छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 455, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४५१ |
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| बाला अमनसोऽप्ररूढमनस इत्यर्थः ॥ ९-११ ॥ | अर्थात् जिनका मन विकसित नहीं हुआ है ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ९-११ ॥ |
प्राणकी परीक्षा और विजय
| एवं परीक्षितेषु वागादिषु— | इस प्रकार वागादिकी परीक्षा हो चुकनेपर— |
अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन्स यथा सुहयः पड्वीशशङ्कून्संखिदेदेवमितरान्प्राणान्समखिदत्तंहाभिसमेत्योचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२॥
फिर प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा की। उसने, जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपने पैर बाँधनेकी कीलोंको उखाड़ डालता है उसी प्रकार अन्य प्राणोंको भी उखाड़ दिया। तब उन सबने उसके सामने जाकर कहा 'भगवन् ! आप [हमारे स्वामी] रहें, आप ही हम सबमें श्रेष्ठ हैं, आप उत्क्रमण न करें' ॥ १२ ॥
| अथानन्तरं ह स मुख्यः प्राण उच्चिक्रमिषन्नुत्क्रमितुमिच्छन्किमकरोत् ? इत्युच्यते—यथा लोके सुहयः शोभनोऽश्वः पड्वीशशङ्कन्पादबन्धनकीलान् परीक्षणायारूढेन कशया हतः सन्संखिदेत्समुत्खनेत्समुत्पाटयेत, एवमितरान्वागादीन्प्राणान्समखिदत्समुद्धृतवान् ।<br><br>ते प्राणाः संचालिताः सन्तः स्वस्थाने स्थातुमनुत्सहमाना | अथ—इसके पश्चात् उस मुख्य प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा करते हुए क्या किया ? सो बतलाया जाता है—लोकमें जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपनी परीक्षाके लिये चढ़े हुए मनुष्यद्वारा चाबुकसे मारे जानेपर पैर बाँधनेकी कीलोंको उखाड़ डालता है उसी प्रकार उसने वाक् आदि अन्य प्राणोंको उखाड़ दिया अर्थात् [शरीरसे] बाहर निकाल लिया।<br><br>[इसी प्रकार] विचलित कर दिये जानेपर वे प्राण अपने गोलकोंमें स्थित रहनेमें असमर्थ होनेके कारण |
छा० उ० १५—