिषेद्गन्तुमिच्छेन्महत्त्वं प्रा-<br>प्तं यदि कामयेतेत्यर्थः, तस्येदं<br>कर्म विधीयते। महत्त्वे हि सति<br>श्रीरुपनमते। श्रीमतो ह्यर्थप्राप्तं<br>धनं ततः कर्मानुष्ठानं ततश्च | अब इसके पश्चात् यदि वह<br>महत् यानी महत्त्वको प्राप्त होना<br>चाहे अर्थात् महत्त्वप्राप्तिकी कामना<br>रखता हो तो उसके लिये इस<br>कर्मका विधान किया जाता है,<br>क्योंकि महत्त्व प्राप्त होनेपर ही लक्ष्मी<br>समीप आती है, क्योंकि श्रीमान्‌को<br>धन तो स्वतः प्राप्त होता ही है, उससे<br>कर्मानुष्ठान होता है और उससे |

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६५


| देवयानं पितृयाणं वा पन्थानं प्रतिपत्स्यत इत्येतत्प्रयोजनमुररीकृत्य महत्त्वप्रेप्सोरिदं कर्म न विषयोपभोगकामस्य। तस्यायं कालादिविधिरुच्यते—<br><br>अमावास्यायां दीक्षित्वा दीक्षित इव भूमिशयनादिनियमं कृत्वा तपोरूपं सत्यवचनं ब्रह्मचर्यमित्यादिधर्मवान्भूत्वेत्यर्थः। न पुनर्दैक्षमेव कर्मजातं सर्वमुपादत्ते, अतद्विकारत्वान्मन्थाख्यस्य कर्मणः। “उपसद्व्रती” (बृ० उ० ६।३।१) इति श्रुत्यन्तरात्पयोमात्रभक्षणं च शुद्धिकारणं तप उपादत्ते। पौर्णमास्यां रात्रौ कर्मारभते। सर्वौषधस्य ग्राम्यारण्यानामोषधीनां यावच्छक्त्यल्पमल्पमुपादाय तद्वितुषीकृत्याममेव पिष्टं दधिमधुनोरौदुम्बरे कंसाकारे चम- | देवयान अथवा पितृयाण मार्ग प्राप्त होना सम्भव है—इस उद्देश्यको लक्ष्यमें रखकर ही महत्त्वप्राप्तिकी इच्छावालेके लिये—विषयोपभोगकी कामनावालेके लिये नहीं—यह कर्म आरम्भ किया जाता है। उसकी यह कालादि विधि कही जाती है—<br><br>अमावास्याके दिन दीक्षित हो—दीक्षित पुरुषके समान भूमिशयन आदि नियम कर अर्थात् तपःस्वरूप-सत्यवचन, ब्रह्मचर्य इत्यादि धर्मवाला होकर पूर्णिमाकी रात्रिको इस कर्मका आरम्भ करता है। [इस कर्ममें दीक्षित होनेवाला पुरुष] दीक्षा-सम्बन्धी [मौञ्जीबन्धनादि] समस्त कर्मोंका ग्रहण नहीं करता, क्योंकि यह मन्थाख्य कर्म किसी अन्य कर्मका विकार नहीं है। “उपसद्व्रती भूत्वा” ऐसी अन्य श्रुति होनेके कारण वह शुद्धिका कारणभूत पयोभक्षणमात्र तप स्वीकार करता है। सर्वौषध अर्थात् यथाशक्ति ग्राम्य और वन्य समस्त ओषधियोंका थोड़ा-थोड़ा भाग लेकर उन्हें तुषरहित कर उसकी कच्ची पिट्ठीको एक अन्य श्रुतिके अनुसार दही और मधुके सहित कंसाकार अथवा चमसाकार |

४६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४६६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| साकारे वा पात्रे श्रुत्यन्तरात्प्रक्षिप्योपमथ्याग्रतः स्थापयित्वा ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावावसथ्य आज्यस्यावापस्थाने हुत्वा स्रुवसंलग्नं मन्थे संपातमवनयेत्संस्रवमधः पातयेत् ॥ ४ ॥ | गूलरके पात्रमें डालकर उसका मन्थन कर उसे अपने आगे रख 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' ऐसा कहते हुए आवसथ्याग्निमें आवापस्थानमें घृतकी आहुति दे और स्रुवमें लगे हुए अवशिष्ट हविको मन्थमें डाल दे अर्थात् उस घृतकी धाराको मन्थमें गिरा दे ॥४॥ |

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वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत्प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत्संपदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥ ५ ॥

[ इसी प्रकार ] 'वसिष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले; 'प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले; 'संपदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले तथा 'आयतनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले ॥ ५ ॥

| समानमन्यत्, वसिष्ठाय प्रतिष्ठायै संपद आयतनाय स्वाहेति प्रत्येकं तथैव संपातमवनयेद्धुत्वा ॥ ५ ॥ | शेष अर्थ पूर्ववत् है; 'वसिष्ठाय, प्रतिष्ठायै, संपदे तथा आयतनाय स्वाहा' ऐसा कहते हुए प्रत्येक मन्त्रके अनन्तर आहुति देकर उसी प्रकार घृतका स्राव [ मन्थमें ] डाले ॥ ५ ॥ |

—:०:—

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६७


अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिदग्ंस हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैष्ठ्यग्ंश्रैष्ठ्यग्ंराज्यमाधिपत्यं गमयत्वहमेवेदग्ं सर्वमसानीति ॥ ६ ॥

तदनन्तर अग्निसे कुछ दूर हटकर मन्थको अञ्जलिमें ले वह 'अमो नामासि' इत्यादि मन्त्रका जप करे। [ अमो नामासि आदि मन्त्रका अर्थ— ] हे मन्थ ! तू 'अम' नामवाला है, क्योंकि यह सारा जगत् [ अपने प्राणभूत ] तेरे साथ अवस्थित है। वह तू ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, राजा (दीप्तिमान्) और सबका अधिपति है। वह तू मुझे ज्येष्ठत्व, श्रेष्ठत्व, राज्य और आधिपत्यको प्राप्त करा। मैं ही यह सर्वरूप हो जाऊँ ॥६॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथ प्रतिसृप्याग्नेरीषदपसृत्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपत्तीमं मन्त्रम् अमो नामास्यमा हि ते। अम इति प्राणस्य नाम, अन्नेन हि प्राणः प्राणिति देह इत्यतो मन्थद्रव्यं प्राणस्यान्नत्वात्प्राणत्वेन स्तूयतेऽमो नामासीति। कुतः ? यतोऽमा सह हि यस्मात्ते तव प्राणभूतस्य सर्वं समस्तं जगदिदमतः स हि प्राणभूतो मन्थो ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च। अत एव च राजा दीप्तिमानधिपतिश्चाधिष्ठाय पालयिता सर्वस्य। स मा मामपि मन्थः प्राणोफिर प्रतिसर्पण कर—अग्निसे कुछ हटकर मन्थको अञ्जलिमें रख इस मन्त्रको जपता है—'अम नामासि अमा हि ते' इत्यादि। 'अम' यह प्राणका नाम है, अन्नके कारण ही प्राण शरीरमें प्राणनक्रिया करता है; इसीसे मन्थद्रव्य प्राणका अन्न होनेके कारण 'अमो नामासि' इत्यादि मन्त्रद्वारा प्राणरूपसे स्तुत होता है। तू क्यों 'अम' नामवाला है ?—क्योंकि प्राणभूत तेरे साथ ही यह सारा जगत् है; अतः वह [तू] प्राणभूत मन्थ ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। इसीसे तू राजा—दीप्तिमान् और अधिपति—सबका अधिष्ठान होकर पालन करनेवाला है। वह