भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 978 में से

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पृष्ठ 464

४६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५


| प्राणभूतत्वाद्विदुषः । "प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति" (बृ० १ । ५ । २३) इत्युपक्रम्य "एवंविदो ह वा उदेति सूर्य एवं विद्ध्यस्तमेति" इति श्रुत्यन्तरात् ॥ १ ॥ | क्योंकि वह विद्वान् प्राणस्वरूप हो जाता है; जैसा कि एक दूसरी श्रुतिमें भी "प्राणसे ही यह सूर्य उदित होता और प्राणमें ही अस्त होता है" ऐसा उपक्रम कर "इस प्रकार जाननेवालेसे ही सूर्य उदित होता है और ऐसा जाननेवालेमें ही अस्त हो जाता है" [ऐसा उपसंहार किया गया है] ॥ १ ॥ |

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प्राणका वस्त्रनिर्देश

स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥

उसने कहा—'मेरा वस्त्र क्या होगा ?' तब वागादि बोले—'जल' । इसीसे भोजन करनेवाले पुरुष भोजनके पूर्व और पश्चात् इसका जलसे आच्छादन करते हैं । [ ऐसा करनेसे ] वह वस्त्र प्राप्त करनेवाला और अनग्न होता है ॥ २ ॥

| स होवाच पुनः प्राणः, पूर्ववदेव कल्पना, किं मे वासो भविष्यति ? इति; आप इति होचुर्वागादयः । यस्मात्प्राणस्य वास आपः, तस्माद्वा एतदशिष्यन्तो भोक्ष्यमाणा भुक्तवन्तश्च ब्राह्मणा विद्वांस एतत्कुर्वन्ति, किम्? अद्भिर्वासस्थानीयाभिः पुरस्ता- | उस प्राणने फिर कहा—यह कल्पना भी पहलेहीके समान है—'मेरा वस्त्र क्या होगा ?' इसपर वागादिने कहा—'जल' । क्योंकि जल प्राणका वस्त्र है इसीसे भोजन करनेवाले विद्वान् यह करते हैं; क्या करते हैं ? भोजनके पूर्व और पश्चात् वे वस्त्रस्थानीय जलसे |